चीन और रूस के बीच नज़दीकियों की वजह क्या है?

    • Author, अंकुर शाह
    • पदनाम, एडिटर, बीबीसी ग्लोबल चाइना यूनिट
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  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

पिछले साल सितंबर में बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर स्क्वायर पर टहलते हुए, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अंग प्रत्यारोपण के जरिए मानव जीवन को बढ़ाने की संभावना पर विचार कर रहे थे.

पुतिन के दुभाषिए को यह कहते हुए सुना गया, "मानव अंगों का लगातार प्रत्यारोपण किया जा सकता है. जितना अधिक आप जीवित रहते हैं, उतने ही युवा होते जाते हैं, और यहां तक कि अमरता भी हासिल कर सकते हैं."

शी के दुभाषिए को जवाब देते हुए सुना गया, "कुछ का अनुमान है कि इस सदी में मनुष्य 150 साल तक जीवित रह सकते हैं."

यह दो शक्तिशाली नेताओं के लिए एक उपयुक्त बातचीत थी, जिन्होंने एक-दूसरे को 'सबसे अच्छा मित्र' बताया है, और जो संयुक्त रूप से 39 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद भी पद छोड़ने के कोई संकेत नहीं दिखा रहे हैं.

यह एक ऐसी साझेदारी की दुर्लभ झलक थी जिसे अक्सर गलत समझा जाता है. बिना स्क्रिप्ट की इस बातचीत का यह छोटा सा हिस्सा एक बहुत ही गोपनीय रिश्ते की कुछ गिनी-चुनी झलकियों में से एक है.

पुतिन का बीजिंग दौरा रूस और चीन के बीच 'अच्छे पड़ोसी संबंध और मैत्रीपूर्ण सहयोग संधि' की 25वीं वर्षगांठ के समय हो रहा है.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले सप्ताह शी से मिलने गए थे, तो उनका स्वागत शानदार भोज, सोने के बर्तनों और एक प्राचीन मंदिर की यात्रा के साथ किया गया था. इसके विपरीत, पुतिन की यात्रा कहीं अधिक साधारण लगती है, जिसके बारे में पहले से बहुत कम जानकारी जारी दी गई है.

बताया जाता है कि शी ने पिछले सप्ताह ट्रंप से बातचीत के दौरान अपने मित्र पुतिन का जिक्र किया था. आमतौर पर विदेशी आगंतुकों के लिए प्रतिबंधित रहने वाले झोंगनानहाई में टहलते हुए शी ने मज़ाक में ट्रंप से कहा कि पुतिन पहले इस राजनीतिक परिसर का दौरा कर चुके हैं.

वॉशिंगटन में कुछ लोग यह उम्मीद कर रहे थे कि ट्रंप चीन को रूस से दूर कर सकते हैं, लेकिन ऐसी उम्मीदें अब महज़ कल्पना जैसी प्रतीत होती हैं.

हाल के वर्षों में चीन और रूस ने अपने संबंधों को 'सीमाओं में न बांधी जाने वाली दोस्ती' बताया है. तो, यह किस आधार पर टिकी है, और क्या उनका यह रिश्ता लंबे समय तक कायम रहेगा?

चीनी शर्तों पर

कार्नेगी रशिया यूरेशिया सेंटर थिंक टैंक के निदेशक अलेक्ज़ेंडर गाबुएव के अनुसार यह रिश्ता बहुत असमान है और दोनों देशों के बीच होने वाले किसी भी समझौते की शर्तें संभवतः चीन के अनुसार ही तय होंगी . वह इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, "रूस पूरी तरह से चीन की मुट्ठी में है, और चीन शर्तें तय कर सकता है."

यह असंतुलन कई क्षेत्रों में बना हुआ है, ख़ासकर अर्थव्यवस्था में. चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि रूस चीन के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का मात्र 4% हिस्सा है. चीन रूस को किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक निर्यात करता है, और उसकी अर्थव्यवस्था रूस से कहीं बड़ी है.

सालों से जारी पश्चिमी प्रतिबंधों ने धीरे-धीरे रूस को चीन के साथ व्यापारिक जुड़ाव बढ़ाने की ओर धकेला है. चीन की टेक दिग्गज ख़्वावे पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए और ब्रिटिश सरकार की समीक्षा के बाद उसे यूके के 5G नेटवर्क से भी बाहर कर दिया गया. रूस में पश्चिमी कंपनियों की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाकर वह वहां संचार उद्योग की एक प्रमुख स्तंभ बन गई है.

पश्चिम के साथ लगातार टूटते संबंधों के बीच, तकनीकी, वैज्ञानिक या औद्योगिक- हर तरह की विशेषज्ञता के लिए चीन पहली पसंद बन गया है.

2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से, रूस अपने युद्ध तंत्र के लिए चीनी पुर्जों पर लगातार ज़्यादा निर्भर होता गया है. ब्लूमबर्ग की एक हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि रूस अपनी प्रतिबंधित तकनीक का 90% से ज़्यादा चीन से आयात कर रहा था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10% ज़्यादा है.

रूस इस असंतुलन के जोखिमों से भली-भांति अवगत है. रूसी इंटरनेशनल अफ़ेयर्स काउंसिल थिंक टैंक के अध्यक्ष दिमित्री ट्रेनिन ने हाल ही में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था 'हम किसी के आगे नहीं झुकते'. इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि रूस एक आश्रित राज्य नहीं बनना चाहता.

चीन के बारे में उन्होंने कहा: "(यह) हमारे लिए बिल्कुल आवश्यक है कि हम अपने संबंधों में समान स्थिति बनाए रखें और यह याद रखें कि रूस एक महाशक्ति है जो एक जूनियर पार्टनर नहीं बन सकता."

रूस के पास चीन के अलावा बहुत कम व्यावहारिक विकल्प हैं. वह एक ऐसा ख़रीदार है जो उस पैमाने पर मांग और बाज़ार की पेशकश करता है जो रूस के अस्तित्व के लिए बहुत ज़रूरी है. अगर चीन रूस के साथ अपना व्यापार कम कर दे, तो पश्चिम के साथ संबंधों में आई टूट के चलते रूस के विदेश नीति के उद्देश्यों को हासिल करना काफ़ी मुश्किल हो जाएगा.

हालांकि, रूस का बड़ा फायदा और चीन के उस पर दबाव बनाए जाने के ख़िलाफ़ एक सुरक्षा, उसकी अपने रुख पर डटे रहने की क्षमता है.

बढ़ता असंतुलन

ग्लासगो विश्वविद्यालय में सुरक्षा अध्ययन के लेक्चरर मार्सिन काचमार्स्की के अनुसार, चीन जानता है कि यह कितना बड़ा असंतुलन है और रूस या उसके अभिजात वर्ग के भीतर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया उत्पन्न करने से बचना चाहता है.

वह कहते हैं, "मैं कहूंगा कि रूस के प्रति चीनी नीति का सार आत्म-संयम है. चीन रूस पर दबाव नहीं डाल रहा है."

यह आंशिक रूप से इसलिए है क्योंकि ऐसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी- रूस भले ही जूनियर पार्टनर हो, लेकिन वह एक स्वाभिमानी साझेदार है.

कार्नेगी के गाबुएव कहते हैं कि भले ही चीन रूस पर दबाव डालने की कोशिश करे, यह "ऐसा देश नहीं है जो तुरंत इसे स्वीकार कर ले."

वह 2023 में शी की मॉस्को यात्रा का उदाहरण देते हैं, जिसमें बताया गया था कि चीन के राष्ट्रपति ने पुतिन से यूक्रेन में परमाणु हथियारों का उपयोग न करने का आग्रह किया था. कुछ ही दिनों बाद, रूसी पक्ष ने घोषणा की कि वे बेलारूस में परमाणु हथियार तैनात करेंगे. कुछ लोगों ने इसे रूस के बाहरी दबाव का जानबूझकर विरोध करने और यह याद दिलाने के रूप में देखा कि वह स्वतंत्र है.

यूक्रेन में रूस का लंबा खिंचता युद्ध कई मायनों में उसे एक बोझ बना सकता है, लेकिन ताइवान पर संभावित आक्रमण के विकल्पों पर विचार कर रहे चीन के लिए यह एक रणनीतिक संपत्ति भी है. गाबुएव कहते हैं, "सैन्य तकनीकों के संदर्भ में रूस के पास काफ़ी कुछ है, जैसे कि कुछ विशेष उपकरण जिन्हें वह अभी भी बेच सकता है, और कुछ चीनी उपकरणों या पुर्जों का परीक्षण करना."

रूस के पास विशाल ऊर्जा संसाधन भी हैं, जो चीन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं. मई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पुतिन ने कहा कि दोनों पक्ष तेल और गैस सहयोग में 'एक बहुत महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाने' के बहुत करीब हैं.

संभवतः वह पावर ऑफ साइबेरिया पाइपलाइन की ओर संकेत कर रहे थे, जिसके लिए रूसी गैस दिग्गज गजप्रोम और चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने कथित तौर पर वर्षों से रुकी हुई बातचीत के बाद एक प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

यदि यह पाइपलाइन बनती है, तो यह एक बड़ा बदलाव लाने वाली साबित होगी. यह मंगोलिया के ज़रिये चीन को 50 अरब घन मीटर रूसी गैस पहुंचाएगी.

और होर्मुज़ स्ट्रेट में जारी संकट के बीच रूसी ऊर्जा पर चीन का दांव अब नतीजे देता हुआ दिखाई दे रहा है. यह सिर्फ़ कीमतों का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक लगातार अस्थिर होते विश्व में चीन की घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के भविष्य को सुनिश्चित करने का सवाल है.

साझेदार, सहयोगी नहीं

जब भी चीन और रूस के बीच मतभेद नजर आते हैं, तो उनके संबंधों के केंद्र में एक सरल सच्चाई स्पष्ट हो जाती है: किसी भी देश के लिए दूसरे का अनुसरण करना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि यह एक औपचारिक गठबंधन नहीं है.

मॉस्को में ऑस्ट्रेलियाई दूतावास के पूर्व उप प्रमुख बोबो लो कहते हैं कि सैन्य गठबंधन की कठोरता के बजाय यही रणनीतिक लचीलापन इस साझेदारी को मज़बूती देता है.

वह कहते हैं, "यह कोई गठबंधन नहीं है, बल्कि एक लचीली रणनीतिक साझेदारी है," जो बार-बार इसके टूटने की भविष्यवाणियों के बावजूद कायम रही है.

पश्चिमी विश्लेषक अक्सर चीन-रूस साझेदारी को दो तरीकों में चित्रित करते हैं: या तो 'निरंकुशता की धुरी' के रूप में, जो मुख्यतः पश्चिम को परास्त करने की इच्छा से जुड़ी है, या एक कमज़ोर भाईचारे के रूप में, जो हमेशा टूटने के कगार पर रहता है.

इनमें से कोई भी दृष्टिकोण पूरी तरह यह नहीं दर्शाता कि कैसे इन दो पड़ोसी देशों के बीच एक ऐसा महत्वपूर्ण और लगातार अपरिवर्तनीय रिश्ता बन गया है, जो अपनी असमानताओं और भिन्नताओं के बावजूद, साझा हितों से जुड़ा हुआ है.

और लो कहते हैं कि भले ही पश्चिम के साथ उनके संबंध बेहतर हो जाएं, तब भी इन दोनों देशों के पास साथ बने रहने के लिए काफ़ी वजहें हैं.

इनमें सबसे प्रमुख है उनकी 4,300 किमी लंबी साझा सीमा, जो पहले असुरक्षा का केंद्र रही है. इसके बाद उनकी परस्पर पूरक अर्थव्यवस्थाएं हैं: रूस एक प्रमुख तेल, गैस और अन्य कच्चे माल का निर्यातक है, और चीन की औद्योगिक अर्थव्यवस्था उनके लिए एक विशाल बाज़ार प्रदान करती है. और एक अमेरिका-नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था के प्रति उनका साझा विरोध नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.

मानवाधिकार सहित अलग-अलग मूल्यों के आधार पर प्रतिबंध लगाने और दंडित करने वाले पश्चिमी देशों के विपरीत रूस और चीन एक-दूसरे की कार्रवाइयों पर निर्णय नहीं सुनाते. चीन के शिनजियांग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघनों के बार-बार लगे आरोप, जिन्हें चीन खारिज करता है, और रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवालनी की मृत्यु ने कुछ पश्चिमी देशों को इन देशों के साथ जुड़ने को लेकर अधिक सावधान बना दिया है, लेकिन चीन और रूस इन मुद्दों को नज़रअंदाज करते हैं.

गाबुएव कहते हैं, "वे शिनजियांग, रूसी नवालनी को जहर दिए जाने आदि मामलों पर एक-दूसरे की आलोचना नहीं करते." "और संयुक्त राष्ट्र में स्थानीय सरकारों से जुड़े कई मुद्दों पर उनके विचार पूरी तरह मेल खाते हैं… इससे एक स्वाभाविक सहजीवी संबंध बनता है."

वह यह भी जोड़ते हैं कि दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की एक लंबी परंपरा रही है. वह कहते हैं, "एक अधिक व्यावहारिक रिश्ते की ओर यह प्रवृत्ति… आंद्रोपोव, चेर्नेंको, गोर्बाचेव, येल्तसिन के सोवियत काल से चली आ रही है. और मुझे लगता है कि चीनी पक्ष भी इसी तरह रहा है."

जहां तक यह सवाल है कि क्या यह रिश्ता लंबे समय तक कायम रहेगा, नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर एक चीनी विश्लेषक कहते हैं कि दोनों देशों द्वारा चीन-रूस संबंधों को एक अविभाज्य जोड़ी के रूप में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना आंशिक रूप से औपचारिक प्रदर्शन है, जिसका उद्देश्य एकता और स्थिरता का संदेश देना है.

वास्तव में, यह कभी-कभी परस्पर हितों में आने वाले मतभेदों को सहज बनाने का एक उपयोगी राजनीतिक साधन है. हालांकि दोनों सरकारें कथित 'पश्चिमी वर्चस्व' का विरोध करती हैं लेकिन इस मुद्दे पर उनके दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं. विश्लेषकों का मानना है कि रूस एक ऐसी विश्व व्यवस्था बनाना चाहता है जो पूरी तरह अमेरिका को दरकिनार कर दे, लेकिन चीन अधिक सतर्क और व्यावहारिक बना रहता है. माना जाता है कि आमतौर पर चीन जल्दबाज़ी में निर्णय लेने से बचता है और दीर्घकालिक परिणाम सुरक्षित करने के लिए धैर्य और क्रमिक प्रगति को प्राथमिकता देता है.

चीनी विश्लेषक ने ईरान में अमेरिकी कार्रवाइयों पर चीन की प्रतिक्रिया की ओर इशारा करते हुए कहा कि बीजिंग ने संतुलित प्रतिक्रिया दी और ट्रंप की यात्रा की अपनी तैयारियों को रद्द नहीं किया. वह कहते हैं, "यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि चीन उकसावे से बचना चाहता है और दरवाज़े बंद नहीं करना चाहता." उनके अनुसार, चीन अभी भी वॉशिंगटन के साथ संवाद के दरवाज़े खुले रखना चाहता है और अनावश्यक उकसावे से बचना चाहता है, जो रूस के दृष्टिकोण से स्पष्ट रूप से अलग है.

मानवीय पक्ष

इस साझेदारी की अक्सर भू-राजनीति और सुरक्षा के दृष्टिकोण से चर्चा होती है, लेकिन एक और महत्वपूर्ण पहलू है दोनों समाजों के लोगों के बीच संबंधों की गहराई.

ऊपरी स्तर से, पुतिन और शी ने अपने बीच एक बेजोड़ मित्रता को प्रदर्शित करने की कोशिश की है. यह पुतिन की चीन की 25वीं यात्रा है.

चीन में ब्रिटेन के पूर्व राजनयिक चार्ल्स पार्टन को लगता है कि सबसे ऊंचे राजनीतिक स्तर पर इस घनिष्ठता के बावजूद, आम चीनी और रूसियों के बीच स्वाभाविक सांस्कृतिक जुड़ाव संदेहपूर्ण हैं.

वह कहते हैं, "क्या चीनी लोग मॉस्को में पढ़ना चाहते हैं, वहीं बसना चाहते हैं और वहां फ्लैट खरीदना चाहते हैं? नहीं."

उनका मानना है कि यदि विकल्प दिया जाए, तो रूसी लोग बीजिंग की बजाय पेरिस, लंदन या साइप्रस जैसे स्थानों में निवेश करना और वहां फ्लैट खरीदना अधिक पसंद करते हैं.

लेकिन उनकी बात से सभी सहमत नहीं हैं. गाबुएव का तर्क है कि लोगों के बीच संपर्क तेजी से बढ़ रहा है. यह आंशिक रूप से पश्चिमी प्रतिबंधों और सख्त यूरोपीय वीज़ा नीतियों की वजह से भी बढ़ा, जो रूसियों को चीन की ओर धकेल रही हैं.

रूसियों के लिए चीन की यात्रा करना अब काफ़ी आसान हो गया है. आपसी वीज़ा-मुक्त व्यवस्था का मतलब है कि मॉस्को से रोज़ जाने वाली कई उड़ानों में से किसी एक को लेकर सिर्फ़ कुछ ही घंटों में चीन के बड़े शहरों में पहुंचा जा सकता है.

रूसियों का चीनी फ़ोनों का इस्तेमाल और चीनी कारें चलाना भी बढ़ रहा है, ख़ासकर मॉस्को पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद.

गाबुएव कहते हैं, "तो आपसी जुड़ाव, वीज़ा-मुक्त यात्रा और भुगतान व आवागमन की सुविधा ने चीन को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा करीब ला दिया है."

"और फिर विनिमय कार्यक्रम, छात्रवृत्तियां और संयुक्त शोध कार्यक्रम दोनों समाजों को और करीब लाते हैं."

हालांकि रूस और चीन के बीच बढ़ता असंतुलन लंबे समय में एक कमज़ोरी का संकेत देता है, लेकिन संबंध टूटने की किसी भी तरह की भविष्यवाणियां दूर की कौड़ी लगती हैं, कम से कम निकट भविष्य में.

दोनों के बीच मतभेदों के बावजूद, लो कहते हैं, "चीन-रूस साझेदारी मज़बूत बनी हुई है. दोनों पक्ष समझते हैं कि यह इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे विफल नहीं होने दिया जा सकता, ख़ासकर तब जब सहयोग जारी रखने के अलावा कोई ठोस विकल्प मौजूद नहीं है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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