होर्मुज़ में भारतीय जहाज़ डूबने से गुजरात के एक नाविक की मौत, जहाज़ के मालिक ने क्या बताया

होर्मुज जलडमरूमध्य में एक जहाज पर कथित हमले में एक नाविक अल्ताफ केर की मौत हो गई

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    • Author, गोपाल कटेशिया
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

होर्मुज़ स्ट्रेट में गुजरात के एक जहाज़ पर पिछले दिनों कथित हमले में एक नाविक की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए.

जहाज़ के मालिक के अनुसार, माल लादने के बाद जहाज़ फ़ारस की खाड़ी में स्थित दुबई बंदरगाह से यमन के अल मकाला बंदरगाह के लिए रवाना हुआ था, लेकिन युद्ध के बाद जहाज़ों की आवाजाही के लिए बहुत ख़तरनाक हो चुके होर्मुज़ स्ट्रेट में पहुंचने पर उस पर हमला हुआ और वह 'कुछ ही देर में डूब गया'.

जैसे ही जहाज़ पलटा, उस पर सवार 18 नाविक समुद्र में कूद गए. जहाज़ के मालिक के अनुसार हमले के दौरान उनमें से पांच पहले ही गंभीर रूप से घायल हो चुके थे और उनमें से एक, अल्ताफ़ केर, की मदद पहुंचने में काफ़ी देर होने की वजह से मौत हो गई.

हालात को देखते हुए, मृतक नाविक के परिवार ने शव दुबई में दफ़नाने का फैसला किया है.

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जहाज़ ने होर्मुज़ स्ट्रेट में जाने का जोखिम क्यों उठाया?

गुजरात में माल को विदेशी बंदरगाहों तक पहुंचाने के लिए लकड़ी के जहाज़ों का इस्तेमाल सदियों पुराना है.

ये नौकाएं गुजरात से खाड़ी देशों के साथ-साथ अफ़्रीकी महाद्वीप के पूर्वी तट पर स्थित देशों तक माल की ढुलाई करती हैं.

ऐसी नौकाएं द्वारका ज़िले के वेरावल, पोरबंदर, सलाया बंदरगाह, जामनगर के रोज़ी बंदरगाह और कच्छ के टूना, मुंद्रा और मांडवी बंदरगाह से माल उठाती हैं.

इंडियन सेलिंग वेसल्स एसोसिएशन के महासचिव अदम भाया ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती को बताया कि सलाया का जहाज़, अल फ़ैज नूर-ए-सुलेमानी-1, 7 मई की दोपहर को दुबई बंदरगाह से खाड़ी देश यमन के अल मक्का बंदरगाह के लिए रवाना हुआ.

सलाया में अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के निर्माण के दौरान ली गई तस्वीर. जहाज चार साल पुराना था

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अदम भाया ने कहा, "जहाज़ पर 8 मई की सुबह हमला हुआ और वह डूबने लगा. कई घंटों बाद, सलाया का जहाज़, प्रेमसागर, अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के चालक दल (नाविकों) की सहायता के लिए पहुंचने में सक्षम हुआ."

अदम भाया का दावा है कि अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध में क्षतिग्रस्त होने वाला पहला भारतीय जहाज़ है.

अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के मालिक सुलेमानभाई भाया ने बीबीसी को बताया कि अप्रैल के पहले सप्ताह में अमेरिका-ईरान के युद्धविराम समझौते पर पहुंचने के बाद उन्होंने होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाज़ को ले जाने का जोखिम उठाया था.

सुलेमानभाई ने कहा, "अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम से स्थिति में सुधार हुआ था. सब कुछ सामान्य लग रहा था. ईरान ने भारत के लिए कच्चे तेल और गैस ले जाने वाले टैंकरों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने की अनुमति दे दी थी. इसलिए, मैंने लगभग दस दिन पहले यमन से दुबई के लिए अपना जहाज़ भेजा था."

"दुबई जाते समय होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने में मेरे जहाज़ को कोई समस्या नहीं हुई. दुबई पहुंचने के बाद, मैंने जहाज़ को तुरंत समुद्र में न भेजने का फैसला किया, लेकिन दस दिनों के भीतर जहाज़ माल से भर गया. साथ ही, फ़ारस की खाड़ी और होर्मुज़ स्ट्रेट में स्थिति शांतिपूर्ण थी. यूएई सीमा शुल्क विभाग ने भी मेरे जहाज़ को दुबई बंदरगाह से निकलने की अनुमति दे दी, जिसका मतलब था कि समुद्र में जाना सुरक्षित था."

सलाया के जहाज़ पर किन परिस्थितियों में हमला हुआ?

मृतक अल्ताफ केर की फाइल फोटो

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सुलेमानभाई ने बताया कि अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी जहाज़ 7 मई को स्थानीय समयानुसार दोपहर लगभग 1 बजे दुबई बंदरगाह से यमन के लिए रवाना हुआ.

"लगभग बारह घंटे की यात्रा के बाद, जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट में प्रवेश कर गया. हमारे जहाज़ का ट्रांसपोंडर चालू था ताकि आस-पास के जहाज़ों और तटवर्ती एजेंसियों को पता चल सके कि यह जहाज़ किस देश का है. हमारे जहाज़ पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज भी फहरा रहा था ताकि एजेंसियां दूर से ही जान सकें कि यह एक भारतीय जहाज़ है."

उन्होंने कहा, "इसके अलावा, हमारे जहाज़ पर माल की मौजूदगी दर्शाने वाली बत्तियां भी जल रही थीं. हालांकि, 8 मई को लगभग 1 बजे, हमारे जहाज़ पर ओमान के तट की ओर वाले हिस्से से हमला किया गया. हमले से पहले किसी ने भी हमारे जहाज़ को कोई चेतावनी नहीं दी."

सुलेमानभाई ने दावा किया कि जब अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 पर हमला हुआ था, तब अमेरिकी नौसेना का एक युद्धपोत पास ही मौजूद था.

अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के मालिक सुलेमानभाई भाया का कहना है कि उन्होंने इस जहाज़ के निर्माण पर अपनी जीवन की कमाई खर्च़ कर दी

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इमेज कैप्शन, अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के मालिक सुलेमानभाई भाया का कहना है कि उन्होंने इस जहाज़ के निर्माण पर अपनी जीवनभर की कमाई खर्च़ कर दी थी

सुलेमानभाई कहते हैं, "हमले के बाद से मैंने अपने जहाज़ के कप्तान से दो बार बात की है. हमले के समय अमेरिकी नौसेना का एक जहाज़ पास ही था. शायद नौसेना का जहाज़ उस क्षेत्र से किसी जहाज़ को सुरक्षित निकालने के लिए वहां मौजूद था."

"अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध से हमारा कोई लेना-देना नहीं है. हम अपने लोगों को काम पर भेजते हैं, लड़ने के लिए नहीं. हम निर्दोष हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि हमारा जहाज़ दोनों देशों के बीच गोलीबारी में फंस गया. हम यह नहीं कह सकते कि किस देश ने हमारे जहाज़ पर हमला किया, लेकिन एक बात निश्चित है: हमला हमारे जहाज़ के ईरानी हिस्से पर नहीं, बल्कि ओमान की तरफ हुआ."

बीबीसी स्वतंत्र रूप से इस बात की पुष्टि नहीं कर पाया है कि कथित हमले के समय अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के पास अमेरिकी नौसेना का कोई युद्धपोत मौजूद था या नहीं.

हालांकि, दुबई स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के नाविक की मौत की पुष्टि की और कहा कि जहाज़ में आग लग गई थी.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में, दूतावास ने कहा, "एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में, समुद्र में एक लकड़ी के भारतीय जहाज़ में आग लग गई, जिसमें एक नाविक की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए. उन्हें वहां से एक गुज़रते हुए जहाज़ ने बचा लिया."

"भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने बचाए गए भारतीयों से मुलाकात की है. घायलों को चिकित्सा उपचार प्रदान किया जा रहा है. दुबई स्थित भारतीय कॉन्सुलेट जनरल (महावाणिज्य दूतावास) जहाज़ के मालिक के संपर्क में है और हर संभव सहायता प्रदान कर रहा है."

नाविकों ने 10 घंटे तक मौत से लड़ाई कैसे लड़ी?

प्रेम सागर पर सवार अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के नाविकों को बचाए जाने के बाद

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सुलेमानभाई ने बताया कि अल फैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 हमले के कुछ ही मिनटों में डूब गया. उन्होंने कहा, "अगर किसी जहाज़ में छेद हो जाए तो वह दो दिन तक नहीं डूबता. यहां तक कि आग लगने पर भी वह एक दिन तक तैरता रहता है, लेकिन हमारे जहाज़ पर शक्तिशाली हथियार से हमला किया गया. परिणामस्वरूप, हमारा जहाज़ फंस गया और कुछ ही मिनटों में डूब गया."

जहाज़ के मालिक ने बताया कि अल फैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के कप्तान (टंडेल) अमीन सुम्भानिया और चार अन्य नाविक गंभीर रूप से घायल हो गए. घायल नाविकों में से एक, 42 वर्षीय अल्ताफ़ केर, ने बाद में दम तोड़ दिया.

सुलेमानभाई ने कहा, "जहाज़ कुछ ही मिनटों में डूबने वाला था, इसलिए हमारे चालक दल के सदस्यों (नाविकों) को तुरंत समुद्र में कूदना पड़ा. हमारे जहाज़ में 1,000 लीटर पानी भरने की क्षमता वाला पीवीसी टैंक था. चालक दल के सदस्य उससे चिपक गए. चूंकि अल्ताफ को गंभीर चोटें आई थीं, इसलिए कप्तान ने उसे टैंक पर ही रखा."

"हमले के बाद, टंडेल ने मुझे फोन किया और घटना की जानकारी दी. मैंने तुरंत इंडियन सेलिंग वेसल्स एसोसिएशन से संपर्क किया. आखिरकार हमें पता चला कि सलाया का अपना जहाज़, प्रेमसागर, दुबई जा रहा था और हमारे जहाज़ के पास ही था. इसलिए, हमने उसके मालिक और फिर उसके कप्तान से संपर्क किया और मदद मांगी, लेकिन जब तक प्रेमसागर अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 की तलाश में घटनास्थल पर पहुंचा, तब तक सुबह के 10 बज चुके थे. तब तक अल्ताफ़ की मौत हो चुकी थी."

सुलेमानभाई ने आगे बताया कि अल्ताफ़ एक मैकेनिक के रूप में काम करते थे.

युद्धविराम के बावजूद होर्मुज़ स्ट्रेट इतना ख़तरनाक क्यों है?

मार्च 2012 में होर्मुज़ स्ट्रेट में ओमान के तट पर जहाज़ों की तस्वीर

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होर्मुज़ स्ट्रेट फ़ारस की खाड़ी का संकरा हिस्सा है. यह संकरा जलमार्ग फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है. इसके उत्तरी किनारे पर ईरान और दक्षिणी किनारे पर ओमान स्थित है.

इराक़, कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान आदि खाड़ी देश कच्चे तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के प्रमुख निर्यातक हैं. ये देश मुख्य रूप से फ़ारस की खाड़ी में स्थित अपने बंदरगाहों के माध्यम से आयात और निर्यात करते हैं. दुबई बंदरगाह भी वस्तुओं के आयात और निर्यात का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र है.

फ़ारस की खाड़ी में प्रवेश करने या बाहर निकलने के लिए जहाज़ों, टैंकरों और जलयानों को होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रना पड़ता है. फ़ारस की खाड़ी से जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते ओमान की खाड़ी में प्रवेश कर सकते हैं, और ओमान की खाड़ी से जहाज़ अरब सागर में प्रवेश कर सकते हैं. अरब सागर से जहाज़ दुनिया भर के विभिन्न देशों के बंदरगाहों तक जा सकते हैं.

युद्ध शुरू होने के बाद से, ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी कर रखी है और अमेरिका, इसराइल और उनके समर्थकों के जहाज़ों के इस स्ट्रेट से गुज़रने पर प्रतिबंध लगा दिया है. हालांकि, ईरान बार-बार कहता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट अन्य देशों के लिए खुला है.

प्रेम सागर पर सवार अल फैज नूर-ए-सुलेमानी-1 के नाविकों को बचाए जाने के बाद

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दूसरी ओर, खबरों के मुताबिक, ईरान ने युद्धविराम लागू होने के बाद भी नाकाबंदी जारी रखी है. अमेरिका ने इस समुद्री मार्ग पर ईरान की पकड़ ढीली करने और इसे जहाज़ों के लिए खोलने के प्रयास में ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी की घोषणा की थी .

अमेरिका ने घोषणा की है कि वह अरब सागर से ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले जहाज़ों को रोकेगा और होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने के लिए ईरान को शुल्क का भुगतान करने वाले किसी भी जहाज़ को भी रोका जाएगा.

पिछले सप्ताह, अमेरिका ने प्रोजेक्ट फ़्रीडम की घोषणा की , जिसके तहत होर्मुज़ स्ट्रेट से व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए युद्धपोत भेजे जाएंगे. हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कुछ घंटों के लिए इसके कार्यान्वयन को रोक दिया.

मृतक नाविक का अंतिम संस्कार दुबई में क्यों किया जाएगा?

अल्ताफ केर की फाइल फोटो

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सुलेमानभाई ने बताया कि प्रेमसागर जहाज़ ने 8 मई की रात को अल फ़ैज़ नूर-ए-सुलेमानी-1 के नाविकों को दुबई पहुंचाया था. उन्होंने कहा, "चारों घायलों को इलाज के लिए दुबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है. अल्ताफ़ केर का शव भी अस्पताल में रखा गया है."

अल्ताफ़ केर के चाचा गफ़्फ़ार केर ने सोमवार को बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनके परिवार ने फ़ैसला किया है कि अल्ताफ़ का अंतिम संस्कार दुबई में किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "शुक्रवार की सुबह जहाज़ का मालिक हमारे घर आया और हमें इस घटना की सूचना दी. हमारा मानना है कि किसी व्यक्ति को अरब की धरती पर दफ़नाया जाना बहुत शुभ होता है. इसलिए, हमारे परिवार ने अल्ताफ़ का अंतिम संस्कार दुबई में करने का निर्णय लिया है. यदि हम अंतिम संस्कार यहीं करने का निर्णय लेते हैं, तो वर्तमान परिस्थितियों में उनके पार्थिव शरीर को यहां पहुँचने में आठ से पंद्रह दिन लगेंगे. तब तक उनके पार्थिव शरीर को संभालना मुश्किल हो जाएगा और अंतिम बार उनका चेहरा देखना भी संभव नहीं होगा."

ग़फ़्फ़ार भाई ने बताया कि अल्ताफ़ केर एक बेटी और एक बेटे के पिता थे. उनका जन्म सलाया के नाविक परिवार में हुआ था और वह पिछले बीस सालों से जहाज़ों पर काम कर रहे थे.

उन्होंने आगे कहा, "अल्ताफ़ के बहनोई दुबई में हैं. वे वहां के अस्पताल के संपर्क में हैं. अस्पताल ने उन्हें बताया है कि शव अंतिम संस्कार के दिन उन्हें सौंप दिया जाएगा. मृत्यु प्रमाण पत्र आदि की प्रक्रिया अभी चल रही है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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