होर्मुज़ स्ट्रेटः कितनी ख़तरनाक होती हैं समुद्री बारूदी सुरंगें, इन्हें हटाना क्यों मुश्किल काम

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
ईरान जंग में समंदर में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंग का मामला एक बार फिर चर्चा में है.
गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी नौसेना को कहा है कि अगर होर्मुज़ स्ट्रेट में कोई भी ईरानी बोट बारूदी सुरंग बिछाती दिख रही हो तो उसे तुरंत तबाह कर दे.
होर्मुज़ स्ट्रेट से दुनिया की तेल और एलएनजी की 20 फ़ीसदी सप्लाई गुजरती है और ईरान ने इसे लगभग बंद कर दिया है.
वहीं अमेरिका बार-बार इस स्ट्रेट को अपनी सैन्य कार्रवाई के ज़रिये खुलवाने और यहां कथित तौर पर बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने की बात करता रहा है.
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आइए जानते हैं कि आख़िर समंदर में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंगें क्या होती हैं और ये कैसे काम करती हैं और इन्हें हटाना बहुत मुश्किल क्यों होता है.
ये कितनी ख़तरनाक हैं. युद्ध में इनकी क्या अहमियत है और इनका इतिहास क्या है?
समुद्री बारूदी सुरंगें क्या हैं?

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समुद्री बारूदी सुरंगें या सी माइंस पानी में रखे जाने वाले विस्फोटक डिवाइस होते हैं, जो पनडुब्बियों और जहाजों को तबाह करने के मक़सद से बनाए जाते हैं.
इनका इस्तेमाल दुश्मन के जहाज़ को किसी ख़ास समुद्री इलाके में आने या उसे वहीं रोकने में किया जाता है.
समुद्री बारूदी सुरंगें पुरानी तकनीक हैं. 14वीं सदी में पहली बार चीन ने समुद्री डाकुओं के ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल किया था.
अमेरिका में पहली बार समुद्री बारूदी सुरंग का इस्तेमाल वहां की क्रांति के दौरान हुआ था.
उस समय समुद्र में बारूद से भरे हुए ड्रम तैराए जाते थे जो टकराने पर फट जाते थे.
चीन में पहली बार बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल के बाद दुनिया के लगभग हर समुद्री युद्ध में इन सी माइंस का इस्तेमाल हुआ है.
पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के अलावा कोरिया, फॉकलैंड द्वीप समूह और खाड़ी युद्ध में इसका इस्तेमाल हुआ था.
डिफ़ेंस एक्सपर्ट राहुल बेदी कहते हैं कि समुद्री बारूदी सुरंगें ऑटोनॉमस यानी स्वतः विस्फोटक होती हैं.
वो कहते हैं, ''ये ऐसे विस्फोटक हैं जो टारगेटेड अटैक करते हैं. इन्हें इंटेलिजेंट माइंस भी कहा जाता है क्योंकि टैंकर, हमलावर जहाज़ या कमर्शियल जहाज़ में फ़र्क कर उनपर अटैक कर सकती हैं. इन्हें प्रोग्राम किया जाता है और इसी के आधार पर ये जहाज़ों में अंतर करती हैं और उन्हें टारगेट करती हैं.''
कितने प्रकार की समुद्री बारूदी सुरंगें

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समुद्री बारूदी सुरंगें टेक्नोलॉजी के विकास के साथ काफ़ी विकसित हो चुकी है.
रॉबर्ट स्ट्रॉस सेंटर फ़ार सिक्योरिटी एंड लॉ के मुताबिक़, ये सुरंगें तीन प्रकार की होती हैं.
कॉन्टैक्ट सुरंगें तब फटती हैं जब कोई जहाज़ उनसे सीधे टकराता है या बहुत क़रीब आ जाता है. इन्हें लगाना सबसे आसान होता है.
इनफ़्लुएंस सुरंगें तकनीकी तौर पर ज़्यादा एडवांस होती हैं और इसमें विस्फोट के लिए सीधे संपर्क में आने की ज़रूत नहीं होती.
ये सेंसर के ज़रिये जहाज से आने वाले ख़ास संकेतों को पहचान लेते हैं. इनमें चुंबकीय, ध्वनि, दबाव, सिज़्मिक (हलचल) या फिर पानी के नीचे के इलेक्ट्रॉनिक संकेत शामिल हो सकते हैं.
तीसरी कैटेगरी की बारूदी सुंरगें कंट्रोल्ड सुरंगें होती हैं जिनमें रिमोट के ज़रिये विस्फोट किया जाता है.
पानी में इन्हें कई तरीकों से लगाया जाता है-
ड्रिफ्टिंग माइंस
इन्हें पानी में डाला जाता है और ये धारा के साथ बहती रहती हैं
मूरड माइंस
ये बड़ी, लंगर (एंकर) से बंधी 'कॉन्टैक्ट' माइंस होती हैं, जो पानी की सतह के ठीक नीचे तैरती रहती हैं. जब कोई जहाज़ इनसे टकराता है, तो ये फट जाती हैं और लगभग 100 पाउंड या उससे अधिक एक्सप्लोसिव फ़ोर्स रिलीज करती हैं.
बॉटम माइंस
ये 'इनफ़्लुएंस' सुरंगें होती हैं, जो समुद्र तल पर रखी जाती हैं.
ये सेंसरों के कॉम्बिनेशन के इस्तेमाल से जहाज़ को पहचानती हैं और सैकड़ों पाउंड एक्सप्लोसिव फ़ोर्स के साथ फटती हैं.
लिम्पेट माइंस
ये छोटे विस्फोटक होते हैं, जिन्हें गोताखोर जहाज़ के ढांचे यानी हुल (आगे के हिस्से) के नीचे चिपका सकते हैं. इन्हें एक तय समय के बाद फटने के लिए टाइमर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
होर्मुज़ में ईरान की बारूदी सुरंगों का सच

अमेरिका के मुताबिक़ ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट में पांच से छह हज़ार बारूदी सुरंग बिछा रखी है.
इनमें कॉन्टैक्ट माइंस और इन्फ़्लुएंस माइंस दोनों हैं, जिन्हें हाई स्पीड बोट का इस्तेमाल कर तेज़ी से बिछाया जा सकता है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, इस जंग के दौरान मार्च के मध्य में ईरान ने एक दर्जन बारूदी सुरंगें यहां बिछाई हैं.
लेकिन राहुल बेदी कहते हैं, "अभी किसी को पता नहीं है कि होर्मुज़ स्ट्रेट की वास्तविक स्थिति क्या है. यहां की स्थिति को लेकर काफ़ी कन्फ्यूज़न है. अमेरिकी जहाज़ कहां हैं और ईरान के जहाज़ का कंट्रोल कहां है, किसी को पता नहीं. इसलिए यहां की वास्तविक तस्वीर नहीं मिल पा रही है.''
वो कहते हैं, ''लेकिन इतना तय है कि अगर अमेरिकी दावों के मुताबिक़ ईरान ने इतनी ज़्यादा सी माइंस यहां बिछा रखी हैं तो उसने इस स्ट्रेट को वेपनाइज कर रखा है. यही ईरान की ताक़त बन गई है. क्योंकि समुद्र में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाना बहुत मुश्किल है और इसमें काफ़ी समय लगता है. एक तरह से ईरान ने इन्हें अपना स्ट्रैटेजिक वेपन (रणनीतिक हथियार) बना लिया है.''
बारूदी सुरंगों को हटाना क्यों मुश्किल काम है?

अमेरिका का कहना है कि उसके माइंस स्वीपर इन सुरंगों को ढूंढ कर इन्हें हटाने के काम में लगे हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़ इन्हें ढूंढना और हटाना बहुत मुश्किल समय लेने वाला काम है.
सी माइंस को लगाना बहुत आसान है लेकिन हटाना मुश्किल है. ये समुद्र की सतह, इसके अंदर या फिर समुद्र तल पर हो सकती हैं.
अगर वो तैर रही हों तो समुद्री धाराओं की वजह से अपनी जगह बदल सकती हैं.
एक बार साफ़ कर देने के बावजूद वो जगह फिर से ख़तरनाक हो सकती है.
ईरान को खुद पता नहीं है कि उसकी माइंस कहां हैं. क्योंकि हो सकता है कि इन्हें जल्दबाज़ी में बिछाया गया हो.
या फिर हर माइंस की लोकेशन रिकार्ड नहीं की गई हो या कुछ माइंस को जानबूझकर बहने को लिए छोड़ दिया गया हो.
राहुल बेदी कहते हैं, "बारूदी सुरंगों को हटाना बहुत मुश्किल, पेचीदा काम है और इसमें काफ़ी समय लगता है. ईरान को भी ये पता है. होर्मुज़ में कितनी सुरंगें हैं इसके बारे में किसी को पक्के तौर पर पता नहीं है लेकिन यहां ईरान ने सी माइंस लगाने की बात कर फ़िलहाल एक मनोवैज्ञानिक बढ़त बना रखी है."
विशेषज्ञों के मुताबिक़, दो तरीके से माइंस हटाए जाते हैं. माइंस स्वीपिंग के ज़रिये और माइंस हंटिंग के ज़रिये. माइंस स्वीपिंग में जहाज़ तार या उपकरण खींचकर माइंस को काटते हैं और उन्हें ऊपर लाकर नष्ट करते हैं.
वहीं माइंस हंटिंग में सोनार से माइंस खोजी जाती हैं. उन्हें रोबोट या ड्रोन से नष्ट किया जाता है फिर गोताखोरों की मदद लेनी पड़ती है.
भारत की क्या स्थिति है
राहुल बेदी के मुताबिक़ भारत ने कभी समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल नहीं किया है.
वो कहते हैं, ''भारत के पास सोवियत ज़माने या रूस के दस बारह माइंस स्वीपर थे. लेकिन आज़ की तारीख़ में उसके पास कोई माइंस स्वीपर नहीं है.''
''पिछले तीन-चार साल में भारत ने कोशिश की है कि इसका कॉन्ट्रैक्ट दिया जाए. साउथ कोरिया और इटली के साथ बात चल रही थी. लेकिन इस पर बात नहीं बन पाई है.''
''माइंस स्वीपर स्पेशल जहाज़ होता है. उनकी हार्डवेयर माइंस तलाशने के लिए बनाई जाती हैं. इसके ख़ास टूल होते हैं जो इन्हें हटाते हैं.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित




































