कैसे होती है कृत्रिम वर्षा और प्रदूषण से निपटने में कितनी कारगर?

कृत्रिम वर्षा
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में आर्टिफिशियल रेन यानी कृत्रिम वर्षा कोई नया टर्म नहीं है. बाढ़, सूखा, हीटवेव, तूफ़ान, जंगल में आग जैसी सूरतों में स्थिति को काबू करने के विकल्प के रूप में कृत्रिम वर्षा की चर्चा होती है.

फिलहाल इसकी चर्चा दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण और इसके कारण गंभीर होते हालात के मद्देनज़र हो रही है.

दिल्ली में बीते कई दिनों से प्रदूषण का स्तर ‘गंभीर’ बना हुआ है. गंभीर से यहां मतलब है कि दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 401 से 500 के बीच बना हुआ है.

एक्सपर्ट के मुताबिक जब एक्यूआई शून्य और 50 के बीच हो उसे 'अच्छा' कहा जाता है. 51 और 100 के बीच 'संतोषजनक' 101 और 200 के बीच 'मध्यम', 201 और 300 के बीच 'खराब', 301 और 400 के बीच 'बहुत खराब' 401 और 500 के बीच 'गंभीर' माना जाता है.

गंभीर प्रदूषण स्तर से निपटने और इसे नियंत्रित करने के लिए दिल्ली सरकार ने एक के बाद एक कई घोषणाएं की हैं.

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने बताया है कि सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए क्या कुछ कदम उठाने जा रही है. जितने उपाय सरकार द्वारा सुझाए गए हैं, उनमें क्लाउड सीडिंग के माध्यम से कृत्रिम बारिश करवाने के सुझाव की ख़ूब चर्चा है.

गोपाल राय

दिल्ली सरकार में मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा है, "दिल्ली की भूवैज्ञानिक स्थिति ऐसी है कि साल के इस समय में दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई शहर प्रदूषण से ग्रसित रहते हैं... कृत्रिम वर्षा से उसका इलाज किया जा सकता है... कल IIT कानपुर के एक्सपर्ट्स के साथ हमारी मीटिंग हुई है... अगर सुप्रीम कोर्ट की सहमति मिल जाए तो सरकार इसे बहुत जल्द ही करवाना चाहती है. अगर ये चीज सफल साबित हुई तो दिल्ली ही नहीं पूरे उत्तर भारत में हमारे सामने बड़ी कारगर तकनीक आ जाएगी..."

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कृत्रिम वर्षा क्या है? ये कैसे होती है और प्रदूषण से निपटने में ये कितनी कारगर है?

इन तमाम सवालों के लिए हमने बात की आईआईटी कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग प्रोफेसर एस.एन त्रिपाठी से. नीचे दी गई जानकारी इसी बातचीत पर आधारित है.

क्या होती है कृत्रिम वर्षा?

चीन

जब वायुमंडल में प्रकृतिक रूप से बने बादल ख़ुद बरसात कराते हैं तो उसे नैचुरल रेन यानी प्राकृतिक वर्षा कहते हैं.

लेकिन कई बार ऐसा होता है कि बादल बनते हैं पर उनके अंदर की कुछ अपूर्ण प्रक्रियाओं के कारण वो बारिश नहीं करा पाते. या बरसात होती भी है तो वो केवल बादलों तक रह जाती है, धरती तक नहीं पहुंच पाती.

तो एक ख़ास तकनीक के तहत जब बादलों में बरसात के बीज डालकर में वर्षा कराई जाती है, तो उसे कृत्रिम वर्षा कहते हैं. इस तकनीक का नाम है क्लाउड सीडिंग.

क्लाउड सीडिंग तकनीक क्या होती है?

'क्लाउड सीडिंग', दो शब्द क्लाउड और सीडिंग से बना है.

क्लाउड का अर्थ है बादल और सीडिंग का मतलब है बीज बोना.

सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन आसान शब्दों में कहें तो बादलों में बारिश के बीज बोने की प्रक्रिया को क्लाउड सीडिंग कहते हैं.

ध्यान देने वाली बात ये है कि बीज के रूप में सिल्वर आयोडाइड, पोटैसियम क्लोराइड और सोडियम क्लोराइड जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है.

इन पदार्थों को एयरक्राफ्ट आदि की मदद से बादलों में छिड़का जाता है.

ये पदार्थ बादल में मौजूद पानी की बूंदों को जमा देती हैं. जिसके बाद बर्फ़ के टुकड़े दूसरे टुकड़ों के साथ चिपक जाते हैं और बर्फ़ के गुच्छे बन जाते हैं. ये बर्फ के गुच्छे ज़मीन पर गिरते हैं.

क्लाउड
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क्लाउड सीडिंग का एक लंबा इतिहास है.

अमेरिकी वैज्ञानिक विंसेंट जे. शेफ़र ने क्लाउड सीडिंग का आविष्कार किया था.

इसकी जड़ें 1940 के दशक में मिलती हैं, ख़ासतौर पर उस दौरान अमेरिका में इस पर काम हुआ.

प्रोफेसर एस.एन त्रिपाठी बताते हैं, ''जहां कोई भी बादल नहीं है, वहां आप सीडिंग नहीं कर सकते. तो सबसे पहले आप देखते हैं कि बादल हैं या नहीं, हैं तो किस ऊंचाई पर है, उनके और वातावरण की विशेषताएं क्या हैं. फिर पूर्वानुमान के सहारे या माप कर, ये पता लगाते हैं कि बादल में कितना पानी है. इसी के बाद बादलों में उपयुक्त स्थानों पर एक विशेष तरह का केमिकल (साल्ट या साल्ट का मिश्रण) डालते हैं. ये केमिकल बादल के माइक्रोफिजिकल प्रोसेस (यानी बारिश के कण, बर्फ़) को तेज़ कर देता है. जिसके बाद बरसात के रूप में ये ज़मीन पर गिरती है.''

बादलों को इलेक्ट्रिक शॉक देने की भी एक तकनीक है, जिसके इस्तेमाल से बारिश करवाई जा सकती है. इसमें ड्रोन तकनीक की मदद से बादलों को इलेक्ट्रिक शॉक दिया जाता है.

यूएई ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर साल 2021 में कृत्रिम वर्षा करवाई थी.

कब पड़ती है कृत्रिम वर्षा की ज़रूरत?

दिल्ली

आमतौर पर सूखे और बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश करवाई जाती है.

इसके अलावा जंगल में भीषण आग लगने, असहनीय गर्मी या हीट वेव, तूफ़ान और प्रदूषण को कम करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है.

इसराइल नियमित तौर पर कृत्रिम वर्षा करवाता है क्योंकि यहां प्राकृतिक बारिश बहुत कम होती है. आज के व़क्त में संयुक्त अरब अमीरात भी रिसर्च प्रोग्राम और ऑपरेशनल प्रोग्राम में कृत्रिम वर्षा करवाता है.

प्रदूषण नियंत्रण में कितनी कारगर?

इसराइल नियमित तौर पर कृत्रिम वर्षा करवाता है क्योंकि वहां प्राकृतिक बारिश बहुत कम होती है. आज के व़क्त में संयुक्त अरब अमीरात भी रिसर्च प्रोग्राम और ऑपरेशनल प्रोग्राम में यूज करता है.

चीन ने साल 2008 में बीजिंग ओलंपिक्स के दौरान एयरक्राफ्ट और ग्राउंड बेस्ड गन की मदद से क्लाउड सीडिंग की. जिसके बाद उन्हें प्रदूषण को नियंत्रित करने में काफ़ी मदद मिली.

प्रदूषण

भारत की बात करें तो यहां पहले भी क्लाउड सीडिंग होती रही है लेकिन अब तक यह विदेशी एयरक्राफ्ट, विदेश के सीडिंग टूल और विदेश के ही वैज्ञानिक, इंजीनियर की मदद से किया गया है.

पहली बार ऐसा है कि आईआईटी कानपुर ने अपना साल्ट यानी केमिकल डेवेलप किया है, एयरक्राफ्ट आईआईटी कानपुर का है और सीडिंग टूल भी हमने खुद ही तैयार किए हैं. तो दिल्ली में अगर इसको इस्तेमाल में लाया जाएगा तो यह पूर्ण रूप से स्वदेशी होगा.

और जहां तक बात इसके कारगर साबित होने की है तो ये सीडिंग पर निर्भर करता है.

अगर सीडिंग सही तरीके से हुई तो हर लिहाज़ से ये कारगर साबित होगा क्योंकि एक बड़े क्षेत्र में जब बरसात होती है तो प्रदूषण अपने आप नियंत्रित हो जाता है.

पहले कब-कब प्रयोग में आया?

मौजूदा समय में कई देश इसका इस्तेमाल करते हैं.

साल 2017 में संयुक्त राष्ट्र के मौसम से जुड़े संगठन ने अनुमान ज़ाहिर किया कि 50 से ज़्यादा देश क्लाउड सीडिंग को अब तक आज़मा चुके हैं.

इनमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, इथियोपिया, जिंबाब्वे, चीन, अमेरिका और रूस शामिल हैं.

यहां तक की भारत ने भी इसका प्रयोग किया हुआ है.

लेकिन भारत की ही तरह प्रदूषण की मार झेल रहा चीन इसका सबसे अधिक इस्तेमाल करता है.

साल 2008 में, बीजिंग में आयोजित की गई ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों से पहले चीन ने पहली बार क्लाउड सीडिंग तकनीक का इस्तेमाल किया था.

वहीं भारत ने साल 1984 में इसका पहली बार इस्तेमाल किया. तमिलनाडु तब भयंकर सूखे का सामना कर रहा था. जिसके बाद तत्कालीन तमिलनाडु सरकार ने 1984-87,1993-94 के बीच क्लाउड सीडिंग तकनीक की मदद ली.

साल 2003 और 2004 में कर्नाटक सरकार ने भी क्लाउड सीडिंग का प्रयोग किया. उसी साल महाराष्ट्र सरकार ने भी इसकी मदद ली.

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