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यूएई का बाहर निकलना ओपेक के लिए कितना बड़ा झटका, दुनिया पर इसका क्या असर होगा?
- Author, फ़ैसल इस्लाम
- पदनाम, इकॉनॉमिक्स एडिटर
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ओपेक यानी ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ से अचानक बाहर निकलने के एलान को एक बड़ी घटना माना जा रहा है.
संयुक्त अरब अमीरात 1971 में राष्ट्र बना था
अमीरात इस संगठन के सदस्य तब से थे जब 1971 में वो एक राष्ट्र बना भी नहीं था.
ओपेक मुख्य रूप से खाड़ी के तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन है, जिसने कई दशकों तक उत्पादन घटा-बढ़ाकर और कोटा तय करके कच्चे तेल की क़ीमतों को नियंत्रित किया.
सीधी बात यह है कि यूएई अपनी अब तक की उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता था.
ओपेक के कोटा नियमों के कारण उसका उत्पादन 30 से 35 लाख बैरल प्रतिदिन तक सीमित था.
ओपेक के लिए झटका
ओपेक की स्थापना 1960 में पांच देशों ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने मिलकर की थी, ताकि उत्पादन का तालमेल बैठाकर तेल निर्यातकों के हितों की रक्षा की जा सके और सदस्यों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित हो.
समय के साथ इस उत्पादक संघ में देशों की संख्या बदलती रही है, लेकिन पांच संस्थापक सदस्यों के अलावा इसमें अल्जीरिया, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, लीबिया, नाइजीरिया और कांगो गणराज्य भी शामिल हैं.
यूएई 1967 में इसमें शामिल हुआ था, और इसके बाहर होने के बाद इसमें 11 सदस्य रह जाएंगे. वहीं ओपेक प्लस गठबंधन में इनके अलावा 10 ग़ैर-ओपेक सदस्य भी हैं, जिनमें रूस भी शामिल है.
खाड़ी क्षेत्र का तनाव यूएई के ईरान के साथ रिश्तों को प्रभावित कर रहा है और सऊदी अरब के साथ उसके पहले से तनावपूर्ण संबंधों पर भी असर पड़ सकता है.
जहां तक ओपेक का सवाल है, यह उसके लिए बड़ा झटका है. ख़ास कर, ऐसे समय में जब उसकी एकता और भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
मामला सिर्फ़ इतना नहीं है कि यूएई, जब समुद्र या पाइपलाइन के ज़रिये अपना तेल पूरी तरह बाज़ार में ला पाएगा तो उत्पादन 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाना चाहेगा.
बल्कि यह भी संभव है कि सऊदी अरब जवाब में तेल क़ीमतों की जंग छेड़ दे. यूएई की अर्थव्यवस्था डाइवर्सिफ़ाइड है. इसलिए वह इसे झेल सकता है, लेकिन ओपेक के ग़रीब सदस्य शायद नहीं झेल पाएंगे.
अमीराती अधिकारी अब अबू धाबी के तेल क्षेत्रों से नई पाइपलाइन बनाने की बात कर रहे हैं, जो होर्मुज़ स्ट्रेट को बाइपास करके फ़ुजैरा बंदरगाह तक जाएगी.
आज एक पाइपलाइन पहले से इस्तेमाल में है, लेकिन बढ़े हुए उत्पादन और खाड़ी में टैंकर ट्रैफ़िक की लागत और गति में स्थायी बदलाव को देखते हुए और क्षमता की ज़रूरत होगी.
फिलहाल, होर्मुज़ स्ट्रेट में समुद्री ट्रैफ़िक पर दोहरी नाकाबंदी के दौरान, यह अकेली वो घटना नहीं है जो तेल की क़ीमतें, गैस, पेट्रोल, प्लास्टिक और खाने-पीने की चीज़ों पर असर डाल रही है.
लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर होर्मुज़ का संकट सुलझ जाता है तो इस साल अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले तक तेल की क़ीमतें 50 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब भी आ सकती हैं.
ओपेक का असर और यूएई की इकोनॉमी
आज ओपेक का वैश्विक तेल बाज़ार में महत्व 1970 के दशक जितना नहीं है.
तब अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में उसकी हिस्सेदारी 85 फ़ीसदी थी, जो अब करीब 50 फ़ीसदी रह गई है.
तेल भी अब दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए पहले जितना अहम नहीं रहा. ओपेक का अपना प्रभाव है लेकिन उसका इस मार्केट पर एकाधिकार नहीं है.
मुझे ओपेक के एक प्रमुख चेहरे और सऊदी अरब के तेल मंत्री रह चुके शेख़ यमनी की बात याद आती है.
उन्होंने कहा था, "पाषाण युग इसलिए ख़त्म नहीं हुआ कि दुनिया में पत्थर खत्म हो गए थे. तेल युग भी इसलिए खत्म नहीं होगा कि तेल ख़त्म हो जाएगा."
इसका मतलब है कि भविष्य में तेल की जगह दूसरे ऊर्जा स्रोत ले सकते हैं.
यूएई के इस फ़ैसले को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि दुनिया धीरे-धीरे तेल पर निर्भरता कम कर रही है.
इसके संकेत अभी भी दिख रहे हैं. चीन में विद्युतीकरण में निवेश ने बढ़ती तेल और गैस क़ीमतों के असर को कुछ हद तक कम किया है.
कुछ आकलनों के मुताबिक़, चीन में कारों, ट्रकों और ट्रेनों के इलेक्ट्रिफ़िकेशन से रोज़ाना लगभग 10 लाख बैरल तेल की मांग कम हुई है.
अगर यह रुझान जारी रहा, तो वैश्विक तेल मांग स्थिर हो सकती है.
इस नज़रिये से देखें तो तेल भंडार से जितनी जल्दी हो सके, उतनी कमाई करना समझदारी हो सकती है.
यूएई की वित्तीय क्षमता मजबूत है और उसकी अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा डाइवर्सिफ़ाइड है. जैसे, फ़ाइनेंशियल सर्विस सेक्टर और पर्यटन उद्योग.
खाड़ी के तनाव का असर
अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि खाड़ी में तनाव खत्म होने के बाद नई स्थिति क्या बनती है.
यूएई का ओपेक से बाहर निकलना आगे और देशों के बाहर आने की शुरुआत भी कर सकता है.
अब सऊदी अरब पर भी काफ़ी दबाव रहेगा.
जब टैंकर फिर से होर्मुज़ से गुज़रने लगेंगे या यूएई नई पाइपलाइन बनाने की कोशिश तेज़ करेगा, तब अमीराती तेल ओपेक की पाबंदियों से आज़ाद होकर पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में बाज़ार में आएगा.
अभी इसका मौजूदा नाकाबंदी पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन उसके बाद यह सब कुछ बदल सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित