ईरान ने रुबियो की ताजमहल यात्रा पर क्यों कहा, 'अगर वे इतिहास जानते तो वहां फ़ोटो ना खिंचाते'

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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो चार दिवसीय भारत दौरे से लौट गए हैं लेकिन यह दौरा अब भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है.
वो 23 से 26 मई तक भारत की यात्रा पर थे और अपने इस दौरे में वो भारत के शीर्ष राजनयिकों से तो मिले ही, साथ ही कई मशहूर पर्यटन स्थलों पर भी गए. इन्हीं में से एक था ताजमहल.
सोशल मीडिया पर चर्चा उस समय शुरू हुई जब उन्होंने अपनी पत्नी के साथ आगरा में ताजमहल के सामने तस्वीरें खिंचवाईं.
इस पर सबसे पहले ईरानी अधिकारियों ने व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया दी, जिसके बाद यह मामला और भी ज़्यादा ध्यान का केंद्र बन गया.
ईरानी व्यंग्य और सोशल मीडिया पर बहस

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अमेरिकी विदेश मंत्री ने ताजमहल के सामने अपनी पत्नी के साथ यादगार तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं. ये तस्वीरें जल्दी ही सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गईं.
इस मामले ने उस समय एक अलग मोड़ ले लिया जब हैदराबाद में स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास ने रुबियो के ताजमहल दौरे पर खुले तौर पर व्यंग्य किया.
ईरानी वाणिज्य दूतावास ने अपने बयान में याद दिलाया कि ताजमहल मुगल बादशाह की ईरानी मूल की बेगम मुमताज महल की मोहब्बत की निशानी है, और इसके निर्माण में फ़ारसी वास्तुकारों की कुशलता शामिल थी.
बयान में अमेरिका की भी आलोचना की गई और अमेरिकी सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया गया.
दूतावास ने लिखा, "अगर मार्को रुबियो को इतिहास और वास्तुकला की समझ होती, तो वो यहां तस्वीर खिंचवाने के लिए खड़े नहीं होते. यह स्मारक एक बादशाह की ईरानी पत्नी के प्रेम में बनाया गया था और इसे ईरानी वास्तुकारों की प्रतिभा ने गढ़ा था. वहीं आज उनकी सरकार ईरानी सभ्यता को मिटाने की धमकी देती है और दूसरी सभ्यताओं का अपमान करती है."
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
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सोशल मीडिया पर ईरानी प्रतिक्रिया ने इस बहस को केवल ऐतिहासिक दायरे तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि इसे राजनीतिक रंग भी दे दिया. यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण युद्धविराम चल रहा है.
ईरानी व्यंग्य के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गया, जहां अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं.
कुछ उपयोगकर्ताओं ने मार्को रुबियो को व्यंग्य का निशाना बनाया और कहा कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना ऐसे स्थानों पर तस्वीरें खिंचवाना उचित नहीं है.
कुछ टिप्पणियां इससे भी आगे बढ़ गईं और इसे अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के संदर्भ में देखा जाने लगा, जबकि कुछ उपयोगकर्ताओं ने इस तस्वीर को एक तरह का 'राजनयिक प्रतीक' बताया.
रिज़वान शाह नाम के एक उपयोगकर्ता ने ईरानी दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए लिखा कि अगर मार्को रुबियो इस स्मारक के इतिहास से परिचित होते तो शायद वे यहां तस्वीरें न खिंचवाते.
उन्होंने आगे कहा कि "यह इमारत एक ईरानी मलिका के लिए फ़ारसी वास्तुकारों ने बनाई थी, और यह एक ऐसी संस्कृति का प्रतीक है जिसे उनकी सरकार इस समय ख़तरे में डाल रही है और उसका सम्मान नहीं कर रही."
मुमताज महल और ताजमहल

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संगमरमर से बना ताजमहल दुनिया के अजूबों में से एक है, जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की प्रेम स्मृति में 17वीं सदी में बनवाया था. मुमताज महल और शाहजहां को यहीं दफ़नाया गया था.
मुमताज, शाहजहां की तीसरी पत्नी थीं और उनकी प्रेम की कहानी एक अनोखी दास्तान है.
शादी के 19 साल बाद 38 वर्ष की उम्र में 17 जून 1631 को मुमताज महल का निधन हो गया था. इतिहासकारों के अनुसार ताजमहल का निर्माण 1632 से 1648 के बीच हुआ था.
इतिहासकारों के अनुसार मुमताज महल का परिवार मूल रूप से फ़ारसी यानी ईरानी मूल का था, लेकिन खुद मुमताज महल का जन्म भारत में हुआ था.
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के मुताबिक़ मुमताज महल का का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था. वह मुग़ल बादशाह शाहजहां की पत्नी थीं, जिनकी याद में ताजमहल बनवाया गया.
ब्रिटैनिका के मुताबिक, उनके दादा मिर्ज़ा ग़ियास बेग फ़ारस (आज का ईरान) से भारत आए थे. बाद में वे मुग़ल दरबार में बहुत ऊंचे पद पर पहुंचे. उनके पिता अबुल हसन आसफ़ ख़ान भी मुग़ल दरबार के बड़े अमीर थे.
इसलिए इतिहासकार आम तौर पर यह कहते हैं, कि मुमताज महल फ़ारसी/ईरानी मूल के परिवार से थीं, लेकिन उनका जन्म आगरा में हुआ था, न कि ईरान में.
ब्रिटैनिका में यह भी लिखा है कि उनका परिवार 17वीं सदी में मुग़ल दरबार के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक बन गया था.
एक दिलचस्प बात यह है कि मुग़ल दरबार में उस समय फ़ारसी संस्कृति, भाषा और खानदानी रिश्तों का बहुत असर था. इसलिए कई बड़े मुग़ल अमीर और शाही परिवार फ़ारसी मूल से जुड़े थे.
इतिहासकार राना सफवी ने लिखा है कि बादशाह के आधिकारिक इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपनी किताब 'बादशाहनामा' में इसके निर्माण का उल्लेख करते हुए लिखा है कि "रौज़ा मुनव्वरा (ताजमहल) की निर्माण प्रक्रिया उसकी नींव रखे जाने के साथ ही शुरू हो गई थी."
राना सफवी ने आगे लिखा है कि इतिहासकार आर नाथ ने अपनी किताब 'ताज महल: हिस्ट्री एंड आर्किटेक्चर' में लिखा है कि "सम्राट ने मुमताज महल की कब्र के ऊपर एक बड़े गुंबद के साथ ऐसी भव्य इमारत बनवाने का फैसला किया जो प्रलय तक बनी रहे और उनकी शक्ति और वैभव के अनुरूप हो, जो मुमताज महल की याद को स्थायी बना सके. शाहजहाँ ने ऐसे महान मकबरे की नींव रखी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




































