अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान शासन में उससे शादी के लिए कहा गया, लेकिन वो एक टैक्सी में बैठी और वहाँ से भाग गई

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- Author, योगिता लिमये
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, Afghanistan
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन के क़रीब पाँच साल पूरे होने को हैं.
इस बीच लड़कियों की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. 12 साल से बड़ी लड़कियों के लिए स्कूल-कॉलेज बैन हैं.
लंबी दूरी के सफ़र के लिए घर के पुरुष का साथ ज़रूरी हो गया है.
नौकरी के विकल्प ख़त्म या सीमित हो चुके हैं. इतना ही नहीं, पार्कों में उनका जाना बैन है. ब्यूटी पार्लर तक बंद कर दिए गए हैं.
ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान की औरतों को लगता है कि ज़िंदगी में जैसे एक ही विकल्प बचा हो, वह है- शादी.
भले जीवन में कुछ कर गुज़रने की उम्मीदें टूट रही हों, लेकिन सपने साहस जुटा ही लेते हैं.
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कुछ ऐसा ही हुआ 19 साल की आलिया (सुरक्षा के तहत बदला हुआ नाम) के साथ, जो शादी से बचने और पढ़ाई के लिए अपने गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर काबुल तक जा पहुंचीं.
टैक्सी लेकर पहुँचीं काबुल

आलिया पिछले साल टैक्सी से अपनी चचेरी बहन के साथ एक असामान्य व जोख़िम भरी यात्रा पर निकली थीं.
उन्हें किसी भी वक़्त तालिबान के निरीक्षक पकड़ सकते थे क्योंकि वे बिना किसी पुरुष रिश्तेदार के लंबी दूरी तय कर रही थीं.
हालाँकि तालिबानी क़ानून के हिसाब से ही दोनों ने पूरा शरीर ढँका था और सिर्फ़ आँखें दिखाई दे रही थीं.
गनीमत रही कि किसी भी तालिबान चौकी पर उन्हें नहीं रोका गया और वे राजधानी काबुल तक पहुँच गईं.
आलिया ने बताया, "मैंने अपने परिवार से बहाना बनाया कि मैं अपने दोस्तों और क्लासमेट से मिलने जा रही हूँ, लेकिन यह सच नहीं था. "
अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रांतों में से एक दायकुंडी की रहने वाली आलिया ने यह भी कहा, "अगर मैं दायकुंडी में ही रहती, तो मुझे शादी के लिए मजबूर किया जाता."
वह काबुल में एक योजना के तहत आईं और यह थी- एक अंग्रेज़ी कोर्स में दाखिला लेना.

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बीते क़रीब पाँच साल से 12 बरस की उम्र से बड़ी लड़कियों के लिए प्राइमरी एजुकेशन के बाद औपचारिक शिक्षा के विकल्प नहीं हैं.
वे अंग्रेज़ी सीखने जैसे शॉर्ट टर्म प्राइवेट कोर्स में दाखिला तो ले सकती हैं, लेकिन तभी जबकि वे इसका ख़र्च उठा पाएँ. इसके अलावा वे मदरसे में सीमित स्तर पर धार्मिक शिक्षा ले सकती हैं.
पाबंदियों के बीच भी पढ़ाई, लेकिन...
इन वर्षों में आलिया जैसी लड़कियाँ बिना उस शिक्षा के बड़ी हुई हैं, जिसकी उन्हें ज़रूरत थी. उनके लिए करियर का रास्ता लगभग बंद हो चुका है.
आलिया कहती हैं, "जब मैं अपनी उम्र के आदमियों को देखती हूँ, जो पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और यूनिवर्सिटी जा रहे हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है. मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं नर्क में जल रही हूँ."
ऐसे में आलिया का अपनी पढ़ाई के लिए किसी तरह काबुल तक पहुँच जाना, ख़ुद में साहस की एक कहानी तो है, लेकिन इसमें उनका परिवार भी अहम रोल अदा कर रहा है.
दरअसल, उनके परिवार की माली हालत दूसरे कई परिवारों से थोड़ी बेहतर है.
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, अफ़ग़ानिस्तान में चार में से तीन लोग अपनी मूल ज़रूरतें पूरी कर पाने में सक्षम नहीं हैं.

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आलिया अपने परिवार के सहयोग के बारे में बताती हैं, "पढ़ाई पर लगे बैन से पहले मेरे माता-पिता स्कूल जाने को लेकर मेरा हौसला बढ़ाते थे. वे कहते थे कि मैं पायलट बनने का अपना सपना ज़रूर पूरा कर सकती हूँ. उन्होंने काबुल में रहने के मेरे फ़ैसले को स्वीकार किया है और इंग्लिश कोर्स का ख़र्च उठा रहे हैं."
वह यह भी कहती हैं कि "मेरे माता-पिता अफ़ग़ानिस्तान की वास्तविकताओं से बंधे हुए हैं. अब वे मेरे लिए शादी को सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं क्योंकि न मैं स्कूल जा सकती हूँ, न विश्वविद्यालय और न ही मैं काम ही कर सकती हूँ."
आलिया को शादी के कई प्रस्ताव मिल रहे हैं. उन्हें डर है कि उन्हें किसी एक पर हाँ कहना पड़ सकता है. लेकिन वह डरती हैं कि शादी के बाद नए परिवार में उनकी आज़ादी छिन सकती है.
वह कहती हैं कि कुछ परिवार बहुत सख़्त होते हैं और उन्हें अपने सपनों को भूलने के लिए कह सकते हैं इसलिए वह इस बारे में पॉज़िटिव नहीं हो पातीं.
लेकिन उनके इरादे मज़बूत हैं. वह कहती हैं कि अगर उनका परिवार उन्हें मजबूर नहीं करता तो वे आख़िरी साँस तक शादी का विरोध करेंगी.
विधवा माँ ने पढ़ाया, फिर बैन के चलते पढ़ाई छूटी

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हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान में शादी का विरोध करना आसान नहीं है.
काबुल के पश्चिम में एक छोटे से घर में हमारी मुलाक़ात शमा (बदला हुआ नाम) से हुई, जो डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन अब दो बच्चियों की माँ हैं.
उन्होंने बताया कि छह साल पहले उनके पिता की मौत हो गई, फिर उनकी माँ ने सफ़ाईकर्मी की नौकरी की ताकि वो और उनकी बहनें स्कूल जा सकें.
लेकिन तालिबानी शासन में बैन लगने से उनकी पढ़ाई छूट गई.
शमा की माँ कामिला (बदला हुआ नाम) को अब लगता है कि उनके पास बेटियों की पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं बचा है.
वह कहती हैं, "मुझे डर है कि शादी लायक हो चुकी मेरी बेटी का घर नहीं बस पाया तो इससे परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं. मुझे डर है कि वे (तालिबान सरकार के सैनिक) मुझसे सवाल कर सकते हैं कि मैं उसकी शादी क्यों नहीं कर रही हूँ."
वह कहती हैं, "मैं चाहती थी कि मेरी बेटी पढ़-लिखकर काम करे और समाज में योगदान दे. मैं अनपढ़ हूँ, यह नेत्रहीन होने जैसा है. मेरी बेटी (शमा) के बहुत से सपने थे पर अब मुझे नहीं लगता कि वे पूरे हो पाएँगे."
शमा ने बताया, "अगर बैन नहीं लगा होता, तो अब तक मैं स्कूलिंग पूरी कर चुकी होती और डॉक्टर बनने के क़रीब थी. यही मैं करना चाहती थी."
लेकिन उनकी माँ के दबाव में शमा की चार साल पहले शादी हो गई. अब उनके ऊपर दो छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी है जिनमें एक नवजात है.
वह कहती हैं कि तालिबान शासन के आने से पहले उन्होंने अपने सपनों के लिए शादी के कई रिश्ते ठुकराए थे.
वह कहती हैं कि जब फ़िल्मों में औरतों को पढ़ते हुए या काम करते हुए देखती हैं, तो परेशान हो जाती हैं.
हालाँकि वह यह भी बताती हैं कि उनके पति का व्यवहार अच्छा है लेकिन उन्हें अपने सपनों को पूरा न कर पाने का दुख हमेशा रहता है.
वह ख़ुद को घर में बंद महसूस करती हैं और ऐसा लगता है कि वह सिर्फ़ अपने बच्चों के लिए जी रही हैं.
प्रतिबंध हटने का शिद्दत से इंतज़ार

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शमा की छोटी बहन नोरा (बदला हुआ नाम) 18 साल की हैं. उन्हें डर है कि उनका भी यही हाल होगा.
वह कहती हैं, "मैं शादी के लिए अभी काफ़ी छोटी हूँ और पढ़ाई जारी रखना चाहती हूँ. ऐसा लगता है कि जैसे मैं जेल में क़ैद हूँ. लेकिन बाहर जाने से डर लगता है और घर में माँ शादी के लिए दबाव डालती हैं."
लड़कियों की पढ़ाई पर लगे बैन को लेकर वह कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि तालिबान सरकार में कभी दोबारा स्कूल खुलेंगे. मैं चार साल से ज़्यादा वक़्त से उस एलान का इंतज़ार कर रही हूँ कि स्कूल खुलेंगे."
दूसरी ओर, काबुल पढ़ने आ गईं आलिया उस पल के बारे में बताती हैं, जब तालिबान सरकार ने पढ़ाई पर बैन लगाया था. वह पल उनके जैसी कई महिलाओं के ज़हन में एकदम ताज़ा है.
आलिया बताती हैं, "मैं उस पूरे दिन और पूरी रात सिर्फ़ रोई थी. मैं एक हफ़्ते तक सो नहीं पाई, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं ज़िंदा लाश की तरह इधर-उधर भटक रही हूँ."
बता दें कि तालिबान के सर्वोच्च नेता की ओर से लगाए गए कई और प्रतिबंधों का महिलाओं को सामना करना पड़ रहा है.
कुछ जगहों पर ये काफ़ी सख़्ती से लागू हैं, जबकि कुछ जगह पर थोड़ी रियायत है.
पढ़ाई से बैन हटाने को लेकर तालिबान ने क्या-क्या कहा?

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2021 से तालिबान सरकार इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई है कि लड़कियों के लिए स्कूल कब खुलेंगे?
सत्ता संभालने के बाद सितंबर, 2021 में तालिबान के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में बताया था कि लड़कियों के लिए स्कूल खुलेंगे.
साथ ही उन्होंने कहा था कि वे "सुरक्षा स्थिति को सुधारने पर काम कर रहे हैं."
फिर एक साल बाद यानी 2022 में तालिबान सरकार ने जवाब दिया कि "धार्मिक विद्वानों को लड़कियों के स्कूल आने-जाने की सुरक्षा को लेकर चिंता है." साथ ही कहा कि वे इस समस्या पर काम कर रहे हैं.
साल 2024 में तालिबान सरकार के उप-प्रवक्ता हमदुल्लाह फ़ितरत ने कहा कि "हम नेतृत्व के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं."
इसी महीने हम दोबारा सरकार के प्रवक्ता फ़ितरत से मिले, तो वे महिला होने के नाते हमारे साथ तस्वीर खिंचवाना या महिला के सामने बैठकर बात करना नहीं चाहते थे.
तब उनसे पूछा गया, वे माध्यमिक स्कूल और विश्वविद्यालय में लड़कियों की शिक्षा के ऊपर लगे प्रतिबंध को कैसे सही ठहरा सकते हैं?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, "क़रीब 70 लाख लड़के और 50 लाख लड़कियाँ इस समय पढ़ाई कर रही हैं. और छठी कक्षा के बाद की शिक्षा पर प्रतिबंध एक अलग मुद्दा है."
फिर प्रवक्ता ने बीबीसी को संतोषजनक जवाब के लिए शिक्षा मंत्रालय के पास जाने को कहा.
इसके बाद बीबीसी ने दोबारा प्रवक्ता से पूछा, "अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएँ सोचती हैं कि उनके लिए शिक्षा के मौक़े दोबारा कभी नहीं खुलेंगे, शायद यह प्रतिबंध नहीं हटेगा."
इसका जवाब भी उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से ही लेने का अनुरोध किया. फिर बीबीसी ने शिक्षा मंत्रालय से भी वही सवाल किए, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया.
कई मौक़ों पर यह स्पष्ट हुआ है कि तालिबान सरकार में महिलाओं की शिक्षा को लेकर मतभेद हैं. लेकिन बीते पाँच साल में सुप्रीम लीडर का रुख़ इस मुद्दे पर और ज़्यादा सख़्त ही हुआ है.
(इस रिपोर्ट में इमोजेन एंडरसन, महफ़ूज़ जुबैर और संजय गांगुली ने भी योगदान दिया है.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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