विजय के साथ जाकर और डीएमके से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस को आख़िर क्या हासिल होगा?

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- Author, नंदिनी वेलास्वामी
- पदनाम, बीबीसी तमिल
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
डीएमके-कांग्रेस गठबंधन, जिसने पिछले एक दशक में कई चुनाव एक साथ लड़े थे, अब टूट गया है. कांग्रेस ने कहा है कि वह विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) को सरकार बनाने में समर्थन देगी.
हालांकि कांग्रेस के एक वर्ग ने चुनाव से पहले टीवीके के साथ गठबंधन करने की इच्छा खुलकर व्यक्त की थी, लेकिन अब जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, तो उसने टीवीके का समर्थन किया है.
जहां कुछ विशेषज्ञ इसे "तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का निर्णय" मानते हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि "यह एक अवसरवादी निर्णय है, नीतिगत निर्णय नहीं."
विजय की नवगठित पार्टी, जिसने हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाग लिया था, उसने 108 सीटें जीती हैं.
कांग्रेस ने टीवीके को सरकार बनाने में समर्थन दिया है. डीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 5 सीटें जीती हैं.
कांग्रेस की क्या हैं शर्तें

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरीश चोडंकर के नाम से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि पार्टी टीवीके का समर्थन इस शर्त पर करेगी कि "भारतीय संविधान में विश्वास न रखने वाली सांप्रदायिक ताकतों को गठबंधन से बाहर रखा जाए."
वरिष्ठ पत्रकार मालन कहते हैं, "वे तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं. वे इसे ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करना चाहते हैं."
अपने बयान में गिरीश चोडंकर ने कहा, "यह गठबंधन आपसी सम्मान, उचित हिस्सेदारी और दोनों पक्षों की ज़िम्मेदारी की भावना पर आधारित है. यह न केवल वर्तमान सरकार के गठन के लिए बल्कि भविष्य के स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के लिए भी जारी रहेगा."
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के समर्थन को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में पत्रकार मालन ने कहा, "कांग्रेस द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक टीवीके को समर्थन देने का कारण शायद आगामी चुनावों में अधिक सीटें जीतना हो सकता है. उन्हें लगता है कि विजय के साथ गठबंधन करने से उन्हें आसानी होगी. उन्होंने डीएमके को अपने भविष्य के रुख़ से अवगत कराने के लिए भी ऐसा कहा होगा."
तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की सबसे बड़ी सहयोगी रही है.
इंदिरा गांधी के समय से लेकर राहुल गांधी के वर्तमान युग तक, कुछ मतभेदों के बावजूद डीएमके-कांग्रेस संबंध लंबे समय तक कायम रहे हैं.
डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के बीच का रिश्ता भी तमिलनाडु में कई बार चर्चा का विषय रहा है. दोनों ने सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एक-दूसरे को "भाई" कहा है.
डीएमके-कांग्रेस गठबंधन
अगर हम पिछले 20 वर्षों में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के इतिहास पर नज़र डालें, तो 2004 के संसदीय चुनावों में लंबे अंतराल के बाद डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का गठन हुआ था. यह गठबंधन 2011 के विधानसभा चुनावों तक जारी रहा.
डीएमके ने 2014 के संसदीय चुनावों से पहले कांग्रेस गठबंधन से खुद को अलग कर लिया था. उस चुनाव में कांग्रेस को अकेले ही चुनाव लड़ना पड़ा था.
उसके बाद, दोनों पार्टियों ने 2016 के विधानसभा चुनावों के लिए फिर से गठबंधन बनाया. यह गठबंधन 2019 के संसदीय चुनावों, 2021 के विधानसभा चुनावों, 2024 के संसदीय चुनावों और 2026 के विधानसभा चुनावों तक जारी रहा.
हालांकि 2026 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की "सरकार में हिस्सेदारी" की मांग ने इस बात पर सवाल खड़े कर दिए थे कि क्या वह डीएमके के साथ गठबंधन जारी रखेगी, लेकिन लंबी चर्चा के बाद दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा.

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डीएमके की आलोचना
कांग्रेस द्वारा टीवीके को दिए गए समर्थन के संबंध में डीएमके प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, "कांग्रेस ने टीवीके का समर्थन करने के लिए आगे कदम बढ़ाया है. हम इसे पीठ में छुरा घोंपना कहते हैं. कांग्रेस पार्टी ने जीत का प्रमाण पत्र मिलने से पहले ही पाला बदलने का फैसला कर लिया है. इसके लिए वे जो कारण बता रहे हैं, वे संतोषजनक नहीं हैं."
बीबीसी तमिल से बात करते हुए कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "क्या डीएमके को कांग्रेस से कोई फायदा नहीं हुआ? चुनाव से पहले ही कांग्रेस पार्टी के कई लोग गठबंधन में शामिल होने पर अड़े हुए थे. उनका कहना था कि डीएमके को हमारे साथ आना चाहिए. अगर कोई फायदा नहीं है, तो उन्हें क्यों आमंत्रित किया जाए? दोनों पक्षों को फायदा हुआ है. तमिलनाडु में क्या हमारा कोई वोट बैंक नहीं है?"
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार एलंगोवन राजशेखरन का कहना है कि कांग्रेस डीएमके गठबंधन से बाहर निकलने के अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी और अब वह अवसर आ गया है.
उन्होंने कहा, "पहले कांग्रेस पार्टी के पास गठबंधन का कोई और मौका नहीं था क्योंकि एआईएडीएमके भाजपा के साथ थी. अब वे टीवीके को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं. वे चुनाव में डीएमके के वोट ले रहे हैं और राजनीति के लिए टीवीके के साथ जा रहे हैं."
वह पिछले चुनावों में डीएमके के साथ गठबंधन से लाभ उठाने और अब टीवीके का समर्थन करने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हैं.

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"कांग्रेस ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है."
एलंगोवन राजशेखरन ने राज्य की बड़ी पार्टियों का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा, "कांग्रेस ने 'इंडिया' गठबंधन में शामिल पार्टियों के खिलाफ काम किया. राज्य की पार्टियां कांग्रेस से नाराज़ हो गई हैं. इस तरह के रवैये के साथ, कांग्रेस पार्टी कभी भी भाजपा गठबंधन के विकल्प के रूप में उभर नहीं पाएगी. कांग्रेस ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है."
वरिष्ठ पत्रकार मालन ने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस के इस फैसले से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं.
हालांकि, उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता युवा पीढ़ी के नेताओं से सहमत नहीं हैं. वे इस अवसर का लाभ उठाकर पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं. 1967 में तमिलनाडु में डीएमके के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस ने सरकार में कोई भूमिका नहीं निभाई है. अब यह स्थिति बदल सकती है."
हालांकि, कांग्रेस के मोहन कुमारमंगलम का कहना है कि मंत्रिमंडल में भूमिका उनके लिए कोई शर्त नहीं है.

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भाजपा पर टीवीके का रुख़
एलंगोवन राजशेखरन का कहना है कि कांग्रेस की यह शर्त कि "सांप्रदायिक ताकतें जो भारतीय संविधान में विश्वास नहीं करतीं" इस गठबंधन में शामिल न हों, अस्वीकार्य है.
वे कहते हैं, "अगर विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने का फैसला करते हैं तो कांग्रेस क्या करेगी?"
चेन्नई इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च की वरिष्ठ प्रोफेसर आनंदी कहती हैं, "टीवीके-कांग्रेस गुट ने नीतियों पर क्या चर्चा की? दोनों पक्षों ने निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण, भाषा नीति, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद आदि पर क्या बात की? यह सवाल उठता है कि क्या वे ऐसी आपातकालीन स्थिति में इन विषयों पर चर्चा कर सकते थे. यह तो सिर्फ संख्या का खेल है."
मोहन कुमारमंगलम कहते हैं, "विजय ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनका राजनीतिक शत्रु भाजपा है. हमने अपने समर्थन की शर्त यह रखी है कि सांप्रदायिक ताकतें गठबंधन में शामिल न हों. इसका मतलब है कि भाजपा को गठबंधन में नहीं आना चाहिए."

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'इंडिया' गठबंधन का क्या होगा?
राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए गठित 'इंडिया' गठबंधन का क्या होगा?
मालन कहते हैं, "विजय इंडिया गठबंधन में शामिल हो सकते हैं. हालांकि उस गठबंधन में शामिल पार्टियां अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के मुद्दे पर एकजुट हैं. हालांकि, अब अगर टीवीके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल हो जाता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि डीएमके गठबंधन में रहेगी या नहीं. इसका समाधान अगले लोकसभा चुनावों तक हो सकता है."
मोहन कुमारमंगलम ने कहा, "डीएमके की नीति भाजपा के खिलाफ नहीं है. ऐसे में वे 'इंडिया' गठबंधन में क्यों नहीं शामिल होते? दोनों दलों (टीवीके और डीएमके) को एक साथ आकर भाजपा का विरोध करना चाहिए. 'इंडिया' गठबंधन में हर तरह की नीतियों वाले दल शामिल हैं. क्या डीएमके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बजाय भाजपा के साथ गठबंधन करेगी? भविष्य में कुछ भी हो सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


































