पश्चिम बंगाल में चुनाव के नतीजों के बाद हिंसा

इमेज स्रोत, Sukumar Mahto
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद जारी हिंसा साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद की हिंसा को दोहराती नज़र आ रही है.
भारी तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण चुनाव तो लगभग हिंसा-मुक्त रहे. लेकिन नतीजों के बाद राज्य के विभिन्न इलाक़ों में शुरू हुई हिंसा में अब तक कम से कम चार लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की भी ख़बर है.
कई जगह तृणमूल कांग्रेस के दफ़्तरों पर हमले, आगजनी, तोड़फोड़ और पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले की ख़बरें भी सामने आ रही हैं.
सोमवार रात से ही जारी हिंसा के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राज्य के शीर्ष पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से हिंसा में शामिल लोगों की गिरफ़्तारी का निर्देश दिया है.
कोलकाता के पुलिस आयुक्त अजय नंद ने भी बुधवार को प्रेस कांफ्रेंस में ऐसे तत्वों को हिंसा से दूर रहने की चेतावनी दी है. उन्होंने विजय जुलूस में बुलडोज़र शामिल करने पर भी रोक लगा दी है.
कहां-कहां हुई हिंसा?

इमेज स्रोत, Sukumar Mahto
सोमवार को चुनावी नतीजों में बीजेपी को बहुमत मिलने के साथ ही कोलकाता समेत राज्य के विभिन्न इलाक़ों में तृणमूल कांग्रेस के दफ़्तरों में तोड़-फोड़ की ख़बरें सामने आने लगीं.
उसके बाद मंगलवार को आसनसोल इलाक़े में पार्टी के एक दफ़्तर में आग लगा दी गई. वहां कई अन्य इलाक़ों से भी ऐसी ही ख़बरें सामने आ रही हैं. कुछ जगहों पर तृणमूल कांग्रेस के दफ़्तर में लगे झंडे हटाकर वहां बीजेपी के झंडे फहराने और उसे गेरुआ रंग में रंगने के भी फ़ोटो और वीडियो सामने आए हैं.
कोलकाता में बीजेपी के विजय जुलूस के दौरान एक बुलडोज़र से न्यू मार्केट इलाक़े में मांस की दुकान को तोड़ने वाला एक वीडियो भी वायरल हो रहा है. हालांकि बीबीसी ने इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं की है.
कोलकाता के पुलिस आयुक्त अजय नंद ने बुधवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "हिंसा और आगजनी के आरोप में राज्य के विभिन्न इलाक़ों से अब तक 80 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इसके अलावा कुछ हथियार भी बरामद किए गए हैं."
उनका कहना था कि हिंसा को रोकने में अगर पुलिस की लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी.
पुलिस आयुक्त ने कहा, "किसी पार्टी को विजय जुलूस निकालने के लिए पुलिस की अनुमति लेनी होगी. ऐसे जुलूस में जेसीबी मशीन को शामिल नहीं किया जा सकता है. अगर किसी जुलूस में जेसीबी देखी गई तो उसके मालिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी."
पुलिस और केंद्रीय बलों ने राज्य में क़ानून और व्यवस्था की स्थिति की निगरानी के लिए एक संयुक्त कंट्रोल रूम खोला है. पूरे राज्य में 240 क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) तैनात की गई है. इसके अलावा मोटर साइकिलों के ज़रिए गश्त भी शुरू हो गई है.
चार लोगों की मौत का दावा

इमेज स्रोत, Sanjay Das
इस बीच, हिंसा की अलग-अलग घटनाओं में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी ने अपने दो-दो समर्थकों की मौत का दावा किया है.
हावड़ा ज़िले के उदयनारायणपुर में सोमवार रात को जादव बार नामक एक बीजेपी समर्थक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. बीजेपी के स्थानीय नेता प्रशांत दे का दावा है कि चुनाव में सक्रियता के कारण जादव विपक्ष के निशाने पर थे.
हावड़ा पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, "जादव विजय जुलूस में शामिल होने के बाद देर रात घर लौटा था. लेकिन कुछ देर बाद कुछ लोगों ने उसे घर से बाहर बुलाया और लोहे की छड़ों से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी."
कोलकाता से सटे न्यू टाउन इलाके में बीजेपी कार्यकर्ता मधु मंडल की भी कथित रूप से विपक्षी दल के समर्थकों ने हत्या कर दी.
उनके एक परिजन ने बताया, "मंडल बीजेपी का समर्पित कार्यकर्ता था. चुनाव में इस इलाके में बीजेपी उम्मीदवार की जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने उसकी हत्या कर दी."
मंगलवार को ही बीरभूम ज़िले के नानूर में कथित बीजेपी समर्थकों ने तृणमूल कांग्रेस समर्थक अबीर शेख की हत्या कर दी. हालांकि बीजेपी ने इस आरोप को निराधार बताया है.

इमेज स्रोत, Sukumar Mahto
कोलकाता के बेलियाघाटा इलाके में एक अन्य तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता विश्वजीत पटनायक का शव भी उनके घर के बाहर बरामद किया गया. उनके शरीर पर गहरी चोट के निशान थे.
विश्वजीत के एक परिजन ने पत्रकारों से कहा, "बीजेपी समर्थकों ने घर का दरवाज़ा तोड़ कर उसे बाहर निकाला और पीट-पीट कर हत्या कर दी."
कोलकाता में पूर्व मंत्री और टालीगंज सीट से तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक अरूप विश्वास के दफ़्तर में भी तोड़-फोड़ की गई. महानगर के विभिन्न इलाकों में भी तृणमूल कांग्रेस के कई दफ्तरों में तोड़-फोड़ की ख़बरें सामने आई हैं.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भवानीपुर इलाके में एक पार्षद के दफ्तर को तोड़फोड़ के बाद आग के हवाले कर दिया गया.
बीरभूम, नदिया, हावड़ा, दक्षिण 24-परगना और बांकुड़ा ज़िले के विभिन्न इलाकों से भी हिंसा और तोड़-फोड़ की ख़बरें सामने आई हैं.
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि कुछ जगह असामाजिक तत्वों और पुलिस के बीच भिड़ंत में कई पुलिस वाले घायल हो गए.
उत्तर 24-परगना ज़िले के संदेशखाली इलाक़े में असामाजिक तत्वों की फ़ायरिंग में नजत थाने के ऑफ़िसर-इंचार्ज के अलावा दो अन्य पुलिस अधिकारियों और केंद्रीय बल के दो जवान घायल हो गए हैं.

इमेज स्रोत, Sukumar Mahto
आरोप-प्रत्यारोप तेज़
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बीजेपी पर पूरे राज्य में हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है.
उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है. पार्टी के कम से कम चार सौ दफ़्तरों में तोड़-फोड़ की गई है. इसके अलावा हमारे डेढ़ सौ उम्मीदवारों के घरों पर हमले किए गए हैं." उनका सवाल था कि क्या यही बीजेपी के भरोसे का मॉडल है?
दूसरी ओर, बीजेपी का दावा है कि हिंसा की इन घटनाओं में पार्टी का कोई कार्यकर्ता या समर्थक शामिल नहीं है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने राज्य के मुख्य सचिव से इस हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने की अपील की है.
उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से हिंसा से दूर रहने, शांति बहाल रखने और जीत की ख़ुशी मनाते समय संयम बरतने की अपील की है.
शमीक का कहना था, "किसी तरह की कोई हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अगर पार्टी का कोई कार्यकर्ता हिंसक गतिविधियों में शामिल पाया जाता है तो उसे पार्टी से निकाल दिया जाएगा. "
विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों से शांति कायम रखने और विपक्षी दल के किसी उकसावे में नहीं आने की अपील की है.
उन्होंने नंदीग्राम में पत्रकारों से बातचीत में समर्थकों से कहा, "वो (तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता) जो कर रहे हैं, आप मत करें. दो-तीन विजय जुलूस भी नहीं निकालें. शपथ ग्रहण के बाद पुलिस की अनुमति लेकर ऐसे जुलूस निकाले जा सकते हैं."

इमेज स्रोत, Sanjay Das
विश्लेषक क्यों जता रहे हैरानी
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता बदलने के बाद इलाके में वर्चस्व की लड़ाई के तहत ऐसी हिंसा की परंपरा राज्य में पहले भी रही है. लेकिन इस बार इतनी बड़ी तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती के बाद हिंसा नहीं होनी चाहिए थी.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक पुलकेश घोष कहते हैं, "राज्य के विभिन्न इलाक़ों में वर्चस्व की लड़ाई के तहत ऐसी हिंसा होती रही है. वर्ष 2011 में सत्ता बदलने के बाद तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ सीपीएम के दफ़्तरों पर तोड़-फोड़ और क़ब्ज़े के आरोप लगे थे. इस बार भी हिंसा की आशंका जताई जा रही थी."
एक अन्य विश्लेषक तापस मुखर्जी कहते हैं, "इस बार चुनाव तो हिंसा मुक्त हुए. लेकिन चुनाव बाद की हिंसा का अंदेशा पहले से ही जताया जा रहा था. अब पुलिस और प्रशासन को इस हिंसा पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस क़दम उठाना चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो बदलाव की यह तस्वीर बदले की कहानी में बदल जाएगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


































