'पैसों के लिए अंडरटेकर से मार नहीं खानी'

महाबली सतपाल
    • Author, सुशांत एस मोहन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
  • प्रकाशित

नौ साल की उम्र में जब आम बच्चे फूल से मुलायम होते हैं और मामूली चोट से रोना शुरू कर देते हैं.

उस उम्र में पहलवानी करने आए बच्चे अपने से 10 गुना भारी पहलवानों के साथ दो-दो हाथ कर रहे होते हैं.

कुश्ती के इस खेल में शरीर को दर्द तो सहना ही होता हो साथ ही आर्थिक रूप से भी आपको मज़बूत होना पड़ता है.

पहलवान बनने के लिए जिस तरह के खानपान की ज़रूरत होती है उसका ख़र्च उठाना हर किसी के बूते में नहीं होता है.

यही वजह है कि एक साथ पहलवानी की राह पर चलने वाले पहलवान कभी-कभी अलग राहों पर निकल जाते हैं.

कुश्ती पर की जा रही बीबीसी की विशेष सिरीज़ में सबसे पेश है कहानी उस पहलवान की जिसे कुश्ती ने सिर आंखों पर बिठाया.

सफ़र सतपाल से महाबली का

महाबली सतपाल

छह फ़ीट तीन इंच से ज़्यादा लंबे भारत के पूर्व हैवीवेट पहलवान महाबली सतपाल से जब आप मिलते हैं तो उनकी कदकाठी से प्रभावित हुए बिना आप नहीं रह पाते.

किसी ज़माने में 48 इंच का सीना रखने वाले इस पहलवान ने 1982 में भारत को एशियाड खेलों में कुश्ती का स्वर्ण पदक दिलाया था.

सतपाल बताते हैं, "मेरा पढ़ने में मन लगता नहीं था तो पिताजी ने मुझे गुरूजी के पास लगा दिया. 11 साल की उम्र में घर से दूर मैं अकेला बहुत रोता था और जितना रोता था गुरूजी भी उतना ही मारते थे. न घर पर पिताजी रूकने देते न अखाड़े में गुरूजी आराम करने देते. धीरे-धीरे मुझे सबक मिल गया कि मुझे ज़िंदगी में खाली बैठने से काम नहीं चलेगा."

वह बताते हैं, "मैं काफ़ी डरता था गुरूजी से लेकिन फिर जब कोई कुश्ती जीतने पर इनाम मिलता जैसे घी-दूध तो गुरू जी प्रसन्न होते और हमें अच्छा लगता था. उनके चेहरे की एक मुस्कुराहट के लिए हम कोशिश करने लगे."

सतपाल के साथी

सतपाल के साथी रहे महासिंह राव देश में फ़्रीस्टाइल कुश्ती के कोच हैं. वह बताते हैं, "कुश्ती में सतपाल ने बहुत कमाल किया है. वह 12 बार 'भारत केसरी', 10 बार 'रूस्तम-ए-हिंद' रहे हैं."

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उन्होंने कहा, "यहां तक कि वह एक बार नौ कुश्ती लगातार जीत कर 'भारतंदाज' भी रहे. उनका जलवा ऐसा था कि एक बार महाराष्ट्र में हुए एक दंगल में पहलवानों ने उनसे कुश्ती लड़ने से मना ही कर दिया था."

सतपाल ने बताया कि वह भारत के घरेलू दंगलों में अविजित रहे और एशियाड में भी स्वर्ण पदक उन्हीं के नाम रहा जिसके बाद उनका नाम महाबली पड़ा जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें दिया था.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ और दारा सिंह

दारा सिंह के साथ महाबली सतपाल के बेटे

सतपाल ने जब 1982 में एशियाड में मंगोलिया के पहलवान को सिर्फ़ चार मिनट में चित्त कर दिया तो उनकी प्रतिभा दुनिया के सामने आई और लोकप्रिय कुश्ती कंपनी 'डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़' ने उन्हें बुलाया.

सतपाल ने बताया, "डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ से लोग मेरे पास आए और उन्होंने मुझे भारत से अपना पहलवान बनाने की बात कही. उन्होंने कहा कि वे मुझे कुछ वक़्त के लिए अपना हैवीवेट चैंपियन भी बनाएंगे लेकिन मुझे उनके कहे अनुसार लड़ना होगा. मैं और मेरे साथी कुछ वक़्त उनसे जुड़े भी, पैसा भी अच्छा था लेकिन जब उन्होंने कहा मुझे अंडरटेकर से मार खानी होगी और इसके लिए मुझे पैसे भी मिलेंगे पर मैंने मना कर दिया."

इसके बाद दारा सिंह ने भी उन्हें अपनी कुश्ती लीग के लिए बुलाया लेकिन सतपाल ने प्रदर्शनी वाली कुश्ती में नहीं लड़ने का मन बना लिया था.

सुशील और योगेश्वर

सतपाल पहलवान और सुशील कुमार

सतपाल को जानने वाले सभी लोग यह बात मानते हैं कि उन्होंने अपना करियर छोड़कर देश के लिए नामी पहलवान पैदा किए.

आज विश्व के टॉप पहलवानों में से गिने जाने वाले सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त और अमित दहिया सतपाल के ही शिष्य हैं.

भारत के टॉप रेसलर और सतपाल के दामाद सुशील बताते हैं, "हमें कुश्ती का 'क' भी गुरूजी ने सिखाया है. मेरे और योगेश्वर के साथ वह सालों लगे रहे और आज हम यहां हैं सिर्फ़ उन्हीं की बदौलत."

योगेश्वर दत्त

सतपाल की आंखों में आंसू आ जाते हैं जब वह कहते हैं, "कुश्ती ने मुझे सब दिया. रहने के लिए मकान, महाबली का नाम, पद्मश्री का सम्मान, सुशील जैसा दामाद. आज मैं जो कुछ हूं सब कुश्ती की वज़ह से."

कुश्ती ने सतपाल सिंह को आज देश के जाने माने लोगों में से एक बना दिया है और सही मायनों में उन्हें आज किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है.

कुश्ती की इस विशेष सीरीज़ की अगली कड़ी में आपको मिलवाएंगे उस पहलवान से जिसे कुश्ती ने ऐसा पटकी दी कि वो आज तक उठ नहीं पाया.

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