नेपाल: राहतकर्मियों को भेजने की जल्दी क्यों?

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नेपाल में दस दिन पहले आए ज़बर्दस्त भूकंप में मरने वालों की संख्या 7,500 से अधिक हो गई है और कई इलाकों में अब भी राहत कार्य जारी है.

लेकिन नेपाल सरकार ने राजधानी काठमांडू और आसपास के इलाकों में काम कर रहे विदेशी राहतकर्मियों को वापस चले जाने को कहा है और उसका कहना है कि 'ज़्यादातर काम हो गया है'.

नेपाल सरकार का कहना है कि दूर-दराज़ के इलाकों में बाकी बचे राहत कार्य को देश की सेना और पुलिस पूरा कर लेगी.

नेपाल सरकार के इस क़दम के पीछे असल वजह क्या है, क्या इसके कुछ अंदरूनी राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं?

नेपाल के विदेश मंत्री महेंद्र पांडे स्पष्ट करते हैं कि खोज और बचाव कार्य के लिए जो लोग आए थे वो वापस जा सकते हैं और जो लोग राहत कार्यों के लिए हैं वो यहां रह सकते हैं और अपना काम पूरा करें.

लेकिन क्या इस फ़ैसले से नेपाल में राहत और बचाव कार्य प्रभावित होगा?

वरिष्ठ पत्रकार सीके लाल का विश्लेषण

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नेपाल सरकार के इस फ़ैसल के पीछे कई वजहें हैं. इनमें सेना की भूमिका, राजनीतिक अस्थिरता और कूटनीतिक मोर्चे पर नेपाल की मजबूरी शामिल है.

नेपाली सेना

साल 2006 में ख़त्म हुए सशस्त्र संघर्ष के बाद से नेपाली सेना की छवि कुछ अच्छी नहीं रह गई थी और उनका मनोबल भी कुछ कमज़ोर पड़ गया था.

आपदा के इस मौक़े पर नेपाली सेना को लगा कि काम से उनकी छवि में सुधार आ सकता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय राहत-बचाव दल की तरह उनके पास बेहतर प्रशिक्षण और नए उपकरण नहीं हैं.

ऐसे में नेपाली सेना को वो तारीफ़ नहीं मिल पा रही जो विदेशी राहतकर्मियों को मिल रही है. नेपाली सेना बचाव कार्य में एकाधिकार चाहती है ताकि उसे अपने काम के लिए ज्यादा तारीफ़ मिल सके.

सियासी वजह

सुशील कोइराला

नेपाल में राजनीतिक नेतृत्व अभी काफी कमज़ोर है. शायद उनको लगने लगा था कि उसके हाथ से सबकुछ निकला जा रहा है.

उन्हें यह भी महसूस होने लगा था कि अंतरराष्ट्रीय जगत ही अगर सबकुछ करेगा तो वे क्या यहां बैठकर तमाशा देखेंगे.

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कुछ पड़ोसी देशों के लिए नेपाल हमेशा से कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा की जगह रहा है.

राहत और बचाव कार्य में मदद के लिए अमरीका और ब्रिटेन से जंगी विमान और हैलीकॉप्टर नेपाल पहुंचे हैं.

उनकी मौजूदगी चीन और भारत को पसंद नहीं आएगी.

ख़बरें आईं कि भारत के विमान चीन की सीमा के नज़दीक तक जा पहुंचे थे, हालांकि इसके बारे में यह कहा गया कि जानकारी के अभाव में ऐसा हुआ.

ऐसी किसी सूरत में नेपाल, चीन के साथ किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहेगा.

विदेश मदद ज़रूरी

इन तमाम वजहों के बीच नेपाल का ज़मीनी सच ये है कि नेपाल में लगभग 30 लाख आबादी और तीन लाख घर भूकंप से प्रभावित हुए हैं.

विदेशी मदद के बिना नेपाल के लिए राहत और बचाव कार्य सुचारू रूप से जारी रखना मुमकिन नहीं होगा.

इसकी वजह ये है कि नेपाल के पास उतनी विशेषज्ञता और तकनीकी दक्षता नहीं है.

(ये वरिष्ठ पत्रकार सीके लाल के निजी विचार हैं. बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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