मलबे के ढेर में ज़िंदगी

प्रकाशित

ग़ज़ा में 50 दिनों तक चली इसराइली कार्रवाई में चार लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए और लगभग 18 हज़ार घर बर्बाद हो गए.

इस कार्रवाई में सबसे ज़्यादा तबाही झेलने वाले इलाक़ों में से एक है शेज़इया.

बीबीसी ने बात की इस इलाक़े के कुछ लोगों से और जाना कि उनकी ज़िंदगी कैसी गुज़र रही है.

सब ख़त्म

पेशे से अंग्रेज़ी अध्यापक 55 वर्षीय अब्दुल करीम अबु अहमद कहते हैं कि उनका एक बड़ा सा घर था जिसमें बगीचा भी था.

इस घर में वो अपनी पत्नी और 11 बच्चों के साथ रहते थे जिनकी उम्र सात से 25 साल के बीच है.

लेकिन बमबारी में सब बर्बाद हो गया. फर्नीचर, कंबल और दीवारें सब ख़त्म हो गए.

अहमद, उनके भाई और दो बेटे अपना ज़्यादातर समय इसी घर में बिताते हैं. उनका कहना है कि वो इस घर से दोबारा बनाएंगे.

फ़िलहाल उन्होंने गज़ा सिटी में एक फ़्लैट किराए पर लिया है.

'कोई चारा नहीं'

एस्साम हबीबी की नाई की दुकान और घर को बमबारी में नुकसान नहीं हुआ. लेकिन अब ग्राहक बहुत कम आते हैं. इसलिए मुश्किल से गुज़ारा हो रहा है.

वो कहते हैं, "मेरे पास दुकान खोलने और दुआ करने के अलावा चारा नहीं है."

वो कहते हैं कि बमबारी में पानी की पाइप लाइनें टूट गई हैं और बिजली की व्यवस्था भी ठप हो गई है. लेकिन 'मेरा काम तो लोगों का मुंह धोना ही है, मुझे तो पानी चाहिए ही'.

उनके कई दोस्त और रिश्तेदार इसराइली हवाई हमले में मारे गए हैं.

'शांति चाहिए'

54 वर्षीय सुहीला मोहमदैन एक बेटा इस्माइल बमबारी में मारा गया.

वो कहती है कि उनका जो घर अब मलबे का ढेर है, उसे बनाने में दस साल से भी ज़्यादा लगे थे और उसमें आठ फ्लैट थे.

घर ही नहीं, बमबारी में कार और परचून की दुकान भी ध्वस्त हो गई. उनका परिवार भी एक किराए के मकान में रहता है.

वो कहती हैं, "अपने घर को फिर से बनाने में बरसों लगेंगे. मेरी ज़िंदगी में अब ज्यादा कुछ नहीं बचा है. मुझे कुछ नहीं चाहिए. मुझे बस शांति चाहिए."

'भगवान ही जाने'

मोहम्मद हबीब इमारतें बनाते हैं, लेकिन अब उन्हें अपने घर का ही समझ नहीं आ रहा है कि उसे कहां से और कैसे बनाना शुरू करें.

गोलाबारी शुरू होने के बाद वो परिवार समेत संयुक्त राष्ट्र के एक स्कूल में चले गए थे.

पर अब लौट आए हैं. उन्होंने जैसे तैसे दो कमरे साफ किए हैं जिनमें उनकी पत्नी, बच्चे, माता पिता और भाई और उनके बीवी-बच्चों समेत 25 लोग रहते हैं.

घर में न पानी है और न ही बिजली. गली में आने वाले टैंकर से उन्हें पानी मिलता है.

भविष्य को लेकर वो कहते हैं, "भगवान ही जाने कब ये मसला ख़त्म होगा."

<bold>(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप<link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>