नज़रिया: 'पाकिस्तान को पैसे देकर एहसान नहीं कर रहा अमरीका'

डोनाल्ड ट्रंप
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अमरीका ने पाकिस्तान को दी जा रही सैन्य मदद रोक दी है. उसका कहना है कि पाकिस्तान जब तक हक्कानी नेटवर्क और अफग़ान तालिबान पर कार्रवाई नहीं करता तब तक यह सहायता बंद रहेगी.

अमरीका के इस कदम का पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा? क्या अब वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी ऐसी कोई कार्रवाई कर सकते हैं? क्या वाकई हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान में सक्रिय है? अब पाकिस्तान की मदद के लिए कौन से देश आगे आ सकते हैं? इन सब सवालों पर बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव ने पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकारमरियाना बाबर से बात की.

अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन के साथ पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ
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पढ़ें मरियाना बाबर का नज़रिया:

हमारे विदेश मंत्रालय ने बताया है कि अमरीका और पाकिस्तान के बीच इस मुद्दे पर बातचीत जारी है.

ट्रंप को नज़र आ रहा है कि अफ़गानिस्तान में उनका बुरा हाल है और अफग़ान-तालिबान कामयाबी की तरफ जा रहे हैं. ट्रंप को पता है कि अभी बर्फ पिघलने वाली है और लड़ाई तेज़ हो जाएगी. इसलिए वो हाथ खींच रहे हैं.

पाकिस्तान सेना

'पाक ने भी लगाए अपने पैसे'

फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग के तहत अमरीका बाहर के देशों की मदद करता है. अमरीका ने इसी कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को मिल रहे 25 करोड़ डॉलर की रकम को रोकने की घोषणा की है.

पाक-अफग़ान सीमा पर और अफग़ानिस्तान के अंदर भी पाकिस्तान अमरीका की मदद कर रहा है. दोनों देश मिलकर दहशतग़र्दी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं.

अफग़ानिस्तान में चलाए जा रहे अमरीकी अभियानों को मदद देने के बदले अमरीकी कांग्रेस पाकिस्तान को 70 करोड़ डॉलर की सहायता राशि देती है. पाकिस्तान जो काम करता है उसके बिल वो अमरीका को भेजता है. लेकिन अमरीकी कांग्रेस ने 70 करोड़ डॉलर की बकाया रकम को भी रोक दिया है. यह ज़्यादती है. एक और निधि है गठबंधन सहायता निधि (सीएसएफ), जिसके तहत 35 करोड़ डॉलर रोक दिया गया है.

हालांकि पाकिस्तान को इसका बहुत फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उसने दहशतग़र्दी के ख़िलाफ़ मुकाबले में अपने पैसे भी लगाये हैं.

सेना

'चीन, रूस, तुर्की मददगार'

नाटो के ट्रक कराची से माल अफग़ानिस्तान ले जाते हैं जिसमें पाकिस्तान की सड़कें और संसाधन इस्तेमाल किये जाते हैं. पाकिस्तान ने कभी इसके लिए कोई पैसे नहीं मांगे. अमरीका ने शमसी एयरबेस का भी इस्तेमाल किया लेकिन पाकिस्तान ने इसके लिए उससे कोई पैसे नहीं लिये.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़्वाज़ा आसिफ ने चैलेंज किया कि एक इंटरनेशनल ऑडिटर लाएंगे और वो देखेगा कि आपने हमें कितने दिये, हमने कितने इस्तेमाल किये और बकाया रकम कितनी है जो आप नहीं दे रहे हैं. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध बहुत मुश्किल हालात में हैं.

पाकिस्तान को पता था कि अमरीका धीरे धीरे सैन्य मदद देना बंद कर देगा. इसलिए पाकिस्तान ने चीन, रूस, तुर्की के साथ समझौते किए हैं. जापान के विदेश मंत्री ने भी कहा है कि दहशतग़र्दी के ख़िलाफ़ पाकिस्तान ने बहुत कुर्बानियां दी हैं और वो मदद करेंगे.

आज पाकिस्तान फौजी साजो-सामान के लिए पूरी तरह अमरीका पर निर्भर नहीं है. अमरीका के यरूशलम को लेकर संयुक्त राष्ट्र में जो वोटिंग हुई उसमें अमरीका का केवल नौ देशों ने समर्थन किया.

अफगान सीमा
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'अमरीका को होगा घाटा'

अक्तूबर में ट्रंप ने ट्वीट किया था कि अमरीका के पाकिस्तान से संबंध बेहतर हुए हैं.

तब अमरीकी खुफिया विभाग ने आईएसआई से अफग़ानिस्तान की सीमा से पाकिस्तान आ रही एक गाड़ी से कई सालों से अगुवा जोशुआ बॉयले के परिवार को छुड़ाने को कहा था. आईएसआई ने फौरन कार्रवाई की और उन्हें छुड़ा लिया. इस ऑपरेशन में खर्च ज़रूर हुआ होगा लेकिन पाकिस्तान ने उसके पैसे नहीं लिए.

अमरीका ने पाकिस्तान की मदद से तालिबान को रोका है. अगर पाकिस्तान इससे हट जाए तो अमरीका अकेले दहशतग़र्दी से मुकाबला नहीं कर सकेगा.

पाकिस्तान से अफगानिस्तान जाते ट्रक
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'नुकसान अफगानिस्तान का होगा'

अफग़ानिस्तान में अमरीका और नाटो ने पाकिस्तान की मदद से आईएस को रोक रखा है. पाकिस्तान के बगैर वो इतना कुछ कैसे कर सकेगा?

अफग़ानिस्तान और तालिबान के बीच बातचीत होनी चाहिए जिससे एक सियासी हल हो जाए. उसमें भी पाकिस्तान की मदद चाहिए होगी.

नुकसान अफग़ानिस्तान को होगा. पाकिस्तान की फौज ने पहले से ही इसके इंतजाम कर रखे हैं. इसलिए यह नुकसान क्षणिक है.

हालांकि अमरीका का आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक में बहुत बड़ा किरदार है और वो पाकिस्तान को मिलने वाले कर्ज को दबाव डालकर रोक सकता है.

अमरीका और पाकिस्तान

पाकिस्तान से बातचीत करे अमरीका

ट्रंप को यह समझने की जरूरत है कि वो पाकिस्तान को उसके किए हुए काम के पैसे रोक रहे हैं. वो यह रकम देकर पाकिस्तान पर कोई एहसान नहीं कर रहा है. पाकिस्तान ने दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ काम किया है और वो उसके पैसे मांग रहा है.

पाकिस्तान ने कहा है कि अमरीका का रवैया अच्छा नहीं है. लेकिन मसला है दहशतग़र्दी को खत्म करने का. अफग़ानिस्तान में दहशतगर्दी ख़त्म होगी तभी पाकिस्तान में भी ऐसा होगा.

इसलिए पाकिस्तान ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में कहा है कि वो अमरीका से बातचीत करने को तैयार है.

सांकेतिक तस्वीर
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नहीं हैं हक्कानी नेटवर्क और अफगान तालिबान

हक्कानी नेटवर्क की जहां तक बात है पाकिस्तान ने पूछा है कि अमरीका बताए कि वो कहां हैं.

पाकिस्तानी सरकार अफग़ान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान में मौजूद होने से इंकार करती है.

पाकिस्तान जानता है कि अमरीका ऐबटाबाद की तरह कार्रवाई कर सकता है.

अफग़ानिस्तान के अंदर पाकिस्तान तालिबान हैं. वो पाकिस्तान के अंदर हमला करते हैं. अमरीका को इसकी जानकारी है. वो उसे क्यों नहीं रोकता?

पाकिस्तान और अमरीका के बीच दरार से दहशतग़र्दों को फायदा होगा.

अफगान विस्थापित

अफग़ान विस्थापित बड़ी समस्या

पाकिस्तान में अब भी 20 लाख अफग़ान विस्थापित रह रहे हैं. पाकिस्तान उन्हें वापस भेजने में अमरीका की मदद चाहता है. इनके कैंपों में अफ़ग़ान तालिबान आकर पनाह लेते हैं.

सीमा पार करने से इनको रोकने की कोशिश की गई है. लेकिन यह सीमा बहुत बड़ी है और इस पर पूरी तरह से बाड़ लगाना संभव नहीं है.

यह पाकिस्तान की ज़िम्मेदारी है कि अफग़ान तालिबान, हक्कानी नेटवर्क या पंजाबी जिहादी हो सब के ऊपर कार्रवाई करनी चाहिए.

हाफ़िज़ सईद
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हाफ़िज़ सईद का क्या होगा?

पंजाबी जिहादी हाफ़िज़ सईद पर हिंदुस्तान में दहशतग़र्दी के इल्ज़ाम हैं. मुंबई अटैक के आरोप हैं. लेकिन वो बच जाते हैं क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान के अंदर ऐसी कोई हरकत नहीं की है.

लेकिन अब वो दिन नहीं रहे कि हाफ़िज़ सईद या अन्य जिहादी पाकिस्तान में रहकर भारत में या कश्मीर में दहशतग़र्दी कर सकें. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और पाकिस्तान में भी इन्हें खत्म करने की आवाज़ उठती है.

जनता कहती है कि ये पाकिस्तान के शियाओं के ख़िलाफ़ हैं. पाकिस्तान के लोग ही इनसे बहुत तंग हैं.

अभी एक और मुहिम चल रही है. इनके राजनीति में आने की बात हो रही है. चुनाव आयोग ने कुछ जिहादियों को इजाजत नहीं दी है.

अगर ये चुनाव में आते हैं तो ये देखना होगा कि इन्हें वोट कितने मिलते हैं क्योंकि पाकिस्तान में दक्षिणपंथियों को कम वोट मिलते हैं.

(ये मरियाना बब्बर के निजी विचार हैं.)

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