ये आदि मानव नहीं, इसी दुनिया के लोग हैं

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, भागलपुर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

यह कहानी पुरापाषाण काल की नहीं, आज की है. ये लोग भी हमारी विकसित सभ्यता के हैं, कोई आदि मानव नहीं. नीचे जहां गंगा बह रही हैं, पहले वहां सड़क थी. गंगा का ठिकाना भी कहीं दूर था. बाढ़ आयी, तो गंगा ने रास्ता बदला. और इन लोगों ने अपने ठिकाने.

पहले ये लोग घर में रहते थे. अब आम के पेड़ पर बांस से बने मचान पर रहने को मजबूर हैं.

बिहार के भागलपुर ज़िले में सबौर प्रखंड के खनकिता से इंगलिश जाने के दौरान घोसपुर, फरका और ममलखा गांवों में ऐसे लोग दिख रहे हैं. पहले इनकी झोपड़ियां थीं. पानी आया, तो पक्के घर वाले छतों पर चले गए. इनके पड़ोस में भी पक्की छत नहीं थी. इसलिए इन लोगों ने पेड़ पर मचान बना लिया.

नाव के जरिए खनकिता से ममलखा जाते वक्त इस नजारे पर सहसा यकीन करना मुश्किल था. मैंने नाव मुड़वानी चाही तो नाविक रामचरितर मंडल ने उधर जाने से इंकार कर दिया.

सलाह भी दी. मत जाइए. वहां पेड़ पर बहुत सांप हैं. नाव गयी तो सांप नीचे गिर जाएंगे. हमें ख़तरा हो सकता है. बहुत अनुरोध के बाद रामचरितर ने नाव मोड़ी. हिदायत दी कि ज्यादा नजदीक नहीं जाएंगे. दूर से ही देख लीजिए.

रामचरितर मंडल ने बताया, "खनकिता और इंगलिश पंचायतों के कई गांवों में कुछ लोग ऐसे रह रहे हैं. बीच में एसडीओ साहब ने कुछ लोगों को जबरदस्ती उतार कर सबौर के बाढ़ राहत शिविर मे पहुंचाया. कुछ लोग नहीं गए. ये वही लोग हैं."

इस बीच हमारी नाव थोड़े और नजदीक पहुंचती है. मै पूछता हूं कि क्या नाम है? जवाब आता है बैरिस्टर मंडल.

पेड़ पर क्यों चढ़े हैं?

क्या करेंगे सर.

फिर मैंने पूछा खाना खाए? जवाब हां में मिलता है.

तभी उनके बच्चे कहते हैं कि आज सुबह कुछ लोग खिचड़ी और पानी की बोतल देकर गए हैं. वही खाए हैं. उन्हें दो रातों से कुछ भी खाने को नहीं मिला था. गंगा का पानी ही पी रहे थे.

बातचीत कठिन है. चिल्लाना पड़ता है. बहुत कोशिशों के बाद हमारा संवाद होता है तेतरी देवी से.

कहती हैं कि नाव आएगी तो सबौर चले जाएंगे. यहां रहने की हिम्मत नहीं बची है अब.

रामचरितर मंडल नाव मोड़ते हुए बताते हैं कि घोसपुर और फरका में भी कुछ लोग ऐसे ही रह रहे हैं.

इधर, जल संसाधन विकास विभाग ने 31 अगस्त की शाम 5 बजे गंगा का जलस्तर 34.41 मीटर रिकार्ड किया. रात 10 बजे तक इसके 32.49 मीटर पर पहुंचने की उम्मीद है. जलस्तर मे गिरावट है लेकिन गंगा अभी भी ख़तरे के निशान 31.09 मीटर से ऊपर बह रही है.

मतलब, खनकिता और ममलखा गांवों से पानी छंटने में कुछ और दिन लगेंगे. इन लोगों को कुछ और दिन ऐसे ही पेड़ पर रातें काटनी होंगी. उन सांपों के साथ. ये सांप भी अपनी ज़िंदगी ऐसे ही पेड़ों पर चढ़कर बचा रहे हैं.

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