बिहार में शराबबंदी से होम्योपैथी दवाएँ महंगी

होम्योपैथी दवा
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए तीन महीने से ज़्यादा वक़्त हो चुका है. सरकार इसके फ़ायदे में यह भी गिनाती है कि शराबबंदी से आबादी के एक बड़े हिस्से का बीमारियों के इलाज पर ख़र्च कम होगा.

लेकिन इसी फ़ैसले के साइड इफ़ेक्ट से होम्योपैथी का इलाज मंहगा हो गया है.

होम्योपैथी दवाएं बनाने में स्प्रिट का ख़ासा इस्तेमाल होता है, लेकिन शराबबंदी के बाद सरकार ने होम्योपैथी दवा बनाने वाली कंपनियों को इसकी सप्लाई बंद कर दी है.

पटना के मछुआ टोली इलाक़े में रहने वाले संजय श्याम होम्योपैथी दवाओं का नियमित इस्तेमाल करते हैं.

होम्योपैथी दवा

वो बताते हैं, "पहले ज़रूरत के मुताबिक़ कम ख़ुराक की दवाइयाँ मिल जाती थीं. लेकिन अब तीस मिलीलीटर के पैक से कम वाली दवाई नहीं मिलती है."

श्याम के मुताबिक़ इस कारण अगर उन्हें पहले दस रुपए ख़र्च करने पड़ते थे, तो अब पचास से साठ रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं.

निबंधन, उत्पाद और मद्य निषेध विभाग के प्रवक्ता ओमप्रकाश मंडल का कहना है, "स्प्रिट का इस्तेमाल शराब बनाने में हो सकता है, इसकी वजह से होम्योपैथी दवा बनाने वाली कंपनियों को स्प्रिट का आवंटन बंद कर दिया गया है."

स्प्रिट की सप्लाई बंद करने के साथ-साथ सरकार ने ऐसी दवाओं के 30 मिलीलीटर से बड़े पैक पर भी पाबंदी लगा दी है, जिसमें 12 फीसदी या इससे अधिक अल्कोहल होता है.

सकड़ पर नारे

बिहार में जब ऐसी पाबंदी नहीं थी तो कंपनियाँ दवाओं के बड़े जार बनाती थीं. दवा दुकानों की मानें तो इसकी वजह से उनका कारोबार भी क़रीब आधा रह गया है.

इस पाबंदी के ख़िलाफ़ बिहार राज्य होम्योपैथिक संघ ने आवाज़ उठाई है.

संघ के सचिव डाक्टर केके आज़ाद बताते हैं, "हमने धरना-प्रदर्शन किया, हड़ताल रखा, लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई. इसके बाद हमने पटना हाइकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है."

एक अनुमान के मुताबिक़ बिहार में होम्योपैथी की दवाओं का बाज़ार क़रीब चार सौ करोड़ रुपए का है. इस पाबंदी के कारण यह कारोबार काफ़ी प्रभावित हो रहा है.

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