...ताकि बचा रहे लोकतंत्र!

कलबुर्गी
इमेज कैप्शन, कलबुर्गी की दिन दहाड़े हत्या पर देश भर के लेखकों ने विरोध प्रकट किया
    • Author, मंगलेश डबराल,
    • पदनाम, वरिष्ठ कवि, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

वर्ष 2015 को पुरस्कार वापसी के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

बढ़ती हुई असहिष्णुता, सांप्रदायिकता और हिंसा के विरोध में चालीस से अधिक लेखकों और चौबीस फ़िल्मकारों का केंद्रीय साहित्य अकादमी, राज्यों की अकादमियों और फ़िल्म के राष्ट्रीय पुरस्कारों को लौटाया जाना सहसा इतनी बड़ी घटना बन गया कि केंद्र सरकार विचलित हो उठी.

सरकार के मंत्री, नेता और भाजपा के मातृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग ‘नुक़सान की भरपाई’ के लिए ऐसे बयान देने लगे जिनमें या तो लेखकों के प्रति अपमान का नज़रिया था या वे बहुत हास्यास्पद थे. बयानों से कोई ‘क्षतिपूर्ति’ नहीं हो सकी.

संघ परिवार के कई प्रवक्ता समाचार चैनलों पर बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा की दुर्गति के लिए भी काफ़ी हद तक लेखकों की पुरस्कार वापसी को ज़िम्मेदार ठहराते रहे. जिससे फिर यही पता चलता था कि वे इस घटना से किस क़दर मनोग्रस्त और चिंतित हैं.

लेखकों का विरोध प्रदर्शन

पुरस्कार वापसी की यह घटना अनायास और स्वतःस्फूर्त ढंग से हुई. इसमें किसी संगठित राजनीतिक दल का हाथ नहीं था और न लेखकों की तरफ़ से कोई सामूहिक अभियान ही चलाया गया.

सभी लेखकों ने अलग-अलग, एक दूसरे से पूछे बिना और निजी विवेक से अपना प्रतिरोध दर्ज किया था.

इसका एकमात्र तरीक़ा उन्हें यही लगा कि भारतीय राज्य की ओर से जो सम्मान या प्रतीक उन्हें अपने योगदान के लिए मिला है उसे वापस कर दें.

लेकिन यह देखकर हैरत होती है कि इसके कारणों को जानने की बजाय संघ परिवार ने ऐसे रचनाकारों को कांग्रेसी और कम्युनिस्ट क़रार दिया और कहा कि ये वे लोग हैं जिन्होंने पिछली सरकारों से कई लाभ उठाए हैं.

कलम और पोस्टर
इमेज कैप्शन, लेखकों के विरोध प्रदर्शन का यही एक तरीका रहा है और पहले पुरस्कार वापसी को गंभीर मुद्दा माना जाता था

एक ‘ज़िम्मेदार’ केंद्रीय मंत्री ने तो अमरीका यात्रा के दौरान अपनी अत्यंत ‘मौलिक’ कल्पनाशक्ति का परिचय देते हुए कह दिया कि उनके पास इसके ठोस प्रमाण हैं कि पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों को पैसे दिए गए.

यह और बात है कि वे कोई प्रमाण नहीं दे पाए, उल्टे उन्हें सरकार ने अपना मुहं बंद रखने की ही सलाह दी. संघ परिवार स्थितियों की जटिलता को समझने के बजाय अक्सर सरलीकरणों का सहारा लेता है और हर घटना के पीछे कोई निहित स्वार्थ या किसी का हाथ खोज लेता है.

लेखकों की कार्रवाई को किसी सत्ता-राजनीति का खेल या चाल बताना इसी का संकेत है.

रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता में व्यंग्य करते हुए कहा है: ‘लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/ कह कर आप हँसे.’

हमारे देश में लोकतंत्र और उसके मूल्यों पर जब भी कोई संकट आता है, राजनेता प्रसन्न हो उठते हैं क्योंकि आम तौर पर यह संकट उन्हीं की देन होता है.

पुरस्कार वापस करने वाले लेखक

लेखक, फ़िल्मकार, इतिहास और विज्ञान से जुड़े बुद्धिजीवी अपने सम्मानों को लौटाकर या राष्ट्रपति को विरोध-पत्र लिखकर उस लोकतंत्र को, उसके बहुलतावाद, उसकी बहुवचनीयता और संविधान में दी गई नागरिक आज़ादियों और असहमति की संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहे थे.

यह प्रचार भी किया गया कि पुरस्कार वापस करके लेखकों ने ‘राष्ट्र का अपमान’ किया है और वे ‘देशद्रोही’ हैं.

क्या सचमुच ऐसा है? देश कोई वायवीय इकाई नहीं है, वह उसके लोगों से ही निर्मित होता है. यानी लोग ही देश होते हैं और देश से प्रेम करने का अर्थ उसके नागरिकों से प्रेम करना है.

जब कभी देश के कुछ लोग या संगठन या सत्ताधारी कोई ग़लत और मनुष्य-विरोधी आचरण करते हैं तो संवेदनशील नागरिक होने के नाते बुद्धिजीवियों को प्रतिरोध और प्रतिकार की अनिवार्यता महसूस होती है.

यही वास्तविक देशप्रेम है और किसी भ्रष्ट, तानाशाह और वर्चस्ववादी व्यवस्था से अपने देश और समाज को बचाने के प्रयास करना भी देश-प्रेम का ही एक आयाम है. दुनिया में मनुष्य की मुक्ति के संघर्ष इसीलिए हुए.

संघ परिवार को अपने अस्तित्व के लिए हमेशा एक शत्रु की या उसकी कल्पना की ज़रूरत रही है.

अनंतमूर्ति
इमेज कैप्शन, उस दुख की सिर्फ कल्पना की जा सकती है जो लेखक अनंतमूर्ति को पुलिस संरक्षण में जीवन बिताने पर हुआ होगा

इसीलिये वह यूआर अनंतमूर्ति से लेकर गोमांस खानेवालों और फ़िल्म अभिनेता आमिर ख़ान तक को तुरंत पाकिस्तान जाने का फ़रमान सुनाता रहा है.

यह भी कैसा विद्रूप-भरा संयोग है कि एक तरफ़ हम देश के 'उग्रवादी आलोचकों' को पाकिस्तान भेजना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के हाफिज सईद जैसे उग्रवादी उनका स्वागत करने के बयान जारी करते हैं!

आज हम इसकी कल्पना ही कर सकते हैं कि अनंतमूर्ति जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के और अपनी मिट्टी से गहरे जुड़े लेखक (उनके उपन्यास ‘संस्कार’ के एके रामानुजम के अनुवाद को पश्चिम में भारतीय साहित्य की प्रमुख पहचान माना जाता है) को कितनी पीड़ा हुई होगी जब उन्हें पाकितान यात्रा का कार्यक्रम भेजा गया, उनके घर की दीवारों पर पाकिस्तान जाने के पोस्टर चिपकाए गए और उनका जो थोडा बचा हुआ जीवन था, उसे पुलिस संरक्षण में गुजारना पड़ा.

लेकिन संघ परिवार खुद को दुःख नहीं, बल्कि घृणा और प्रतिशोध की खुराक पर पालता है. पुरस्कार लौटाने वालों का प्रतिकार समाज में दुःख की समाप्ति और प्रतिशोध की संस्कृति के विरुद्ध भी था.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link>पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>