शेयर बाज़ार में बचना है तो ये 5 मिथक जान लें

    • Author, ब्रायन ब्रॉजकोवास्की
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल
  • प्रकाशित

जब बाज़ार में गिरावट देखने को मिलती है, तो आम लोगों की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?

दिमाग में भी अफ़रा-तफ़री मच जाती है चाहे इसका हमारे शेयरों से कुछ लेना देना भी न हो.

उस वक़्त लोग ये भूल जाते हैं कि शेयर बाज़ार में किस तरह से निवेश होता है. वे बस बाज़ार से अपना पैसा बाहर निकाल लेना चाहते हैं, ताकि किसी तरह का नुक़सान न हो जाए.

अब बीते 24 अगस्त का ही उदाहरण ले लीजिए. इस दिन दुनिया भर के ग्लोबल स्टोक्स मार्केट्स में मंदी दिखी, लेकिन अगले ही दिन बाज़ार में बढ़ोत्तरी दर्ज होने लगी.

जिन लोगों ने हड़बड़ाहट में अपने शेयर बेच दिए, उनको नुक़सान उठाना पड़ा.

जब बाज़ार में मंदी हो या फिर बढ़ोत्तरी का दौर हो, दोनों हालात में निवेश से जुड़ी कुछ बातों का ख़्याल रखना चाहिए. <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> की नज़र में वो पांच बातें क्या हैं?

1. बाज़ार का अनुमान लगाना?

2008 की आर्थिक मंदी के समय में कई स्टॉक पोर्टफ़ोलियो बाज़ार से ग़ायब हो गए थे. ऐसा इसलिए नहीं हुआ था कि बाज़ार में 30 फ़ीसदी से 40 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज हुई थी. बल्कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि लोगों ने अपने शेयर बेच दिए थे और उन्होंने उसे बाज़ार सुधरने के बाद ही वापस ख़रीदा.

आम लोग सोचते हैं कि जब बाज़ार में गिरावट हो तो अपने शेयर बेच देने चाहिए और बाज़ार में स्थिति बेहतर होने पर फिर से शेयर ख़रीदना चाहिए. लेकिन मुश्किल यह है बाज़ार की स्थिति कब सुधरेगी, इसका अनुमान लगाना असंभव है.

अप्रैल, 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक़ मल्टी एसेट फंड्स के सिक्यूरिटी मैनेजर बाज़ार पर नज़र रखते हुए विभिन्न शेयरों को ख़रीदते-बेचते रहते हैं लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं मिलता है जो बाज़ार के अच्छे समय के बारे में बता सके. केवल दो फ़ीसदी मामलों में बाज़ार के सुधरने का अनुमान सही साबित हुआ है.

वैसे यहां यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि अगस्त में बाज़ार इसलिए गिरा क्योंकि लोगों को दूसरी आर्थिक मंदी का डर सता रहा था. पिछले 12 महीनों में तेल की क़ीमतें कम हो रही है और चीन की आर्थिक व्यवस्था में मंदी जैसे हालात हैं. निवेशकों में इस बात की चिंता है कि अमरीका अपने ब्याज दर को बढ़ाएगा और अमरीकी कॉरपोरेट समूहों का लाभ कम होगा.

तो ऐसे में क्या अपने शेयरों को बेच देना चाहिए? नहीं, एकदम नहीं. अमरीकी इक्विटी स्ट्रेटजिस्ट एस एंड पी कैपिटल आईक्यू के सैम स्टोवाल के मुताबिक़ शेयरों को नहीं बेचना चाहिए.

सैम के मुताबिक़ हर 18 महीने पर अमरीकी बाज़ार ख़ुद में सुधार लाता है. तब बाज़ार में 10 फ़ीसदी की गिरावट देखने को मिलती है. सैम ये भी बताते हैं कि 2009 से अमरीकी बाज़ार में ऐसा सुधार नहीं हुआ था लिहाज़ा अगस्त में गिरावट ज़्यादा होगी, यह एक तरह से होना ही था.

सैम के मुताबिक़ अमरीकी शेयर बाज़ार में लिस्टेड 90 प्रतिशत शेयरों की क़ीमतों में 14 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट दर्ज नहीं होगी. ऐसे में जो लोग शेयरों को बेच देंगे उन्हें आने वाले दिनों में होने वाला लाभ नहीं मिल पाएगा.

2. मज़बूत अर्थव्यवस्था, मज़बूत स्टॉक मार्केट?

अमूमन लोग सोचते हैं कि बेहतर आर्थिक विकास दर से बेहतर रिटर्न मिलेगा. नार्थ अमरीकी इक्विटी के प्रमुख और लंदन स्थित अबेरडीन एसेट मैनेजमेंट इंक के प्रमुख पाउल एटकिंसन के मुताबिक़ ऐसा सोचने की वजह भी है.

जब लोगों की नौकरियां सुरक्षित हों, वित्तीय स्थिति मज़बूत हो तो वे ख़र्च और निवेश के बारे में सोचते हैं. इससे अर्थव्यवस्था को भी फ़ायदा होता है. लेकिन यह धारना कितनी सच है?

वास्तविकता ये है कि यह इतना आसान भी नहीं है. कई अध्ययनों के मुताबिक़ आर्थिक विकास दर का बाज़ार में होने वाली बढ़ोत्तरी से कोई लेना देना नहीं होता. लंदन बिज़नेस स्कूल के एक अध्ययन में 1900 से 2011 के बीच 17 देशों की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया गया. औसतन इसमें देखा गया कि जब बाज़ार में बढ़ोत्तरी होती है तब देश की जीडीपी में गिरावट होती है. एटकिंसन कहते हैं, "एकदम विपरीत का नाता है."

हाल-फिलहाल के उदाहरण की बात हो तो यूरोप और एशिया के बाज़ार को देखना चाहिए. 2012 में फ्रांस के सीएसी40 के सूचकांक में 14 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी देखी गई, तब जीडीपी में कोई विकास नहीं हुआ था. उसी साल हांगकांग के शेयर बाज़ार में 22 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी देखी गई जबकि उसी दौरान चीन की आर्थिक विकास दर 9.8 फ़ीसदी से कम हो कर 7.8 फ़ीसदी पर पहुंच गई है.

2010 में ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था 7.5 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही थी लेकिन वहां का स्टॉक मार्केट गिरकर एक फ़ीसदी तक पहुंच गया था. अगस्त 2015 में अमरीकी स्टॉक मार्केट में गिरावट देखने को मिली है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के मुताबिक़ इस साल देश की आर्थिक विकास दर 3.5 फ़ीसदी की दर से बढ़ेगी.

ऐसे में शेयर बाज़ार में क्या हो रहा है? हाल ही में टोरंटो स्थिति टीडी वाटरहाउस के चीफ़ पोर्टफ़ोलियो स्ट्रैटजिस्ट के तौर पर रिटायर हुए बॉब गोरमन ने कहा, "शेयर बाज़ार की पूरी व्यवस्था एक ढीली व्यवस्था है." इसका मतलब यह है कि शेयर बाज़ार में उतार चढ़ाव भविष्य की घटनाओं पर निर्भर होता है, वह वर्तमान की घटनाओं पर आधारित नहीं होता.

गोरमन सलाह देते हैं, "जो गिरा है, वह चढ़ेगा भी, निवेश करने के लिहाज़ से यह नज़रिया ज़्यादा सही होगा." निवेश करने के लिए मंदी का समय ही उपयुक्त होता है, जो बाज़ार की स्थिति सुधरने की उम्मीद करेंगे, उन्हें बाज़ार का फ़ायदा नहीं मिल पाएगा.

3. प्राइस-टू-अर्निंग का अनुपात कम हो तो कंपनी का वैल्यू सही है?

आम तौर पर लोग अंडर वैल्यूड कंपनी की तलाश करते हैं. इसके लिए वे प्राइस-टू-अर्निंग वैल्यू पर निर्भर होते है. पीई वैल्यू का मतलब यह होता है कि लोग प्रति रुपये या डॉलर की आमदनी पर कितना पैसा ख़र्च करना चाहते हैं.

अगर लोगों को भविष्य में आर्थिक विकास की उम्मीद है तो वे ज़्याद पैसा ख़र्च करना चाहेंगे. अगर उन्हें कम आमदनी की उम्मीद होगी तो वे कम पैसा देना चाहेंगे. यह दुनिया भर के फंड मैनेजरों को बताया जाता है. गोरमन के मुताबिक़ अगर पीई अच्छे स्तर पर हो तो उस स्तर पर ख़रीददारी करना बेहतर नहीं है.

गोरमन ये भी कहते हैं कि तीनों तरह के पीई अनुपात को देखना चाहिए- पीछे वाला, मौजूदा और आने वाला. गोरमन आने वाले समय के पीई वैल्यू को सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं. वे कहते हैं, "यह जानना सबसे ज़रूरी है कि चीज़ें भविष्य में कैसी होंगी?"

गोरमन ये भी बताते हैं कि अगर इन सबके वैल्यू कम हों तो फिर स्टॉक को अंडरवैल्यूड माना जा सकता है.

4. ज़्याद लाभ देने वाले शेयर बेहतर हैं?

2009 से ज़्यादातर निवेशकों ने डिविडेंड स्टॉक्स में निवेश करना शुरू किया जो 5 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा लाभ दे रहे थे. निवेशक इन कंपनियों के प्रति इसलिए आकर्षित हुए क्योंकि वे बाँड के ज़रिए ज़्यादा पैसे नहीं कमा सकते थे.

लेकिन बाद में ऐसा हुआ कि कंपनियों ने अपने डिविडेंड में कटौती कर दी. एटकिंसन के मुताबिक़ उन कंपनियों के शेयर में निवेश करना चाहिए जो साल दर साल अपने डिविडेंड बढ़ाते हैं.

औसतन डिविडेंड दो से पांच फ़ीसदी की दर से मिलता है. इससे ज़्यादा के दावे की जांच ज़रूरी है. अगर लाभ ज़्यादा है तो समझना चाहिए कि कंपनी इसमें कटौती करने ही वाली है.

5. ख़रीदना और उसे होल्ड करना सबसे बेहतर उपाय?

ज़्यादातर निवेशकों को 1990 का दौर याद होगा जब उन्होंने जो भी ख़रीदा वह स्टॉक मार्केट के बढ़ोत्तरी के दौर में मुनाफ़े का सौदा साबित हुआ. लेकिन इसके बाद लोगों ने बुलबुले को ख़त्म होता हुआ भी देखा और मंदी का दौर भी. इसके बाद बाज़ार में सुधार भी हुआ.

अब अगर केवल शेयर ख़रीद कर उसे होल्ड किया जाए तो मुनाफ़े का मिलना संभव नहीं होगा. गोरमन के मुताबि़क बदलती आर्थिक परिस्थितयों में ही तो मुनाफ़ा कमाने का मौक़ा मिलता है. गोरमन ये भी कहते हैं कि लंबे समय तक निवेश करना दूसरी बात है, शेयर ख़रीद कर होल्ड करना दूसरी बात.

गोरमन के मुताबिक़ लोगों को अपने शेयर तीन से पांच साल तक होल्ड करना चाहिए लेकिन इस दौरान उसे बेचने के मौक़े भी देखते रहना चाहिए.

गोरमन की सलाह के मुताबिक़ अपने पोर्टफोलियो की समय समय पर समीक्षा करते रहना चाहिए. इतना ही नहीं गोरमन के मुताबिक़ कभी बहुत ज़्यादा एक्साइटेड नहीं होना चाहिए ना ही हर वक़्त शेयर ख़रीदने-बेचने के काम में लगना चाहिए. वे कहते हैं, "समय कभी ख़त्म नहीं होता. धीरे धीरे निवेश करना ही सबसे बेहतर रास्ता है."

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख </caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20131014-when-to-ignore-investing-rules" platform="highweb"/></link>यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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