भारत के 'एक ओर कुआं, दूसरी ओर खाई'

modi nawaz ufa meet
    • Author, नितिन पई और प्रणय कोटस्थाने
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत-पाकिस्तान के मीडिया में पिछले हफ़्ते एक ही मुद्दा छाया रहा, वह था दोनों देशों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वार्ता.

यह बात अलग है कि बातचीत रद्द ही हो गई.

कई विश्लेषक इसके कारण समझाने की कोशिश कर चुके हैं. लेकिन सवाल यह है कि इस प्रसंग से भारत को क्या सीख लेनी चाहिए?

क्या यह घटना बातचीत की प्रक्रिया पर पूर्णविराम है? भविष्य में भारत की पाकिस्तान नीति क्या होनी चाहिए?

अभी वार्ता व्यर्थ है

साल 1972 के शिमला समझौते में दोनों देशों की सरकारों ने यह फ़ैसला किया था कि सभी मुद्दे सिर्फ द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाए जाएंगे.

india pakistan flags

लेकिन सच्चाई यह है कि वार्ता में दो पक्ष तो पाकिस्तान की ओर से ही शामिल हैं! एक पक्ष है पाकिस्तान की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार और दूसरा है पाकिस्तान का सैन्य-जिहादी गठबंधन.

दूसरा पक्ष भारत का कट्टर विरोधी है, भारत से किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है और यही आज पाकिस्तान में शक्तिशाली है.

ऐसी स्थिति में भारत जब भी पाकिस्तान की सरकार से बातचीत का फ़ैसला करता है, फ़ायदा सिर्फ सैन्य-जिहादी गठबंधन का ही होता है.

एक तरफ़ कुआं, दूसरी तरफ़ खाई

यह कैसे संभव है? इस प्रश्न का उत्तर कुछ इस तरह हो सकता है- अगर भारत बातचीत से मना करता है तो सैन्य-जिहादी गठबंधन कहता है कि भारत पाकिस्तान को ध्वस्त करने की मंशा रखता है.

india pak

इस तर्क के सहारे यह गठबंधन सारी भारत विरोधी शक्तियों को एकजुट कर पाता है.

दूसरी ओर अगर भारत वार्ता में शामिल होता है तो सैन्य-जिहादी गठबंधन यह प्रचार करता है कि चाहे वह कितना ही आतंक क्यों न फैलाए, भारत के पास बातचीत के अलावा कोई और विकल्प है ही नहीं.

साथ ही हर बातचीत का दस्तूर होता है समझौता. इस समझौते के बल पर पाकिस्तान अपनी कुछ मांगें मनवाने में सफल होता है.

नतीजतन, सैन्य-जिहादी गठबंधन को भारत विरोधी हरकतें जारी रखने का प्रोत्साहन मिलता है, साथ ही साथ पाकिस्तान की एक-एक करके मांगें भी मंज़ूर हो जाती है.

तो आख़िर क्या करे भारत सरकार? एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई!

भारत की पाकिस्तान नीति

india pakistan soldiers border

भारत को पाकिस्तान से उच्च-स्तरीय वार्ता के जुनून को तब तक नियंत्रित रखना चाहिए जब तक पाकिस्तान में अपने अंदरूनी राजनैतिक बदलाव पूरा नहीं हो जाता.

इस बातचीत से केवल निराशा ही हाथ लगेगी.

भारत सरकार को पाकिस्तान नीति में कुछ बदलाव करना होगा.

पहला, भारत घुसपैठ को रोकने पर अपना ध्यान केंद्रित करे. बीएसएफ, पुलिस और खुफिया एजेंसियों को एक ढांचे के अंदर लाए जिससे ये तीनों मिलकर घुसपैठियों को नाकाम कर सकें.

सीमा पर पहरा बढ़ाएं और फ़ौज को हाई-अलर्ट की स्थिति में रखे.

india pakistan modi

दो, भारत अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने में ध्यान केंद्रित करे.

सिर्फ एक दशक की सुदृढ़ आर्थिक वृद्धि की बदौलत पाकिस्तान और भारत में इतना अंतर हो जाएगा कि किसी भी वार्ता में भारत का पलड़ा कई गुना भारी हो जाएगा.

15 साल पहले तक भारत और पाकिस्तान, दोनों का एक ही वाक्य में ज़िक्र एक अनकहा नियम था. लेकिन पिछले दशक की आर्थिक वृद्धि के कारण भारत की तुलना पाकिस्तान से कम ही होती है. अब आवश्यकता है इस अंतर को और बढ़ाने की.

तीन, भारत को सांप्रदायिक एकजुटता पर ध्यान देना होगा. जैसा कि हमने गुरदासपुर आतंकी हमले में देखा, सैन्य-जिहादी गठबंधन भारत की विविधता को उसकी कमज़ोरी समझता है और उसी दुखती रग का फ़ायदा उठाने की ताक में रहता है.

gurdaspur attack

इसलिए सरकार को सब धर्म-जाति के लोगों को साथ लेकर चलना होगा जिससे पाकिस्तान के नापाक मंसूबे सफल न हो पाएं.

वार्ताओं पर ध्यान लगाने के बजाय इन तीन बातों के आधार पर भारत अपनी पाकिस्तान नीति को आकार दे सकता है.

उच्च स्तरीय वार्ताओं पर अल्पविराम

ध्यान रहे, कूटनीति का अर्थ सिर्फ उच्च-स्तरीय वार्ता नहीं होता.

कब बात की जाए और कब नहीं, यह भी कूटनीति का अहम हिस्सा है.

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस बात का उल्लेख किया था कि यह वार्ता न तो पहली थी, न आख़िरी.

sushma swaraj

वैसे भी, भारत के लिए पाकिस्तान विवाद से ज़्यादा प्राथमिकता की कई और चीज़ें हैं - अच्छा होगा अगर हम उन पर ध्यान केंद्रित करें.

और जब पाकिस्तान सार्थक बातचीत के लिए तैयार हो जाए, तब हम उनसे गले मिलकर वार्ता का निमंत्रण दें.

(नितिन और प्रणय बेंगलुरू के थिंक-टैंक, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में कार्यरत हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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