ये नर्क से गुज़रते हैं ताकि आप साफ़ रहें

मुंबई के सफाईकर्मी, सुधारक ओल्वे
    • Author, सुधारक ओल्वे
    • पदनाम, डॉक्यूमेंट्री फ़ोटोग्राफ़र
  • प्रकाशित

ये कहानी है उन हज़ारों लोगों की, जो शहर भर की गंदगी साफ़ करते हैं.

इनमें से कुछ लोग तो जान जोखिम में डालकर ज़हरीली गैस से भरे चैंबरों में घुस कर सफ़ाई करते हैं.

सिर्फ़ मुंबई शहर की बात करें तो रोज़ाना सात हज़ार टन गंदगी निकलती है.

हैज़ा, टाइफ़ाइड, हेपेटाइटिस और प्लेग जैसी कई घातक बीमारियाँ गंदगी के कारण फैलती हैं.

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परमार को पुल की एक सीढ़ी साफ़ करने के लिए 20 बार झाड़ू फेरनी पड़ती है. सफ़ाई से इकट्ठा हुए कूड़े को बहुत तेज़ी के साथ समेटना होता है, ताकि तेज़ हवा उसे फिर न बिखेर दे.

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काम के दबाव की वजह से ये कर्मचारी थोड़ी देर के लिए भी आराम नहीं कर पाते हैं.

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इन सफाई कर्मियों को पशुओं के मल-मूत्र, फेंके गए सड़े खाद्य पदार्थ, धातुओं के टुकड़े, तार, अस्पतालों से निकले कूड़े, काँच के टुकड़े, ब्लेड जैसी चीज़ों की सफ़ाई करनी पड़ती है.

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माणिक सुबह 6 बजे काम पर पहुँच जाते हैं. उन्हें हमेशा डर रहता है कि अगर उन्हें देर हुई तो सुपरवाइज़र उन्हें ग़ैरहाज़िर मान लेगा और उनकी जगह किसी दूसरे अस्थायी मजदूर को काम पर रख लेगा.

माणिक पहले मेन रोड की सफ़ाई करते हैं. क़रीब 11 बजे सुपरवाइज़र उन्हें घरों के बीच की गलियों की सफ़ाई करने के लिए भेज देते हैं.

तस्वीर में दिख रही गली को माणिक पिछले 15 साल से साफ़ कर रहे हैं. गली में सफ़ाई करने के दौरान उनके ऊपर मांड़, मछलियों के छिल्के, बीयर की बोतलें वगैरह गिरती रहती हैं.

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उन्होंने बताया कि एक बार उनके ऊपर सैनिटरी पैड भी गिरा था. उनके साथियों ने अपनी झाड़ू से उनके चेहरे से ख़ून हटाया था. फिर भी वो गली की सफ़ाई करके ही बाहर निकले थे.

ये तस्वीरें पश्चिम मुंबई में ली गई हैं. इस इलाक़े में 65 किलोमीटर लंबाई के बड़े नाले, 56 किमी लंबाई के छोटे नाले और 52 किलोमीटर लंबाई के बॉक्स ड्रेन हैं. कुछ नाले इतने गहरे हैं कि उनमें एक डबल डेकर बस समा जाए.

जब ये सफ़ाई कर्मी अपना काम पूरा कर नालों से बाहर निकलते हैं वे ठंड से काँप रहे होते हैं.

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जब सफ़ाई कर्मी नालों में उतरते हैं तो अंदर घुप अंधेरा होता है. बाहरी दुनिया से उनका संपर्क पूरी तरह ख़त्म हो जाता है.

ज़हरीली गैसों की चपेट में आने या फिसल जाने का ख़तरा रहता है. कई बार वे बेहोश हो जाते हैं. कई बार तो पानी और कूड़े के बहाव से भी मुश्किलें पैदा हो जाती हैं.

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इस तरह का काम शायद किसी भी शख़्स को नहीं करना चाहिए. लेकिन सच तो यह है कि क़रीब 30 हज़ार लोग इस काम में लगे हैं

दूसरों की गंदगी साफ करने वालों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें समाज में हेय नज़र से देखा जाता है. कुछ सफ़ाई कर्मी मानते हैं कि इस काम की वजह से समाज उन्हें कूड़ा-करकट ही समझता है.

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शहर के अलग-अलग इलाक़ों से आने वाले कूड़े भरे ट्रकों से कूड़ा उतारने का काम दोपहर में होता है. इसलिए सफाई कर्मियों को कई बार कड़ी धूप या बारिश में यह काम करना होता है.

कूड़े के डम्पिंग ग्राउंड के आसपास कैंटिन या चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएं नहीं है, ताकि वे अपने कपड़े बदल सकें या आराम कर सकें.

पूर्वी और पश्चिमी मुंबई में पाँच डम्पिंग ग्राउंड हैं. ये सभी बदबू और गंदगी से भरपूर रहते हैं. ये सभी अपने क्षमता से अधिक भरे होते हैं.

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सफ़ाई कर्मी के रूप में काम करने के जो चंद 'लाभ' हैं, उनमें से एक यह है कि इन कामगारों को रहने के लिए एक खोली (कमरा) मिलती है.

तस्वीर में दिख रहे दोनों परिवार 10X12 फ़ुट के एक कमरे में रहते हैं. यहाँ एक खोली में दो या तीन परिवारों का रहना साधारण बात है.

कुछ खोलियों में लकीर खींचकर वहां की ज़मीन दो हिस्सों में बांटा जाता है और वहां दो परिवार रहते हैं. इन दोनों परिवारों के बीच कई साल तक बात नहीं होती है.

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दोनों परिवारों के बीच इस बात को लेकर मतभेद होता है कि खोली का असल मालिक कौन है, मृतक की पत्नी या उनके भाई.

एक खोली में 20-25 लोगों का रहना यहाँ सामान्य बात है.

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तस्वीर में एक सीढ़ी के नीचे के हिस्से में रहने वाला काम्बले परिवार दिख रहा है. काम्बले, उनकी पत्नी और उनके तीन बच्चे इसी जगह में रहते हैं.

उनकी पत्नी घरों में नौकरानी का काम करती हैं. वो बताती हैं कि कई बार मेम साहब उन्हें खाना वगैरह भी दे देती हैं.

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यहाँ दोबारा शादी होने का कोई सवाल नहीं उठता. ऐसा करने पर नौकरी और खोली दोनों खो देने का ख़तरा रहता है.

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ज़्यादातर सफ़ाई कर्मी शराब पीते हैं. इनमें से कई लोगों पर शराब के नशे में अपनी बीवी और बच्चों को मारने-पीटने के भी आरोप अक्सर लगते रहते हैं

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