अगवा चार पुलिसकर्मियों के शव मिले

छत्तीसगढ़, पुलिस
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले में माओवादियों द्वारा अगवा किए गए पुलिस के चार सहायक आरक्षकों के शव मिले हैं. माओवादियों ने इन हत्याओं की ज़िम्मेदारी ली है.

जिले के आरक्षी अधीक्षक केएल ध्रुव ने बीबीसी को बताया, "हमें बुधवार सुबह ही कुटरु मुख्य मार्ग पर अपने चारों सहायक आरक्षकों के शव मिले हैं, जिनका माओवादियों ने अपहरण किया था. शवों को कब्जे में लेकर आगे की कार्रवाई की जा रही है."

सीपीआई माओवादी की नेशनलपार्क एरिया कमेटी ने एक पर्चे में कहा है कि नक्सली विरोधी अभियान में बढ़-चढ़ कर भाग लेने के कारण इन्हें मौत की सज़ा दी गई है.

घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा ने कहा है, "यह माओवादियों की हताशा का परिणाम है कि वे स्थानीय आदिवासी पुलिसकर्मियों को निशाना बना रहे हैं. उनका अस्तित्व जल्दी ही छत्तीसगढ़ से खत्म हो जाएगा."

इन सहायक आरक्षकों का सोमवार को अपहरण हुआ था.

कार्रवाई होगी तेज़

माओवादी का पर्चा
इमेज कैप्शन, हत्या के बाद चिपकाया गया माओवादियों का पर्चा.

सोमवार को बीज़ापुर ज़िले के बेदरे थाने में तैनात पुलिस के चार जवान कुटरु से बेदरे के लिए रवाना हुए थे. दो जवान एक यात्री बस में सवार थे, जबकि दो अपनी मोटरसाइकिल से रवाना हुए थे.

बीच जंगल में माओवादियों ने बस को रोका और दोनों जवानों को अपने साथ ले गए. इसके बाद मोटरसाइकिल से आ रहे पुलिस जवानों का भी हथियारबंद माओवादियों ने अपहरण कर लिया.

राज्य के पुलिस उप महानिदेशक (नक्सल ऑपरेशन) आरके विज ने कहा, "हम माओवादियों के खिलाफ अपना ऑपरेशन और आक्रामक तरीक़े से चलाएंगे."

जून 2005 में कुटरु गांव से ही माओवादियों के खिलाफ हथियारबंद अभियान शुरु हुआ था. बाद में सरकार के संरक्षण में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम के नाम से इस अभियान की अगुआई की.

इस अभियान में नौजवानों को एसपीओ यानी स्पेशल पुलिस ऑफिसर का दर्जा दे कर उन्हें हथियार भी दिए गए.

सलवा जुडूम में शामिल ग्रामीणों और एसपीओ पर कई लोगों की हत्या, घरों की आगजनी और बलात्कार के मामले भी सामने आए.

5 जुलाई, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सलवा जुडूम की कड़ी आलोचना करते हुए इस पूरे अभियान को तत्काल प्रभाव से बंद करने का आदेश जारी किया.

दोबारा भर्ती

माओवादी

पुलिस ने जिन एसपीओ को हथियार दिए थे, उनमें से अधिकांश को सहायक आरक्षकों के रूप में पुलिस विभाग में भर्ती कर लिया गया.

इसके अलावा आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को भी सहायक आरक्षक के तौर पर पुलिस विभाग में नौकरी दी गई. बस्तर में ऐसे सहायक आरक्षकों की संख्या दो हज़ार से अधिक है.

इन सहायक आरक्षकों के कारण पुलिस और अर्धसैनिक बलों को माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाने में काफी सुविधा होती है.

यही कारण है कि माओवादियों के निशाने पर सबसे अधिक सहायक आरक्षक ही हैं.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>