भारत का पहला 'खुले में शौच' मुक्त ज़िला

फ़िरोज़ा बीबी
    • Author, उमरा जमाली
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

फ़िरोज़ा बीवी को अक्सर शाम होने का इंतज़ार रहा करता था ताकि अंधेरा हो और वो शौच को जा सकें.

लेकिन अब पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले के गाँव माझेरपाड़ा की फ़िरोज़ा के जीवन के उस पहलू में बदलाव आ गया है - वह जब चाहें, अपने घर में बने पक्के शौचालय का इस्तेमाल करती हैं.

वह कहती हैं, “हम औरतों को खुले में शौच की परेशानियां तो बहुत थीं. चाहे जितनी तकलीफ हो, भोर या शाम से पहले फ़ारिग़ होने नहीं जा सकते थे और कभी पेट ख़राब हो और दिन में भी जाना पड़े तो शर्मिंदगी होती थी."

यूनिसेफ़ से मिला प्रमाण

स्कूली बच्चों के साथ ममता बनर्जी

फ़िरोज़ा बताती हैं, “घर के मर्दों को तो कोई दिक्क़त नहीं थी, इसलिए कभी परिवार में शौचालय बनवाने की बात उठी ही नहीं, बल्कि हम भी आदी हो चुके थे."

"डेढ़ साल पहले हमारे गांव के सारे घरों में पंचायत ने शौचालय बनवाए और धीरे-धीरे हमने बाहर शौच करना बंद कर दिया."

बीते 30 अप्रैल को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नदिया को देश का पहला खुले में शौच मुक्त ज़िला घोषित किया.

यूनिसेफ और वर्ल्ड बैंक ने इसको प्रमाणित भी किया है.

'शोबार शौचागर'

मानव शृंखला
इमेज कैप्शन, बीते 21 फ़रवरी को नदिया के लोगों ने क़रीब 125 किलोमीटर की मानव शृंखला बनाकर जागरूकता का संदेश दिया.

अक्टूबर 2013 को शुरू हुई जिला प्रशासन की 'शोबार शौचागर' (सबके लिए शौचालय) मुहिम के तहत नदिया के शहरी और ग्रामीण इलाकों में 3,55,000 शौचालय बनवाए गए.

मार्च 2015 तक प्रशासन सभी घरों में शौचालय की सुविधा देने में कामयाब हुआ.

यूनिसेफ़ और वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइज़ेशन के अनुसार, भारत की लगभग आधी आबादी खुले में शौच करती है.

पोलियो का ख़तरा

साबार शौचागर
इमेज कैप्शन, 'साबार शौचागर' अभियान के तहत 13 दिसम्बर 2014 में सभी धर्मों के लोगों ने रैली निकाली.

पश्चिम बंगाल में यूनिसेफ़ के कम्युनिकेशन फ़ॉर डेवलपमेंट स्पेशलिस्ट नसीर अतीक़ कहते हैं, “खुले में शौच पोलियो का सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि पोलियो का वायरस मल में ही पाया जाता है".

उनके अनुसार, "अगर पोलियो को जड़ से मिटाना है तो खुले में शौच की प्रथा को ख़त्म करना होगा."

52 लाख की आबादी वाले नदिया जिले में जहां 2011-12 में 30 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते थे, आज शत प्रतिशत आबादी शौचालयों का इस्तेमाल करती है.

'आसान नहीं था'

नदिया के मजिस्ट्रेट
इमेज कैप्शन, नदिया के मजिस्ट्रेट पीबी सलीम.

नदिया के जिलाधिकारी पीबी सलीम कहते हैं, "यह इतना आसान नहीं था."

उनके अनुसार, "शौचालय की सुविधा के बावजूद बहुत लोग बाहर ही शौच करते थे और सदियों पुराने संस्कार बदलने के लिए हमने चौतरफ़ा वार किए."

वह बताते हैं, "जहां एक तरफ स्कूलों में हर सोमवार को बच्चों को खुले में शौच न करने की शपथ दिलवायी, वहीं हमें डॉक्टरों का भी भरपूर सहयोग मिला जो अपने पर्चे में सबसे ऊपर खुले में शौच बंद करने की सलाह लिखते थे. छोटे बच्चों की मांओ पर इसका ज़बरदस्त असर होता था."

सार्वजनिक शौचालय
इमेज कैप्शन, नदिया ज़िले के मुख्यालय कृष्णानगर में प्रशासन द्वारा बनवाया गया सार्वजनिक टॉयलेट.

सलीम ने बताया, "लेकिन सबसे ज़्यादा असरदार थी एक पहल, जिसके तहत हमने ऐलान किया कि जो लोग खुले में शौच से बाज़ नहीं आएंगे उनकी तस्वीर एक ऊंची दीवार पर लगाई जाएगी जिसे सब गांव वाले देखेंगे और उनका मजाक उड़ाएंगे."

फ़िरोज़ा हंसते हुए कहती हैं, "शर्मिंदगी से बचने के लिए ही तो अंधेरे में शौच करते थे, दिनभर तक़लीफ बर्दाश्त करते थे और अब अगर दीवार पर तस्वीर और नाम आ जाता तो शर्म से मर ही जाते."

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