अनजानी स्मृतियों का अजायबघर

चित्रकार मनीष पुष्कले
    • Author, प्रीति मान
    • पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

हर कला की अपनी भाषा होती है, दिल्ली की 'आकार प्रकार' कला दीर्घा में हाल ही में मनीष पुष्कले की पेंटिंग प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ.

'म्यूजियम ऑफ़ अननोन मेमोरीज़' यानी अनजानी स्मृतियों का अजायबघर के नाम से यह अमूर्त चित्र प्रदर्शनी अपनी ऊर्जावान उपस्थिति का अहसास कराती है.

मनीष पुष्कले के अनुसार यह प्रदर्शनी वास्तविकता के बारे में नहीं है, यह अहसास और अहसास के आगमन के बारे में है.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

मनीष यूँ तो भोपाल के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले बीस वर्षों से दिल्ली में ही रह रहे हैं. उनकी कई एकल और सामूहिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियां लग चुकी हैं.

मनीष भू-विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं. वो कहते हैं कि इससे उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला. एक बार जब वे संगमरमर स्लाइड देख रहे थे, तो यह देख कर हैरान रह गए कि तल में बारीक काले तंतु नजर आ रहे थे, पर पत्थर तो सफ़ेद था.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

यहीं से उन्हें अहसास हुआ कि प्रकृति में जो दिखता है, उसके अलावा भी कुछ अनदेखा रह जाता है.

प्रकृति के केंद्र में, नब्ज़ में जो दिख रहा है उसकी सतह पर वह कभी नहीं दिखता. उनके अनुसार, वो इसी अनदेखे को चित्रित करने का प्रयास करते हैं.

पुष्कले कहते हैं, "चित्रकला को दृश्यकला भी कहा जाता है. देखना और दिखाना इसके प्राथमिक शब्द हैं, किसी चित्र को देखे बिना आप उसे महसूस नहीं कर सकते, उसका अनुभव नहीं ले सकते. मैं चित्र का अनुभव उसे बनाते हुए लेता हूँ."

पर साथ ही वे यह चिंता भी जताते हैं कि अब लोग देखना भूलने लगे हैं.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

एक अमूर्त चित्र के सामने आते ही दर्शक का पहला प्रश्न होता है, यह क्या है? इसका अर्थ क्या है? वो उसमें आकार खोजने की कोशिश करने लगता है.

पुष्कले के अनुसार जिस तरह हम सुगंध और दुर्गन्ध का भेद किसी को समझाए बिना कर लेते हैं. संगीत और शोर में फर्क कर लेते हैं. ठीक उसी तरह कला और अ-कला का भेद कर पाने में असक्षम क्यूं होते हैं?

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

मनीष ने 'सफेद साखी' नाम से एक पुस्तक भी लिखी है. किताब चित्रकार की ऐसी मनोदशा पर आधारित है जिसमें कलाकार चित्र को देखता और उसे बनाता है.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

दर्शक जब अमूर्त चित्र के सामने खड़ा होता है, तब वह उस चित्र के साथ एक नया संबंध बना रहा होता है.

अमूर्त चित्र के रंग, भाव और लय दर्शक से एक सवांद करते हैं. तब चित्र की व्याख्या हर दर्शक की नजरों में अलग होती है.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

मनीष कहते हैं, "मैं बिना किसी संज्ञा और किसी उदाहरण के बिना कहानी और कथन के चित्र बनाने की कोशिश करता हूँ. इससे लोगों को विस्मय होता है; यह प्रदर्शनी उसी विस्मय का बखान है."

मनीष चित्रों के शीर्षक देने से बचते हैं.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

प्रदर्शनी दो हिस्सों में बंटी है, एक हिस्से में तेल रंग और दूसरे हिस्से में जल रंगों से बने चित्रों को रखा गया है. ये जल रंग के चित्र विभिन्न जगहों से लाए गए पानी से बनाए गए हैं.

मनीष ने पिछले बीस सालों में देश-विदेश के अलग-अलग समंदरों, नदियों, झीलों, गुफाओं और जंगलों से पानी संग्रहित किया है. उन्होंने विभिन्न हिस्सों में 242 जगहों का पानी एकत्रित किया है.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

इनमें 38 गुफाओं और कई झीलों का पानी भी शामिल है. साथ ही मिस्र की नील, जॉर्डन नदी, मिसिसिपी, लुव्रे, सीन, गंगा, नर्मदा, यमुना, कावेरी व कई अन्य नदियां शामिल है.

अमूर्त चित्र दर्शक को स्वतंत्रता देते हैं वे उन्हें बांधते नहीं हैं. एक चित्रकार के लिए यह अति आवश्यक है की वह निरंतर रचनाशील रहे.

मनीष पुष्कले की पेंटिंग

वह कला के लिए अनुशासन को अनिवार्य मानते हैं. उनका कहना है, किसी भी कलाकार के लिए यह अति आवश्यक है, कि वह बिना किसी भय या आशंका के अपनी रचनाशीलता के लिए प्रतिबद्ध रहे.

यह प्रदर्शनी 6 जून 2015 तक हौज खास विलेज में 'आकार प्रकार' आर्ट गैलरी में देखी जा सकती है.

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