'ये लब खोलने की आज़ादी पर हमला है'

दिल्ली एयरपोर्ट
    • Author, सिद्धार्थ वरदराजन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
  • प्रकाशित

दिल्ली एयरपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस की एक कार्यकर्ता को रोके जाने की घटना नागरिकों की आज़ादी पर खुल्लमखुल्ला हमला है.

तब ग्रीनपीस की कार्यकर्ता लंदन की उड़ान पकड़ने ही जा रही थीं. यह एक तरह से सरकार की तरफ से युद्ध की घोषणा भी लगती है, ख़ासकर असहमति की आवाज़ों के ख़िलाफ़.

विदेश यात्रा करना किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है. मेनका गांधी मामले से जुड़े ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट किया था कि यह किसी नागरिक की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत ही आता है.

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सुप्रीम कोर्ट, भारत

कोर्ट ने माना था कि बिना इसके एक नागरिक आज़ादी के अपने अधिकार का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सकता है. और अभिव्यक्ति की आज़ादी के उसके अधिकार का क्या होगा जब सरकार ये कहे कि वह कहां, किसको अपनी बात कहे.

ग्रीनपीस की युवा कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई मध्य प्रदेश- छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती कोयला ख़नन वाले इलाके 'महान' में एक ब्रितानी बहुराष्ट्रीय कंपनी की गतिविधियों के बारे में ब्रिटेन के सांसदों को बताने जा रही थीं.

यहां इस बात का कोई मतलब नहीं है कि उस कंपनी (एस्सार पावर) के बारे में प्रिया की राय सही है या नहीं. उन्हें भारत सरकार के साथ पर्यावरण का हो रहे नुक़सान का मुद्दा उठाने का हक़ है.

भारतीय कानून

भारत

वे इस सवाल पर ब्रितानी सांसदों से भी बात करने के लिए और उन्हें न्यौता देने के लिए भी आज़ाद हैं क्योंकि उन्हें शक है कि ब्रितानी कंपनी ने संभवतः कंपनियों के काम काज के तौर तरीकों से जुड़े ब्रिटेन के नियम कानून तोड़े हैं.

संक्षेप में कहें तो 'महान' इलाके में कोयला खनन पर प्रिया पिल्लई की पैरोकारी ने किसी भारतीय कानून को नहीं तोड़ा है, चाहे उन्होंने कुछ कहा हो या फिर लिखा हो.

उन्हें विदेश जाने से क्यों रोका गया, यह एक रहस्य ही है क्योंकि न तो गृह मंत्रालय की ओर से ही और न इंटेलीजेंस ब्यूरो की तरफ से आधिकारिक तौर पर कोई एक भी कारण बताने के लिए तैयार था.

आधिकारिक बचाव

भारत, कानून का शासन

गृह मंत्रालय एयरपोर्ट के आप्रवासन विभाग को नियंत्रित करता है और इंटेलीजेंस ब्यूरो के बारे में माना जाता है कि उसने प्रिया पिल्लई के खिलाफ 'लुक आउट सर्कुलर' जारी किया होगा.

हक़ीकत तो ये है कि हफ्ते से ज्यादा अरसा बीत चुका है और प्रिया पिल्लई को रोके जाने के फ़ैसले का कोई आधिकारिक बचाव नहीं किया गया है. इससे ये अंदेशा होता है कि उन्हें बदनियती से बिना किसी कानूनी आधार के रोका गया था.

एक सरकार को इस मामले में सत्ता का बेज़ा इस्तेमाल करने दिया जाता है तो यह लगभग तय है कि यह फिर होगा और बार बार होगा.

बड़े कारोबारी

भारत में कोयला खनन

यही वजह है कि भारत में लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और कानून के शासन को लेकर उठ रही चिंता भरी आवाज़ों को ये मांग करनी चाहिए कि सरकार इस मसले पर अपना पक्ष साफ करे.

कॉरपोरेट भारत को भी अपनी आवाज़ उठानी चाहिए. बड़े कारोबारी मुमकिन है कि ग्रीनपीस इंडिया की आलोचना करें और पर्यावरणवादियों को 'विकास विरोधी' करार दें.

लेकिन तब क्या हो सकता है अगर कानून का उल्लंघन और कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया जाना रवायत बन जाए.

आरबीआई को निर्देश

रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया

प्रिया पिल्लई के पास एक वैध पासपोर्ट था, वीज़ा और एयर टिकट थे.

ये टिकट ग्रीनपीस इंटरनेशनल ने खरीदे थे और आईबी के किसी कमअक्ल अधिकारी ने, यकीनन अपनी पहचान छुपाकर, इस आधार पर ये दावा किया कि यह फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट या एफ़सीआरए का उल्लंघन किया था. जो सच नहीं है.

व्यापक तौर पर कहें तो एफ़सीआरए दो तरह की गतिविधियों पर लागू होता है. पहला विदेशी पैसा लेने पर और दूसरा भारत में व्यक्तियों अथवा संगठनों का विदेशी मेहमानवाजी लेने पर.

पिछले साल सरकार ने रिज़र्व बैंक को ये आदेश दिया कि बिना मंजूरी लिए ग्रीनपीस की ओर से भारत भेजी गई रकम को रिलीज़ न किया जाए. कानून के अनुसार हवाई टिकट विदेशी मेहमान नवाजी के अंतर्गत आता है.

सरकार की मंजूरी

ग्रीनपीस, विरोध प्रदर्शन

हालांकि एफ़सीआरए के तहत केवल लोक सेवकों, चुने हुए जनप्रतिनिधियों और जजों जैसे सरकारी अधिकारियों पर इस तरह की मेहमाननवाजी लेने से पहले सरकार की मंजूरी की शर्त है. यह प्रावधान सामान्य नागरिकों पर लागू नहीं होता है.

बेशक विशेष परिस्थितियों में ये प्रावधान व्यक्तियों और संगठनों के दूसरे वर्ग के लिए भी लागू किए जा सकते हैं लेकिन या तो सरकार ने अभी तक ऐसा नहीं किया है और या फिर इससे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों और संगठनों को ये बताया है कि उन्हें हवाई टिकट स्वीकार करने से पहले इसकी आधिकारिक इज़ाजत लेनी होगी.

राजनीतिक वजह?

ग्रीनपीस, धनराय पंचायत

यहां तक कि अगर हवाई टिकट विदेश से खरीदना अपराध माना जाता है तो सरकार की तरफ से वाजिब कार्रवाई ये होनी चाहिए थी कि वह संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत प्रिया पिल्लई के ख़िलाफ़ क़दम उठाती.

चूंकि उनके ख़िलाफ़ कोई अभियोग नहीं लगाया गया है और न ही ग्रीनपीस को विदेशी मेहमान नवाजी स्वीकार करने से संबंधित प्रावधानों की वस्तुस्थिति में आए किसी बदलाव के बारे में सूचित नहीं किया गया है तो यह मानने में कोई गुरेज नहीं है कि प्रिया को रोके जाने का फ़ैसला पूरी तरह से राजनीतिक वजहों से लिया गया था.

भारत में लोकतंत्र

ग्रीनपीस, धनराय पंचायत

और अगर ऐसा है तो यह बहुत ख़तरनाक है. आज अगर आईबी ये तय करती है कि वह किसी नागरिक को विदेश जाने की इज़ाजत नहीं देगी क्योंकि उसकी किसी बात से भारत की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय हितों को नुक़सान पहुंच सकता है.

तो मुमकिन है कि कल यह एजेंसी विदेशों में होने वाले अकादमिक सम्मेलनों में या फिर अख़बारों में भारतीयों को अपने विचार रखने से रोक सकती है.

अगला क़दम ये हो सकता है कि भारत में ही ऐसे विचारों को आपराधिक करार दिया जा सकता है. क्या भारत में लोकतंत्र इस हद तक कमजोर हो रहा है?

घरेलू मोर्चे पर

ग्रीनपीस, धनराय पंचायत

क्या इंटेलीजेंस विभाग के अफसर भाषणों और लेखों को खंगाल कर ये पता कर रहे हैं कि कौन 'विकास विरोधी' हैं और इसलिए वे 'राष्ट्र विरोधी' हैं?

चूंकि मोदी सरकार और उनके समर्थक घरेलू मोर्चे पर होने वाली किसी तरह की मुखालफत में विदेशी हाथ होने की बात कहते रहे हैं तो किसी को ये भी कहना चाहिए कि अगर भारतीय कंपनियों को विदेश जाकर भारत में अपने कारोबार के लिए सहयोगी तलाशने और इसके लिए कोशिशें करने की आजादी है तो कर्मचारी संगठनों, सामाजिक और पर्यावरण मुद्दों पर काम करने वाले लोगों और महिलाओं और आदिवासियों के संगठनों के ऐसा ही करने पर इतनी हाय तौबा क्यों?

(सिद्धार्थ वरदराजन शिव नाडर यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर पब्लिक अफ़ेयर्स एंड क्रिटिकल थिअरी में सीनियर फ़ेलो हैं.)

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