जिन्होंने लिंग और जाति की बैंड बजा दी

पटना, बिहार में महिलाओं का बैंड
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार की राजधानी पटना से सटे दानापुर के एक गाँव में महादलित समुदाय की महिलाओं ने बनाया है अपना म्यूज़िकल बैंड.

इन 12 महिलाओं ने समाज और परिवार के कड़े विरोध के बावजूद संगीत की तालीम ली और बनाया 'नारी गुंजन सरगम म्यूज़िकल बैंड'.

संगीत से रंगी ज़िंदगी अब पहले से बेहतर है और आमदनी भी बढ़ी है.

पढ़ें, रिपोर्ट विस्तार से

पटना, बिहार, महिला बैंड

साठ साल की सावित्री देवी 'नई–नवेली' बैंडमास्टर हैं. खेत मजदूर सावित्री काले अक्षर नहीं पहचानती, लेकिन ड्रम पर बजने वाली धुन झट से पकड़ लेती हैं.

वो उस म्यूज़िकल बैंड का हिस्सा है जिसमें उनके जैसी ही अनपढ़ और खेत मजदूर महिलाएं शामिल हैं.

पटना से सटे दानापुर के ढीबरा गांव की 12 महादलित औरतों ने अपना म्यूज़िकल बैंड तैयार किया है.

लेकिन इन महादलित महिलाओं का म्यूज़िकल बैंड बनाने का सफर आसान नहीं था. विरोध ना सिर्फ गांव के मर्दों बल्कि औरतों की तरफ से भी हुआ.

सावित्री बताती हैं, "जब ड्रम सीखने की बात हुई तो टोले की जवान औरतों ने ही ताना मारा कि हमारे बीच में बूढ़ी औरत क्या करेगी. लेकिन हम सीख लिए और अब सबसे आगे रहते हैं."

पति का विरोध

पटना, बिहार, महिला बैंड

बैंड की सदस्य 25 साल की छठिया देवी के पति ने बैंड पार्टी में शामिल होने पर उन्हें बहुत पीटा.

छठिया बताती हैं, "वो कहते थे कि खाली नगाड़ा पीटने से पेट भर जाएगा? लेकिन हमने ड्रम बजाना सीखा और जब पहली बार ड्रम बजाने पर 500 रुपए मिले तो जाकर पति को दे दिया."

आलम ये था कि इन महिलाओं के ट्रेनर आदित्य गुंजन को कई बार धमकियां मिलीं.

बकौल आदित्य, "कई बार ये डर लगता था कि कहीं किसी महिला का पति आकर मेरे साथ गलत व्यवहार ना करे."

शुरुआत और प्रशिक्षण

पटना, बिहार, महिला बैंड

इन महिलाओं की बेरंग जिंदगी में संगीत का ये रंग भरने की कोशिश अगस्त 2013 में शुरू हुई.

महादलितों के बीच काम कर रही पद्मश्री सुधा वर्गीज ने ढीबरा गांव की खेत मजदूर औरतों को ड्रम बजाने की ट्रेनिंग दिलवाना शुरू किया.

सुधा खेत मजदूरी करने वाली इन औरतों को रोजगार के दूसरे अवसर भी मुहैया करवाना चाहती थी.

ट्रेनिंग के लिए 16 औरतों का चयन हुआ और बाद में इनमें से 12 का चयन करके म्यूज़िकल बैंड तैयार किया गया.

बैंड का हिस्सा बनी सविता देवी बताती हैं, "रोज एक घंटे तक ट्रेनिंग करते थे, छह महीनों तक सब कुछ गड़बड़-सड़बड़ होता रहा, लेकिन उसके बाद हमने धुन पकड़ना शुरू किया."

एक वक़्त में दो काम

सावित्री देवी, पटना, बिहार, महिला बैंड
इमेज कैप्शन, बैंड की सदस्य सावित्री देवी.

चूंकि ये औरतें खेत मजदूरी करती थी, इसलिए एक वक्त में इन्हें एक साथ इकट्ठा करना भी मुश्किल था.

40 वर्षीय लालती बताती हैं, "खेत में काम करने के दौरान ड्रम के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल था. कई बार खेत मालिक से झगड़ा भी हो गया. अभी भी मालिक कहते हैं कि ये लोग अब ड्रम ही पीटेगी, खेत गया भाड़ में."

दरअसल, खेत मजदूरी करके जहां इन महिलाओं को 100 रुपए मजदूरी के तौर पर मिलते हैं, वहीं बैंड का हिस्सा बनकर 500 रुपए.

बैंड का ये अर्थशास्त्र इस महादलित टोले में नया बवाल भी खड़ा कर रहा है. जैसा कि मानती देवी बताती हैं, "टोले की औरतें जो बैंड में छांट दी गई हैं वो बहुत तानें मारती हैं."

हिस्सा न बन पाने की तड़प

पटना, बिहार, महिला बैंड, मनोकामना देवी
इमेज कैप्शन, मनोकामना देवी को बैंड का हिस्सा न बन पाने का मलाल है.

मनोकामना देवी भी उन महिलाओं में से एक हैं जो बैंड का हिस्सा नहीं बन सकीं.

बैंड का हिस्सा ना बन पाने की उनकी तड़प का अंदाजा आप उनके इस तर्क से लगा सकते हैं, "एक बार परीक्षा में फेल हो जाएगा, तो क्या दोबारा परीक्षा नहीं ली जाएगी. थोड़ा डांस (कदमताल) करने में ही गड़बड़ा गए थे ना."

सुकून देने वाली बात ये है कि ड्रम पर जिस ताकत के साथ इन महिलाओं की ड्रमस्टिक चलती है, उससे दोगुनी ताकत से वे गांव भर की औरतों के हक़ की आवाज बुलंद करती हैं.

35 साल की बेदामी देवी बताती है, "रात में भी अगर कोई आदमी औरत को पीटता है तो हमारी बैंड पार्टी उसके यहां धावा बोल देती है और जरूरत पड़ने पर उसको पीटने से भी नहीं हिचकती."

बढ़ता आत्मविश्वास

सुधा वर्गीज
इमेज कैप्शन, सुधा वर्गीज ने इस बैंड को बनाने में मदद की.

25 से 60 साल की उम्र की महिलाओं के इस म्यूज़िकल बैंड ने बिहार के मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से लेकर पटना शहर के आलीशान होटलों और शिक्षण संस्थानों में अपनी प्रस्तुति दी है.

इससे जहां इन औरतों का आत्मविश्वास बढ़ा है, वहीं अपना जीवन स्तर सुधारने की ललक भी बढ़ी है. बैंड से होने वाली आमदनी से नई साड़ी, चप्पल लेने की ख्वाहिश से लेकर बात शिक्षा तक जा पहुंची है.

मसलन, पटना वीमेंस कॉलेज में जब अनीता प्रस्तुति देने गईं तो सबसे पहले उनके मन में यही बात उठी कि उनकी बेटी भी यहीं पढ़े.

इस बैंड को तैयार करने वाली सुधा वर्गीज, अब एक ऐसा ही दूसरा म्यूज़िकल बैंड तैयार करना चाहती हैं. साथ ही वो इस बैंड में दूसरे पारंपरिक वाद्ययंत्रों को भी शामिल करना चाहती हैं ताकि इन दलित औरतों की तरह उनमें भी नई जान फूंकी जा सके.

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