झारखंड: 'भाजपा जीती पर मोदी लहर के बल पर नहीं'

नरेंद्र मोदी
    • Author, प्रोफ़ेसर संजय कुमार
    • पदनाम, सीएसडीएस, बीबीसी हिंदी डॉटकाम के लिए
  • प्रकाशित

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी और ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) को 42 सीटें हासिल हुई हैं. दोनों दल आपस में मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार करने में सफल रहे.

लेकिन इस चुनाव में एक बार फिर मतदाता किसी एक पार्टी के पक्ष में पूर्ण बहुमत देने में असफल रहे.

<link type="page"><caption> झारखंड में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/12/141223_jharkhand_jammu_election_result_sk" platform="highweb"/></link>

भाजपा 73 सीटों पर लड़ी थी और 37 सीटें जीतने में कामयाब रही. जबकि सहयोगी दल आजसू आठ सीटों पर लड़ी और पांच सीटें मिलीं.

पढ़ें पूरा विश्लेषण

हेमंत सोरेन

झारखंड बीते14 साल से राजनीतिक अस्थिरता से गुज़र रहा है, वहाँ कई सरकारें और मुख्यमंत्री आए-गए.. उसे अब निश्चित रूप से पहले के मुक़ाबले स्थिर सरकार मिलेगी.

लेकिन भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक रहा.

झारखंड मुक्ति मोर्चा 19 सीटें जीतकर सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरा, जबकि राजद और जदयू के साथ गठबंधन करने वाली कांग्रेस केवल छह सीटें ही जीत पाई.

स्थानीय मुद्दे जगह बना सकते थे, पर शायद सुशासन के राष्ट्रीय मुद्दे ने अधिकांश इलाक़ों में स्थानीय मुद्दों को पीछे धकेल दिया.

प्रदर्शन में फ़र्क

अर्जुन मुंडा

अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी, हेमंत सोरेन, शिबू सोरेन, सुदेश महतो और ऐसे अन्य नेताओं के बावजूद प्रादेशिक स्तर पर मज़बूत नेता की अनुपस्थिति ने भाजपा को मोदी के नाम पर अतिरिक्त वोट जुटाने में मदद की.

हालांकि, झारखंड में मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व के कारण भाजपा को अतिरिक्त वोट मिले, पर मैं यह कहने से बचना चाहूंगा कि इसमें मोदी लहर का कोई हाथ है.

भाजपा ने 2009 के मुक़ाबले निश्चित तौर पर अपना प्रदर्शन सुधारा है. तब भाजपा को 20.2 प्रतिशत वोट और 18 सीटें मिली थीं.

इस बार भाजपा को 31.3 प्रतिशत वोट मिले यानी 11.1 प्रतिशत का लाभ हुआ, पर वह केवल 37 सीटें ही जीत सकी.

झारखंड
इमेज कैप्शन, लोकसभा चुनावों में 56 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को बढ़त हासिल थी.

लोकसभा चुनाव में पार्टी का जैसा प्रदर्शन था, भाजपा वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई.

तब भाजपा के पक्ष में 39.9 प्रतिशत वोट पड़े थे और 56 विधानसभा क्षेत्रों में वह सबसे आगे थी.

भाजपा को यह बढ़त कांग्रेस की गिरावट के कारण हासिल हुई है. पिछले विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले कांग्रेस को छह प्रतिशत वोटों और आठ सीटों का नुक़सान हुआ है.

झामुमो संभली

हेमंत सोरेन

झामुमो हार गई है, फिर भी 20 प्रतिशत वोटों के साथ एक सम्मानजनक विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी है.

यहां अहम यह है कि आम चुनावों में पराजय के बाद झामुमो संभलने में सफल रही है.

तब पार्टी को केवल 9.2 प्रतिशत वोट मिले थे और केवल नौ विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त हासिल थी.

आजसू नेता सुदेश महतो
इमेज कैप्शन, भाजपा के सहयोगी दल ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) को पांच सीटें मिलीं.

दक्षिणी झारखंड और संथाल परगना जैसे इलाक़ों में झामुमो आदिवासी मतदाताओं को रिझाने में कामयाब रही. दक्षिणी झारखंड में विधानसभा की 29 सीटें हैं.

दोनों जगह आदिवासी मतदाता क्रमशः 47 और 30 प्रतिशत हैं.

यह सच है कि हेमंत सोरेन की कांग्रेस-झामुमो सरकार ने अपने पिछले डेढ़ साल के कार्यकाल में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया.

मगर यह भी सच है कि सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ़ मतदाताओं में मुश्किल से ही कोई सत्ताविरोधी लहर थी.

विकास

शायद जनता ने कुछ छूट दी हो क्योंकि किसी सरकार के लिए कामकाज में बदलाव लाने का यह काफ़ी कम समय है.

हां, जनता में कई जनप्रतिनिधियों के प्रति ज़रूर नाराज़गी थी और अधिकांश पूर्व मुख्यमंत्रियों के हारने का यही कारण था.

वैसे सत्ताधारी गठबंधन के ख़िलाफ़ जो चीज गई है, वो है- भाजपा के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं का रुझान और मोदी और उनके वादों का आकर्षण.

राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय मुद्दों पर हावी दिखे. बड़ी तादाद में मतदाताओं के लिए विकास और नौकरी के अवसर ही मुख्य मुद्दे थे और भाजपा की ओर रुझान भी विकास के वादे के कारण ही हुआ.

रणनीति

भाजपा का आक्रामक चुनावी प्रचार और विकास के लिए राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार की ज़रूरत पर जोर देने की रणनीति ने बखूबी काम किया.

नरेंद्र मोदी, रघुबर दास

झारखंड में बहुत से मतदाता अस्थिर सरकारों से ऊब गए थे. लगता है इस बात को ध्यान में रखकर उन्होंने भाजपा के पक्ष में मतदान किया.

यह तय है कि झामुमो, कांग्रेस, राजद और जदयू का गठबंधन भाजपा के लिए गंभीर ख़तरा बन सकता था और झाविमो के भी शामिल होने से जो महागठबंधन बनता वह भाजपा की संभावनाओं को खत्म कर सकता था.

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