उबेर का ई-कॉमर्स पर असर होगा?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

विशेषज्ञ कहते हैं कि उबर टैक्सी मामले के बावजूद ई कॉमर्स कारोबार भारत में मौजूदा रफ़्तार से लगातार बढ़ता रहेगा.

मगर इसके लिए मौजूदा क़ानूनों में सुधार और बदलाव की ज़रूरत है.

पढ़ें उबर के बाद ई-कॉमर्स पर रिपोर्ट

एग्रीगेटर कारोबार भारत में केवल टैक्सी तक सीमित नहीं बल्कि तक़रीबन हर चीज़ से जुड़ा है- इलेक्ट्रॉनिक सामान से तकनीकी उत्पाद तक और हेल्थकेयर, दवाओं और किराने के सामान तक. डिजिटल बाज़ार तक़रीबन हर उस चीज़ को अपने में समेटे है, जो पारंपरिक बाज़ार से जुड़ा है, यहां तक कि सब्ज़ियां और फल भी.

मगर ई-कॉमर्स कारोबार के निवेशक, वकील और दूसरे विशेषज्ञ मानते हैं कि क़ानूनों में बदलाव ज़रूरी है या कम से कम ताज़ा अधिनियम लाना होगा ताकि वह डिजिटल बाज़ार में तकनीक में बदलाव के साथ चल सकें और सरकार की ओर से ‘बगैर सोचे’ आने वाली प्रतिक्रिया से बच सकें.

क़रीब 20 ई-कॉमर्स कंपनियां चलाने वाले निवेशक कृष्णन गणेश ने बीबीसी को बताया, ''हम अधिनियम में स्पष्टता चाहते हैं. हम ज़्यादा अधिनियम नहीं चाहते. हमें नए बिज़नेस मॉडलों की रोशनी में अपने अधिनियम बदलने की ज़रूरत है. मैं नहीं समझता कि इससे बिज़नेस चला जाएगा. यह ऐसी सुनामी है जिसे आप रोक नहीं सकते.''

राजेश जैन समर्थित नीति सेंट्रल के सीईओ और इन्फ़ोसिस के पूर्व प्रोडक्ट डिवीज़न हेड शशि शेखर कहते हैं, ''छोटी अवधि में गड़बड़ी होगी. लंबी अवधि में सरकार को पता है कि नागरिक पहले ही ऑनलाइन बाज़ार का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें इसके मुताबिक़ क़दम उठाने होंगे. क़ानून को बदलने की ज़रूरत है.''

निवेशकों को भरोसा चाहिए

मगर एक कॉर्पोरेट वकील का कहना है कि उबर हादसे के बाद अब विदेशी निवेशक भारत की ओर दूसरी नज़रों से देखेंगे.

ई-कॉमर्स कंपनियों को क़ानूनी सलाह देने वाली कंपनी इंडसलॉ के भागीदार कार्तिक गणपति के मुताबिक़, ''विदेशी निवेशक पहले माहौल देखेंगे. यह कारोबार के अनुकूल होना चाहिए. वरना सभी चीज़ें उलझ जाएंगी.''

गणपति कहते हैं, ''निवेशक साफ़ उसूल चाहते हैं. क्या क़ानून है और क्या उसूल हैं. वो एकरूपता चाहते हैं. साथ ही यह कि किसी मामले में क्या क़ानून होगा. स्पष्टता, एकरूपता के साथ ही वो नतीजा भी देखते हैं. एक बार उसूल तय हो गए, तो यह साफ़ हो जाता है. मिसाल के लिए अगर टैक्स अदा करना है, तो कितना और कब देना है. निवेशक देखता है कि कभी यह साफ़ नहीं रहता कि अदा करना भी है या नहीं.''

वह कहते हैं, ''सब इंतज़ार करेंगे और देखेंगे कि मौजूदा क़ानूनों के तहत सरकार ई-कॉमर्स से कैसे तालमेल बैठाती है.''

सरकारी प्रतिक्रिया

मगर सभी एकराय हैं कि सरकार ‘बगैर सोचे’ प्रतिक्रिया नहीं दे सकती, जैसा उसने बलात्कार कांड के बाद उबर सेवा पर प्रतिबंध लगाकर किया.

शेखर के मुताबिक़, ''भारत में बदलाव नीचे से हो रहा है. ऐसे क़ानून नहीं हैं जो बताएं कि निचले स्तर पर लोगों को तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए. जैसे बेंगलुरू पुलिस की ट्विटर अकाउंट्स के ज़रिए शिकायतें पाने और उनके तुरंत हल करने की पहल. देखिए, इसका कैसा फ़ायदा हो रहा है. या फिर सरकार की ओर से कर्नाटका मोबाइल वन की पहल, जिसके ज़रिए लोगों को कई सेवाएं दी जा रही हैं. इसका सिर्फ़ यही मतलब है कि सरकार को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा.''

वहीं गणेश कहते हैं, ''अगर साफ़ कहें तो भारत में चुनौती अमरीका से अलग नहीं है. एक सेवा के लिए भारत में कर अदा करें या अमरीका में. पंजीकरण का यही सवाल अमरीका के हर राज्य में उठा था, जब भारतीय शिक्षक अमरीका में छात्रों को ट्यूशन दे रहे थे.''

उनका कहना है, ''उबर घटना एक चेतावनी की तरह है. हमें फिर से ताज़ा नज़रिए के साथ देखना होगा क्योंकि यह मूलभूत चीज़ों से जुड़ा है लेकिन तकनीक पर आधारित है.''

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