नामदेव ढसाल: 'वह भारतीय कविता का आम्बेडकर था'

नामदेव ढसाल
    • Author, विष्णु खरे
    • पदनाम, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक
  • प्रकाशित

कहा जा सकता है कि नामदेव ढसाल आधुनिक भारतीय कविता का सर्वाधिक विवादास्पद हस्ताक्षर था– बांग्ला कविता ‘भूखी पीढ़ी’ के संस्थापक मलय रॉय चौधरी से भी कहीं अधिक.

मलय अंततः बांग्ला भद्रलोक से ही थे और एलेन गिन्सबर्ग की ‘बीट’ कविता से प्रेरित थे, जबकि <link type="page"><caption> नामदेव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/01/140115_namdeo_dhasal_no_more_pk.shtml" platform="highweb"/></link>, जो ‘’दैवयत्तम् तु कुलेजन्मम्’’ मराठा दलित ‘महार’ था, अमरीका के ‘दलित’ अश्वेतों के अधिक आक्रामक और मुखर ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रेरित था.

नामदेव के <link type="page"><caption> मुझ जैसे मित्रों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/01/140102_hindi_booklist_poet_rns.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए उसे ‘नाम्या’ के अलावा किसी और नाम से याद करना या पुकारना असंभव है.

मराठी में मित्रों के बीच एक-दूसरे को इस तरह के छोटे नाम और ‘तू-तकार’ की परम्परा है, भले आप कितने ही बुज़ुर्ग क्यों न हो जाएँ.

अत्यंत निर्धन और विपदाग्रस्त परिवार

मेरे और उसके सम्बन्ध, जो चंद्रकांत पाटील और दिलीप चित्रे के कारण 1970 के दशक में शुरू हुए, अब तक चले आए थे.

अभी चार-पाँच महीने पहले उसने मुम्बई में शब्द प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, चंद्रकांत पाटील द्वारा अनूदित मेरी हिंदी कविताओं के मराठी अनुवाद-संकलन का विमोचन किया था. किसी सार्वजनिक समारोह में उसकी यह अंतिम हिस्सेदारी थी.

नामदेव ढसाल

वह पहियाकुर्सी पर बहुत मुश्किल से आ सका था, भरोसा नहीं था कि आएगा भी या नहीं, लेकिन वह बोलने की हैरतअंगेज़ तैयारी कर के आया था और किसी तरह अंत तक बैठा रहा.

नाम्या एक अत्यंत निर्धन और विपदाग्रस्त परिवार से था और उसका जन्म भी मुंबई के बदनाम चकला-मोहल्ले ‘गोलपीठा’ में हुआ था इसलिए महानगर के कुरूपतम, भयावहतम अनुभव उसे होश संभालते ही हो चुके थे.

उसकी कविता की सारी जड़ें गोलपीठा में ही हैं इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उसके पहले संग्रह का शीर्षक वही है और उसकी सारी कविताएँ वहीं से हैं.

क्लासिक कवि

बाबासाहेब आम्बेडकर के व्यक्तित्व ने सारी दलित अस्मिता को बदल डाला था और हालाँकि यह ठीक-ठीक पता नहीं चलता है कि नाम्या को कविता <link type="page"><caption> लिखने की प्रेरणा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131117_omprakash_valmiki_manager_pandey_ap.shtml" platform="highweb"/></link> कहाँ से मिली और कौन-से मराठी-भारतीय-विदेशी कवि उसने पढ़ लिए थे लेकिन ‘गोलपीठा’ मराठी में हीरोशीमा-नागासाकी के विस्फोट की तरह नाज़िल हुआ और उसने मराठी कविता को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.

हिंदी में शायद मुक्तिबोध के ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ और रघुवीर सहाय के ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ को ही उसके समकक्ष रखा जा सकता है.

नामदेव की कविता ने, अपने महान पूर्वज नामदेव की तरह, मराठी कविता और अन्य विधाओं को तो बदला ही, अपनी दलित बिरादरी को अपूर्व नेतृत्व, आत्मविश्वास, साहस और गरिमा से समृद्ध किया.

नामदेव ढसाल

उसने ग़ैर-दलित साहित्यिक प्रतिष्ठानों को विवश किया कि उसके जैसी कविता को ही समसामयिक मराठी की मुख्यधारा मान लिया जाए. बीसियों श्रेष्ठ दलित कवि, गल्पकार, नाटककार और आलोचक उससे प्रेरित हुए और हो रहे हैं.

नाम्या अपने जीवन-काल में ही ऐसा क्लासिक बन गया जिसका महत्व मराठी से बाहर भी बढ़ता गया. भारतीय दलित साहित्य ने देश में ही नहीं, विश्व-स्तर पर जो प्रतिष्ठा और अनिवार्य स्वीकृति अर्जित की है, उसके केंद्र में नामदेव ढसाल है.

'नोबेल पुरस्कार के हक़दार'

चंद्रकांत पाटील और दिलीप चित्रे जैसे उसके ग़ैर-दलित समकालीनों ने यह शुरूआत में ही पहचान लिया था.

पाटील ने उसके प्रारम्भिक अनुवाद हिंदी में किए और क़रीब पैंतीस वर्ष पहले ग्वालियर में सुदीप बनर्जी द्वारा आयोजित हिंदी की ऐतिहासिक पहली दलित साहित्य संगोष्ठी में नाम्या, दया पवार, राजा ढाले, भुजंग मेश्राम जैसे नाम छाये रहे.

उधर दिलीप चित्रे ने यूरोप, विशेषतः जर्मनी, को नामदेव और <link type="page"><caption> दलित साहित्य</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130912_hindi_special_dalit_sahitya_akd.shtml" platform="highweb"/></link> से परिचित करवाने का बीड़ा उठाया. इसमें हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के प्राध्यापक-द्वय ग्युन्टर ज़ोंठाइमर तथा लोठार लुत्से और फ़िल्मकार-फ़ोटोग्राफ़र श्टेगम्युलर ने अपने अनुवादों और चित्र-पुस्तकों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

दिलीप चित्रे का तो मानना था कि यदि भारत से किसी कवि को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए तो एकमात्र नामदेव ढसाल को.

यदि उसके अनुवाद कुछ और यूरोपीय भाषाओँ में हो जाते तो शायद वह संभव भी था. स्वयं मेरी धारणा यह है कि आज के भारत में नामदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से बड़ा प्रासंगिक कवि है.

संपूर्ण क्रांति के अनुनायी

नाम्या सौभाग्यशाली था कि मल्लिका अमर शेख़ सरीखी स्वयंसिद्धा कवयित्री ने उससे प्रेम और विवाह किया किन्तु राजनीतिक विवादों ने उसकी बीमारी की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ा.

कभी वह राममनोहर लोहिया का अनुयायी रहा, कभी उसने मार्क्सवाद को अपनाया, कभी सम्पूर्ण क्रान्ति का अनुसरण किया.

नामदेव ढसाल

फिर श्रीकांत वर्मा से प्रभावित होकर इंदिरा गाँधी की भक्ति में कविताएँ लिख डालीं और जीवन के अंतिम वर्षों में भौतिक प्रलोभनों के चलते उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शिव सेना की भयावह कुसंगति में पड़कर उसने अपने कई मित्रों को निराश कर दिया.

लेकिन इस दिग्भ्रमित, नासमझ अवसरवादिता का कोई भी कुप्रभाव उसकी कविता पर सिद्ध नहीं किया जा सकता. उसे कविता के लिए अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले जिनका वह वाक़ई अधिकारी था.

हिंदी कवियों में उसके कई मित्र थे जिनमें शायद चंद्रकांत देवताले अन्यतम हैं.

यह कहना कठिन है कि हिंदी की दलित कविता ने उससे कितना सीखा है किन्तु हिंदी के जो ग़ैर-दलित कवि आज 60 से 70 वर्षों की उम्र के हैं उनके लिए नाम्या समस्यामूलक मित्रवत् या भ्रातृवत् रहा है.

इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसने दक्षिण-एशियाई साहित्य को स्थायी रूप से प्रभावित किया है. उसे निस्संकोच भारतीय कविता का बाबासाहेब आम्बेडकर कहा जा सकता है.

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