मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे...

भूपिंदर
    • Author, श्वेता पांडेय
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

जब उनके पिताजी उन्हें संगीत सिखाते थे तो बहुत मारते थे और इसी मार के चलते भूपिंदर सिंह को संगीत से परहेज़ था.

लेकिन क़िस्मत से शायद ही कोई भाग पाया है, भूपिंदर भी नहीं भाग पाए.

नाम गुम जाएगा, बीती न बिताई रैना, दिल ढूंढता है जैसे कई गानों के गायक भूपिंदर के करियर में बस गिनती के बॉलीवुड गाने हैं लेकिन आज भी वो गाने आपके मनपंसद गानों की लिस्ट में मौजूद रहते हैं.

भूपिंदर की नई कोशिश है एक कंसर्ट 'रंग-ए-ग़ज़ल' जिसमें वो पूरे महाराष्ट्र का दौरा करेंगे और इसी सिलसिले में उनसे मुंबई में मुलाक़ात एक ख़ास अनुभव था.

शायर का ख़्याल

भूपिंदर ख़ुद एक संगीतकार भी हैं और मानते हैं कि ग़ज़ल का चलन कम होने का कारण आजकल की संगीत शैली है.

वो कहते हैं, "ग़ज़ल शायर का ख़्याल है, उसकी सोच है, तसव्वुर है और जो इसे गा रहा है, संगीतबद्ध कर रहा है वो इसे समझे बिना ऐसा करेगा तो ग़ज़ल अच्छी नहीं बनेगी."

अपनी जीवनसाथी और गायिका मिताली के साथ वो ग़ज़ल को फिर से एक रंग देने के लिए 'रंग-ए-ग़ज़ल' कार्यक्रम कर रहे हैं.

रिटार्यड लोगों का शग़ल

भूपिंदर बेबाक कहते हैं कि आजकल ग़ज़ल सुनने वालों और बनाने वालों का पहले जैसा माहौल नहीं रह गया है. आज लोग तूफ़ान मेल हैं और उन्हें धैर्य वाली चीज़ें पसंद नहीं हैं.

वो याद करते हुए कहते हैं, "हम स्टूडियोज़ पहुंचते थे और फिर गीतकार, संगीतकार, गायक और निर्देशक और कभी-कभी अभिनेता भी आकर साथ में बैठ जाते थे. गाने की हरकतों पर काम होता, लय पर काम होता तब जाकर एक मास्टरपीस बनता था."

उनके अनुसार आजकल न बनाने वालों के पास टाइम है न सुनने वालों के पास.

लेकिन भूपिंदर एक बड़ा बदलाव अपनी ऑडियंस में देखते हैं.

उन्होंने कहा, "60-70 के दशक में रिटायर्ड लोग ग़ज़ल सुनते थे पर अच्छा लगता है कि अब कुछ युवा भी इसकी ओर आकर्षित होते हैं, कंसर्ट में आते हैं लेकिन हां ये प्रतिशत कम है."

सिचुएशन पर ग़ज़ल

भूपिंदर ने अपने दिनों की याद करते हुए बताया कि गीतकार, संगीतकार फ़िल्मों में ग़ज़ल डालने के लिए मौक़ा तलाशते थे और निर्देशक से वैसी सिचुएशन बनाने के लिए कहते थे.

वो कहते हैं, "चाहे 'अर्थ' की पार्टी का 'कोई ये कैसे बताए' हो या 'एतबार' का 'किसी नज़र को तेरा', वो ग़ज़लें दिल छू लेती हैं क्योंकि उनके लिए वैसा माहौल पर्दे पर बनाया गया था."

भूपिंदर के मुताबिक़ आज फ़िल्मों में बड़े नामी और टैलेंटेड कंपोज़र हैं लेकिन न वैसी सिचुएशन बन पाती है और न ही वैसे विषय हैं कि ग़ज़ल का इस्तेमाल हो, ग़ज़ल का काम शायद स्लो रोमांटिक गाने कर रहे हैं.

एक्टिंग से भागा

भूपिंदर ने अपने करियर में एक-दो मौक़ों पर एक्टिंग भी की है लेकिन ये उन्हें पसंद नहीं था.

वो हंसते हुए कहते हैं, "मैं एक्टिंग का ऑफ़र आते ही दिल्ली भाग जाता था और फिर दो-तीन महीने वापस ही नहीं आता था क्योंकि उस वक़्त लोगों को न भी नहीं कहा जाता था."

भूपिंदर याद करते हुए कहते हैं, "एक बार चेतन आनंद ने हक़ीक़त के मेरे शॉट के बाद सेट पर एक स्टूल पर खड़े होकर घोषणा की थी कि वो फ़िल्म जगत को दूसरा के एल सहगल देंगे (भूपिंदर की ओर इशारा), तब मैंने मन में सोचा था कि बेचारे इस आदमी को पता ही नहीं है कि कल मैं दिल्ली भागने वाला हूं."

फ़िलहाल अपने कंसर्ट की तैयारी में लगे भूपिंदर और मिताली अपनी पुरानी ग़ज़लों पर रियाज़ कर रहे हैं और उनके बेटे अमनदीप सिंह के बारे में मिताली ने बताया कि वो वेस्टर्न संगीत पर काम कर रहा है और गिटार सीख रहा है.

भूपिंदर को जब कुछ मनपसंद गानों से जुड़ी यादें पूछी गई तो वो काफ़ी बातें भूले हुए लगे लेकिन अपना पसंदीदा गाना उन्होंने गाया 'दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में....'

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