अरिजीत सिंहः मुर्शिदाबाद के जियागंज में लोग उन्हें कैसे देखते हैं?

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- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
सुर की साधना में डूबा एक छोटा सा शहर. नाम है जियागंज.
दुनिया के लिए अरिजीत सिंह...और यहां के लोगों के लिए 'सोमू का शहर'.
लेकिन सोमू के इस शहर में कहीं भी आपको 'सोमू' की तस्वीर नहीं नज़र आती. न कहीं पोस्टर लगे मिलते हैं और न ही बैनर.
अरिजीत यहां भी चकाचौंध और उसकी नुमाइश से उतने ही फ़ासले पर खड़े दिखाई देते हैं, जितना फ़ासला उन्होंने मुंबई की चमक-दमक वाली दुनिया से बनाए रखा है.
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बीते जनवरी में जब अरिजीत ने बॉलीवुड में प्लेबैक सिंगिंग को अचानक ही एक दिन 'मैनु विदा करो' कह दिया और 'फिर ले आया दिल मजबूर…' उन्हें वापस जियागंज की गलियों में ले आया, तभी से इस बात को समझने की जिज्ञासा थी कि भला उस शख़्स का प्रभाव कैसा होगा.
उनके ही शहर के लोगों, ख़ासकर युवा पीढ़ी पर इस शख़्सियत का प्रभाव कैसा होगा, जिसने अपने करियर के चरम पर आकर ऐसा फ़ैसला करने की हिम्मत दिखाई.
जियांगज पर अरिजीत के प्रभाव को समझने के लिए मैंने मदद ली यहां की गलियां और इन गलियों में रहने वाले लोगों की.

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जियागंज का अनुभव

जियागंज में संगीत इतना आम है कि शाम को यहां की गलियों से गुज़रने पर रियाज़ करते बच्चों और बड़ों की आवाज़ आपको सुनाई दे जाएगी.
ऐसी ही एक आवाज़ ने मुझे मितोश्री की म्यूज़िक क्लास तक पहुंचाया. मितोश्री बीते 25 सालों से जियागंज के बच्चों को संगीत और वाद्य यंत्र की शिक्षा देती हैं.
वह कहती हैं, ''शुरुआत पांच बच्चों से हुई थी और आज डेढ़ सौ के क़रीब बच्चे हैं.''
संगीत के प्रति बच्चों के बढे़ रुझान के पीछे वह अरिजीत को एक बड़ी वजह मानती हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जियागंज और संगीत के बीच का रिश्ता केवल अरिजीत के कारण ही मज़बूत हुआ है.
इसी क्लास में हारमोनियम पर सुर लगा रहीं 19 साल की आयशा अधिकारी कहती हैं, ''म्यूज़िक इज़ वेरी कॉमन इन जियागंज, इट्स पार्ट ऑफ़ आवर कल्चर. (जियागंज में संगीत बहुत आम है, यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है)''
पर वह यह भी जोड़ती हैं कि इस छोटी सी जगह में अरिजीत सिंह जैसा कोई नामी व्यक्तित्व रह रहा है इसलिए आज हम म्यूज़िक पर चर्चा कर रहे हैं. पढ़ने लिखने के बाद भी एक प्लेटफ़ॉर्म है इसका भरोसा हमें नहीं मिलता अगर अरिजीत यहां नहीं रहते.
मितोश्री ने हमें ऐसे कई संगीतकारों के नाम बताएं जिनका जन्म जियागंज में हुआ पर वह हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध से दूर रहे.
अरिजीत इस दिशा में कदम बढ़ाने और फिर एक मुकाम हासिल करने वाले पहले थे.
'वह पहले भी म्यूज़िक ख़ैपा था, अब भी म्यूज़िक ख़ैपा है'

अरिजीत का परिवार विभाजन के समय लाहौर से पश्चिम बंगाल आया था और फिर धीरे-धीरे मुर्शिदाबाद के जियागंज में आकर बस गया. उनकी नानी और मां को संगीत की अच्छी समझ थी इसलिए चार साल की उम्र से ही वह संगीत से जुड़ गए.
शुरुआती तालीम घर से मिली, गुरुओं ने हुनर को निखारा, छोटे शहर से बड़े मंच तक का सफ़र तय किया और फिर देखते ही देखते वह हर दिल की आवाज़ बन गए.
अरिजीत को जिन तीन गुरुओं से संगीत और वाद्य यंत्र की शिक्षा मिली, वह थे- राजेंद्र प्रसाद हज़ारी, बीरेंद्र प्रसाद हज़ारी और धीरेंद्र प्रसाद हज़ारी. मितोश्री ने भी इन्हीं गुरुओं के सानिध्य में संगीत की शिक्षा को पूरा किया है.
वह याद करती हैं. ''अरिजीत मुझसे उम्र में छोटा था. मैंने उसे बचपन से देखा है, एकदम चुप कर के बैठा रहता था क्लास में. मन लगाकर हर चीज़ें सुनता था. केवल गाना ही नहीं, वाद्य यंत्र... जैसे तबला, तानपुरा हर चीज़ सीखता था."
"उतनी छोटी उम्र में उसे तानपुरा मिलाते हुए देखना, हमें हैरान कर देता था. तभी से हमारे मन में ये ख़याल रहता था कि यह असाधारण बच्चा है... एकदम असाधारण.''
टिंकू राय, जिनकी उम्र फ़िलहाल पचास के आसपास होगी, उन्होंने भी अरिजीत को बचपन से देखा है.
वह कहते हैं, ''अरिजीत जब अरिजीत नहीं था, सोमू था... तब से लेकर अब में, उसमें कोई बदलाव नहीं आया है. वह पहले भी म्यूज़िक ख़ैपा था और अब भी है. बांग्ला में म्यूज़िक ख़ैपा का मतलब होता है म्यूज़िक पगला. सुर का साधक है वो. अभी भी 7-8 घंटे तो रियाज़ करता ही है.''
अरिजीत ने अपने कई इंटरव्यू में कहा है कि वह एक गाने की रिकॉर्डिंग से पहले रात में घंटों रियाज़ करते हैं, गाने के बोल को महसूस करते हैं...और फिर सुबह में उसे रिकॉर्ड करते हैं.
अरिजीत ने एक इंटरव्यू में ये भी कहा था कि उनकी आवाज़ पहले ऐसी नहीं थी. उन्होंने अपने गले को तराशा है.

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अरिजीत बनने के बाद

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अरिजीत के अरिजीत बनने के बाद उनके हिस्से शोहरत आई, पहचान मिली लेकिन आसपास की दुनिया में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया.
अपने परिवार के साथ वह आज भी जियागंज की संकरी सी गली में बनी एक तीन मंज़िला इमारत में रहते हैं.
हम जब उनके इस घर के बाहर पहुंचे तो हमें पहरेदार खड़े मिले, उन्होंने हमसे घर की तस्वीरें क़ैद करने से मना कर दिया.
हम आसपास लोगों से बात करने लगे. अरिजीत के घर के ठीक पीछे गंगा घाट है. मशहूर सिंगर एड शिरन और अरिजीत सिंह के ब्लॉकबस्टर गाने सैफ़ायर में आपको यहां के दृश्य नज़र आते हैं.
आस-पास के लोग भी यह किस्सा गर्व से साझा करते हैं कि एड शिरन जब आए थे तो जियागंज की इन्हीं गलियों में घूम-घूमकर शूट किया था.
वह इस बात को लेकर भी खुशी ज़ाहिर करते हैं कि अरिजीत के कारण बड़ी-बड़ी हस्तियां जैसे आमिर ख़ान, एड शिरन उनके छोटे से शहर में पहुंचते हैं.
आयशा अधिकारी कहती हैं कि आज जियागंज को ग्लोबल लेवल पर पहचान मिली हुई है और यह हो पाया है केवल अरिजीत के कारण.
कइयों के सपनों का हिस्सा

शहर में 'हेशेल' नाम का एक पुराना होटल है, जिसे अरिजीत के पिता और परिवार के दूसरे सदस्य मिलकर चलाते हैं.
यहां हमारी मुलाक़ात उनके पिता से हुई. स्कूटी से उतरकर सब्ज़ी की थैली लिए वह होटल में प्रवेश कर रहे थे, हमने उनसे इंटरव्यू की गुज़ारिश की.
पर वह नहीं माने. उन्होंने कहा, ''इंटरव्यू में एक ही जैसी चीज़ें कहकर हम थक चुके हैं. इसलिए क्या ही बात करेंगे.''
अरिजीत की मां अदिती सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, अरिजीत ने उनके नाम पर जियागंज में एक म्यूज़िक स्कूल की शुरुआत भी की है.
समाजसेवा से जुड़े भी कुछ दूसरे काम भी हैं, जो वह चुपचाप अपने स्तर पर करते हैं. कैमरे पर इन्हें दिखाने या इनके बारे में विस्तार से बताने की इजाज़त नहीं है. उनके मैनेजर के मुताबिक, ''अरिजीत इन पहलुओं को चर्चा का हिस्सा नहीं बनाना चाहते.''
पर अरिजीत यहां कइयों के सपनों का हिस्सा ज़रूर हैं.
'सबको एक यात्रा की ज़रूरत है'

विधायक गोस्वामी ने पांच लड़कों के साथ मिलकर एक फ़ोक (लोक) बैंड की शुरुआत की है. उनकी उम्र 40 के आस-पास होगी पर उनके साथ बैंड में शामिल दूसरे सभी लड़कों की उम्र बीस से कम है. ये सारे ही लड़के अरिजीत को अपनी प्रेरणा मानते हैं.
इसी बैंड का हिस्सा सौभिक चक्रवर्ती कहते हैं, "अरिजीत हमारे लिए एक इमोशन की तरह हैं. हम उनके कल्चर को फॉलो करना चाहते हैं. अरिजीत अगर नहीं होते तो आज हम जो बात कर रहे हैं उसका कोई महत्व नहीं होता."
"हमें यह अहसास नहीं होता कि हमें एक बैंड की शुरुआत करनी चाहिए. हमारे बीच भी एक प्रतिस्पर्धा की ज़रूरत है. सबको एक यात्रा की ज़रूरत है."
वहीं विधायक गोस्वामी बताते हैं कि म्यूज़िक शुरू से ही मुर्शिदाबाद की संस्कृति का हिस्सा रहा है.
लेकिन कई परिवार के बच्चे गाना-बजाना नहीं सीखते थे, अब ये बच्चे भी अरिजीत को देखकर सपना देख रहे हैं कि हम भी ये कर सकते हैं.
ऐसा नहीं है कि युवाओं पर अरिजीत का असर केवल संगीत तक सीमित है. वे उनकी लाइफ़स्टाइल से भी उतने ही प्रभावित नज़र आते हैं.
'उनकी संस्कृति को फ़ॉलो करना चाहते हैं'

उनकी सादगी के बारे में बात करते हुए नौवीं कक्षा के प्रियम साहा कहते हैं, ''जब भी वह हमारे सामने से गुज़रते हैं, हम बिल्कुल सामान्य रूप से बात करते हैं, पूछते हैं - दादा भालो आछो?''
"उन्हें कोई इस नज़रिए से नहीं देखता कि कोई बड़ा सिंगर है. हम लोग नॉर्मल बात करते हैं. और वह भी बहुत नॉर्मल रहते हैं.''
अरिजीत की ज़िंदगी यहां उतनी ही सामान्य है, जितनी कि इस शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी.
इस पर सौभिक कहते हैं, ''उन्होंने अपना यहां एक पर्सनल स्पेस बनाया है. पहले लोग सोचते थे कि कुछ कर के यहां से बाहर निकलना है लेकिन वह ऐसे नहीं सोचते और उनकी यही बात मुझे प्रेरणादायक लगती है."
"हम उनकी संस्कृति को फॉलो करना चाहते हैं. वह जिस सादगी के साथ रहते हैं, उनके जो उसूल हैं, जिस तरह वह हमारे बीच घुल-मिलकर रहते हैं, ये हमारे जैसे युवाओं के लिए बहुत ही रोमांचित कर देने वाला है. हम उनकी इन चीज़ों से बहुत प्रभावित हैं.''
चुनाव वाले राज्य पश्चिम बंगाल में हम जियागंज पहुंचे थे, ये समझने के लिए कि आख़िर उस शख़्स का प्रभाव उसके आसपास, उसके शहर के लोगों... ख़ासकर युवाओं पर कैसा होगा... जिसने करियर के शिखर पर कामयाबी के शोर से दूर… ख़ामोशी को चुना.
और यहां पहुंचकर हमें सुनाई दी उस खामोशी के पीछे छुपी सैकड़ों नई आवाज़ें, जो अरिजीत की तरह कामयाबी को छूना तो चाहती हैं, लेकिन उन्हीं की तरह लौटकर जियागंज की गलियों में भी आना चाहती हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित































