कोलकाता: 86 साल पुराने इस 'घर' में आज भी हर रविवार होती है नीलामी

कोलकाता के रसल स्ट्रीट पर मौजूद है 'द रसल एक्सचेंज'
इमेज कैप्शन, कोलकाता के रसल स्ट्रीट पर मौजूद है 'द रसल एक्सचेंज'
    • Author, मुकुंद झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

कोलकाता के रसल स्ट्रीट पर आम दिनों के मुकाबले रविवार को सूनापन रहता है.

दफ्तर बंद होते हैं, गाड़ियों की आवाजाही कम होती है.

दोपहर को इस सूनी सड़क पर एक वेयरहाउस जैसी इमारत में ख़ूब चहल-पहल रहती है.

अंदर जाने पर पता लगता है कि यहां पर नीलामी चल रही है और बोलियां लगाई जा रही हैं.

एक शख़्स है जो क़रीब 5 फीट की ऊंचाई पर टेबल और कुर्सी लगाकर बैठा है.

ये शख्स माइक पर आइटम नंबर बताने के साथ-साथ बोलियां लगवा रहा है.

उसके ठीक सामने एक बड़ी सी मेज़ पर किताबें, एन्टीक आइटम, कपड़े, फ्लावर वास, कटलरी, घड़ी, गुज़रे ज़माने का टेलिफ़ोन और ना जाने क्या-क्या है.

हर रविवार होने वाली नीलामी में सामान खरीदने आते हैं लोग
इमेज कैप्शन, हर रविवार होने वाली नीलामी में सामान खरीदने आते हैं लोग

इसी मेज़ को घेरकर खड़े लोग ऊंची आवाज़ में बोलियां लगा रहे हैं. जैसे ही कोई माल बिकता है, ऑक्शनियर लकड़ी का हथौड़ा पटककर रसीद कटवा देता है.

जिस जगह की हम बात कर रहे हैं, उसका नाम है 'द रसल एक्सचेंज'. साल 1940 में बना ये ऑक्शन हाउस एशिया में सबसे पुराना होने के साथ-साथ भारत का इकलौता पारंपरिक ऑक्शन हाउस है, जहां अब भी नीलामी होती है.

क्या-क्या मिलता है यहां और कौन खरीद सकता है?

नीलामी में हिस्सा लेते हुए लोग
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'द रसल एक्सचेंज' में हर रविवार साढ़े ग्यारह बजे से नीलामी शुरू हो जाती है.

यहां आने वाले लोगों को एक कैटलॉग मिलता है जिसपर नीलामी के लिए रखे गए सभी सामानों की जानकारी होती है.

इस कैटलॉग में कपड़े, जूते, शर्ट, जीन्स पैंट, साड़ी-ब्लाउज़ से लेकर फ़र्नीचर, एन्टीक पीसेज़, झूमर, किताबें, घड़ियां, लैंप जैसे कई सामान होते हैं.

12 अप्रैल 2026 वाले रविवार को कुल 367 आइटम नीलामी के लिए रखे गए थे.

अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में रसल स्ट्रीट का इलाका कई ऑक्शन हाउस के लिए जाना जाता था.

लेकिन आज यहां सिर्फ़ 'द रसल एक्सचेंज' ही है जो बीते करीब 86 सालों से हर रविवार को नीलामी करवा रहा है.

इस ऑक्शन हाउस में कोई भी शख्स बग़ैर किसी एंट्री फ़ीस या रजिस्ट्रेशन के जा सकता है.

आपकी जेब में पैसे हैं और आप कुछ खरीदना चाहते हैं तो आइए पसंद के आइटम पर बोली लगाइए और समझ में आए तो खरीदिए, नहीं तो बोली से पीछे हट जाइए.

ऐसे ही अगर आपको कुछ सामान बेचना है तो आप अपना सामान लेकर आइए, ऑक्शन हाउस को जमा कीजिए, साथ ही ये भी बता दीजिए कि आप कितनी रकम की उम्मीद कर रहे हैं.

'द रसल एक्सचेंज' के सीनियर पार्टनर अनवर सलीम ने कहा, "मान लीजिए आपकी घड़ी है तो हम आपको सलाह देते हैं कि इससे कम में ये नहीं बिकनी चाहिए. अगर आप मानते हैं तो बहुत अच्छा, अगर आप उससे ज़्यादा में बेचना चाहते हैं तो लिख दीजिए हम उससे कम में नहीं बेचेंगे. दो हफ़्ते माल नहीं बिका तो वापस ले जाइए. हमारी दिलचस्पी तो इसमें ही है कि जितने ज़्यादा में बिकेगा, हमारा कमीशन भी उतना ही ज़्यादा बनेगा."

1986 से लगातार यहां आ रहे अपूर्ब बनर्जी के मुताबिक, "बेचने वाले और ऑक्शन हाउस के बीच क्या रकम तय हुई है ये लोगों को नहीं बताया जाता है."

कैसे होती है कमाई?

अपना सामान खरीदने के बाद रसीद बनवाना एक ग्राहक
इमेज कैप्शन, सामान खरीदने के बाद रसीद बनवाता एक ग्राहक

दुर्गापुर के राजीब बनर्जी कई सालों से इस ऑक्शन हाउस में आ रहे हैं. अगर ऑक्शन हाउस की तरफ़ से तय रकम में सामान बिका या उससे ज़्यादा दाम मिला तो सामान बिक जाता है.

अगर सामान नीलामी में नहीं बिका तो सामान को अगले रविवार फिर से नीलामी में रखा जाता है.

कोलकाता के ही इबरार अहमद ख़ान करीब 50 सालों से यहां आ रहे हैं.

इबरार ने बताया कि ऑक्शन हाउस की कमाई कमीशन से होती है.

मान लीजिए किसी का सामान पांच हज़ार रुपये में बिका तो ये ऑक्शन हाउस 25 फीसदी पैसे काटकर पुराने मालिक को चुकाएगा.

ऐसे ही जो माल का नया मालिक है उससे एक फीसदी कमीशन लिया जाता है.

सत्यजीत रे और द रसल एक्सचेंज

फ़िल्म 'सोनार केल्ला' की शूटिंग करते सत्यजीत रे
इमेज कैप्शन, फ़िल्म 'सोनार केल्ला' की शूटिंग करते सत्यजीत रे (फ़ाइल फोटो)

महान फ़िल्ममेकर सत्यजीत रे अक्सर इस ऑक्शन हाउस आते थे.

सत्यजीत रे की फिल्मों में सेट डिज़ाइनिंग और प्रॉप्स के लिए कई फर्नीचर और एन्टीक आइटम यहां से खरीदे या किराए पर लिए जाते थे.

अनवर सलीम के मुताबिक, "सत्यजीत रे साहब आते थे. वो कहते थे कि अगर कहीं सामान नहीं मिल रहा है फ़िल्म के लिए तो रसल एक्सचेंज जाइए. उनकी कई किताबों में हमारा ज़िक्र भी है."

अनवर सलीम ने बताया, "हम फ़िल्म वालों को फ़र्नीचर किराए पर देते हैं, वो अपने सेट्स वगैरह बना लेते हैं. मिथुन चक्रवर्ती की कई फिल्में यहां बनी है."

अनवर सलीम के मुताबिक, कई एक्टर्स और नेता इस ऑक्शन हाउस में सामान खरीदने आते रहे हैं. सलीम ने शबाना आज़मी, जावेद अख़्तर, मेनका गांधी और कुमारी शैलजा का नाम बताया.

'द रसल एक्सचेंज' की आख़िरी पीढ़ी?

'द रसल एक्सचेंज' के सीनियर पार्टनर अनवर सलीम
इमेज कैप्शन, 'द रसल एक्सचेंज' के सीनियर पार्टनर अनवर सलीम

द रसल एक्सचेंज के सीनियर पार्टनर अनवर सलीम इस ऑक्शन हाउस को चलाने वाले तीसरी पीढ़ी के हैं.

अनवर सलीम के साथ-साथ इस ऑक्शन हाउस को उनके छोटे भाई अरशद सलीम और बहन सरफ़राज़ बेग़म शमसी भी चलाते हैं.

अरशद सलीम 18 साल की उम्र से यहां नीलामी करवा रहे हैं.

इसी ऑक्शन हाउस के आख़िर में एक सीढ़ी ऊपर की तरफ़ जाती है और वहीं कोने में एक छोटा सा केबिन है.

अनवर सलीम ज़्यादातर लंदन में रहते हैं. उन्होंने बताया, "मैं आता रहता हूं और (अपने भाई-बहन को) तंग करता रहता हूं मगर संभालते यहीं है. अगली पीढ़ी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है."

अनवर सलीम से हमने इस ऑक्शन हाउस के भविष्य के बारे में भी जानना चाहा. अनवर कहते हैं, "हो सकता है कि कोई यूरोप का ऑक्शन हाउस हमारे साथ कोलैबोरेट कर ले."

कोलकाता की विरासत

अनवर सलीम ने बीबीसी को इस ऑक्शन हाउस के इतिहास के बारे में बताया. अनवर सलीम कहते हैं, "पूरी प्रॉपर्टी 'गॉलस्टन मैंशन्स' के नाम से जानी जाती थी, जिसके मालिक आरातून नाम के एक शख्स थे. जिस जगह पर आज 'रसल एक्सचेंज' है, वहाँ पहले एक गोदाम हुआ करता था. मेरे दादाजी, अब्दुल समद, और काकू बाबू ने उस जगह को लीज़ पर लेने के लिए टोकन के तौर पर 5000 रुपये दिए थे."

अनवर सलीम के मुताबिक रसल स्ट्रीट और पार्क स्ट्रीट पर कई ऑक्शन हाउस होने की वजह से यह इलाका नीलामी के लिए मशहूर हो गया था, जहां ज़्यादातर अंग्रेज़, महाराजा और बड़े ज़मींदार आया करते थे.

60 के दशक में, जिन राजनयिकों (डिप्लोमैट्स) का तबादला होता था, उनके घरों पर ही नीलामी का आयोजन करना आम बात थी. इससे ग्राहकों को विदेशी सामान खरीदने का मौका मिल जाता था.

"50 के दशक के आखिर और 60 के दशक में भारत में विदेशी मुद्रा पर कड़ा नियंत्रण था और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम थे. इसलिए, घर में इस्तेमाल होने वाले सामानों को आयात नहीं किया जा सकता था."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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