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सिद्धारमैया ने छोड़ी कर्नाटक के सीएम की कुर्सी, डीके शिवकुमार होंगे अगले मुख्यमंत्री
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पार्टी आलाकमान से किए गए अपने वादे के मुताबिक़ अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
इससे पहले उन्होंने संकेत दिया था कि वह कांग्रेस आलाकमान की बात मानेंगे और अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे.
उन्होंने 2013 से 2018 तक मुख्यमंत्री का पूरा पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया था और 20 मई को अपने दूसरे कार्यकाल के तीन वर्ष भी पूरे किए.
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, सिद्धारमैया ने कर्नाटक के राज्यपाल के विशेष सचिव प्रभु शंकर को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है. राज्यपाल थावरचंद गहलोत, जो राज्य से बाहर हैं, आज रात लौट रहे हैं.
इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए सिद्धारमैया ने कहा, "मैंने आज अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है. मैं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे यह अवसर दिया."
जब भावुक हुए सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार
कर्नाटक में सत्ता का हस्तांतरण अब सहज तरीके से होता दिख रहा है.
गुरुवार को अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ नाश्ते पर हुई बैठक, भावुक माहौल में बदल गई. यहां तक कि डीके शिवकुमार भी सिद्धारमैया को गले लगाते और उनके पैर छूते हुए भावुक हो गए.
दोपहर के आसपास समाप्त हुई नाश्ते की बैठक के बाद, एक मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "शिवकुमार ने उनका (सिद्धारमैया का) आशीर्वाद भी लिया."
एक अन्य मंत्री ने कहा, "जब सिद्धारमैया ने उनके साथ सहयोग करने के लिए मंत्रियों को धन्यवाद दिया तो कुछ मंत्रियों की आंखों में आंसू थे."
नाम न छापने की शर्त पर उस मंत्री ने कहा, "एक समय वह ख़ुद भी भावुक हो गए थे."
सिद्धारमैया का राज्यपाल थावरचंद गहलोत को औपचारिक रूप से इस्तीफ़ा सौंपना कल दिए गए समय के अनुसार दोपहर तीन बजे होना था.
हालांकि, बीती रात 11 बजकर 45 मिनट पर राज्यपाल के अचानक रवाना हो जाने से इस्तीफ़े की प्रक्रिया रुक गई थी.
सिद्धारमैया का ओबीसी मुस्लिम गठजोड़
कर्नाटक के पूर्व महाधिवक्ता प्रोफ़ेसर रविवर्मा कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "परंपरागत रूप से मुख्यमंत्री अपना इस्तीफ़ा पत्र राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से सौंपते हैं.
यह सरकार के प्रमुख की ओर से राज्य के प्रमुख को दिखाया जाने वाला एक शिष्टाचार भी होता है. लेकिन यह परिस्थितियां असाधारण प्रतीत होती हैं."
इस असामान्य स्थिति को छोड़ दें तो राजनीतिक रूप से सिद्धारमैया के इस्तीफ़ा देने के फ़ैसले ने विधायक दल में उनके कई कट्टर समर्थकों को चौंका दिया है.
क़ानून मंत्री एचके पाटिल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि बुधवार सुबह से बड़ी संख्या में पार्टी विधायक और कार्यकर्ता उनसे मिलने पहुंचे "क्योंकि उनके इस्तीफ़ा देने के फ़ैसले से वे बेहद व्यथित थे."
पूर्व मंत्री आरवी देशपांडे के मुताबिक़, "सिद्धारमैया लगातार सभी से कहते रहे हैं कि उन्होंने कांग्रेस आलाकमान से किया अपना वादा निभाया है कि जब भी पार्टी उनसे कहेगी, वह पद छोड़ देंगे."
मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी खींचतान को सुलझाने के लिए राहुल गांधी ने सिद्धारमैया और शिवकुमार को मंगलवार को बैठक के लिए बुलाया था.
शिवकुमार लगातार यह मांग कर रहे थे कि सिद्धारमैया 2023 में पार्टी की जीत के समय किए गए वादे को निभाएं. पार्टी 224 सदस्यीय विधानसभा में 136 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी.
सिद्धारमैया ने दिल्ली की राजनीति करने से मना किया
सिद्धारमैया के साथ बैठक के दौरान पार्टी सूत्रों ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को पुष्टि की थी कि राहुल गांधी ने सुझाव दिया था कि सिद्धारमैया राज्यसभा जाएं और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ भूमिका निभाएं.
लेकिन सिद्धारमैया ने कई कारणों से इससे इनकार कर दिया.
कुछ महीने पहले अनौपचारिक बातचीत के दौरान सिद्धारमैया ने इस संवाददाता से कहा था, "मुझे राष्ट्रीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है. अगर मुझसे यह कुर्सी (मुख्यमंत्री पद) खाली करने के लिए कहा जाता है, तो मैं राज्य में ही रहूंगा."
एनआईटीटीई अकादमी के निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "उनकी जड़ें कर्नाटक की राजनीति में हैं. वह दिल्ली की दरबारी संस्कृति के अभ्यस्त नहीं हैं, जहां हिन्दी जानना एक पूर्व शर्त है."
"आपको याद होगा कि जब एचडी देवेगौड़ा 1996 में प्रधानमंत्री बने थे, तब दिल्ली में लोगों का पहला सवाल यही था कि क्या वह हिन्दी बोलते हैं."
राज्यसभा जाने का सुझाव ही सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद छोड़ने का पहला संकेत था.
उन्हें बताया गया था कि पार्टी 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के तहत पीढ़ीगत बदलाव करना चाहती है. सिद्धारमैया 78 वर्ष के हैं और शिवकुमार 64 वर्ष के.
सिद्धारमैया को 136 विधायकों में से लगभग 100 का समर्थन हासिल होने का दावा किया जाता है.
दिल्ली गए अपने मंत्री सहयोगियों से सिद्धारमैया ने कहा कि वह हमेशा कहते रहे हैं, "जब भी राहुल गांधी मुझसे कहेंगे, मैं इस्तीफ़ा दे दूंगा. अब जब उन्होंने ऐसा करने को कहा है, तो मैं तुरंत ऐसा करूंगा."
दो मंत्रियों ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से इसकी पुष्टि की.
प्रोफ़ेसर शास्त्री ने कहा, "वह अपने सभी वफ़ादार समर्थकों के लिए एकजुटता का केंद्र बने रहेंगे. वह निश्चित रूप से अहिंदा (ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों के सामाजिक गठजोड़) के नेता के रूप में अपने आधार को सुरक्षित रखना चाहेंगे."
ज़्यादा अहम ध्यान कुरुबा (चरवाहा समुदाय) वोट पर रहेगा, जिसे कांग्रेस पार्टी ने बड़े पैमाने पर हासिल किया है क्योंकि सिद्धारमैया इसी समुदाय से आते हैं.
कांग्रेस की चुनावी रणनीति
पूर्व बीजेपी मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा है कि सिद्धारमैया को पद से हटाने का असर कांग्रेस पार्टी पर पड़ेगा.
उन्होंने इसे "कांग्रेस पार्टी, ख़ासकर राहुल गांधी की ओर से पिछड़े वर्गों के साथ विश्वासघात" बताया है.
उन्होंने कहा, "वह ओबीसी के लिए अभियान चलाते रहे हैं और ख़ुद एक ओबीसी मुख्यमंत्री को हटा दिया है. पिछड़े वर्ग के लिए उनके घड़ियाली आंसू उजागर हो गए हैं."
हालांकि, प्रोफ़ेसर शास्त्री का इस मुद्दे पर अलग मत है.
उन्होंने कहा, "आंकड़ों से पता चला है कि कर्नाटक में गैर-प्रभावशाली ओबीसी वोट कांग्रेस से खिसककर बीजेपी की ओर जा रहा है."
"पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की मदद लिंगायत वोटों में बंटवारे ने की थी. अधिकांश वोट बीजेपी के साथ रहे लेकिन कांग्रेस ने लिंगायत वोटों में 10-15 प्रतिशत तक सेंध लगा ली थी."
प्रोफ़ेसर शास्त्री ने कहा, "वोक्कालिगा वोट जेडीएस, कांग्रेस और बीजेपी के बीच तीन हिस्सों में बंट गया था. कांग्रेस के लिए वास्तव में मददगार कारक दलित वोट और वोक्कालिगा व लिंगायत वोटों का बड़ा हिस्सा था."
बुधवार को सिद्धारमैया का आख़िरी आधिकारिक कार्यक्रम राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट प्राप्त करना था.
इस रिपोर्ट में ओबीसी के लिए आरक्षण 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने का सुझाव दिया गया है.
इस रिपोर्ट पर फ़ैसला नई मंत्रिपरिषद करेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.