'बच्चे कहते हैं, बाबा रोटी दो... मैं कहां से दूं?': अपने बच्चों को बेचने के लिए मजबूर अफ़गान परिवार

अब्दुल रशीद अज़ीमी अपनी एक बेटी को बेचने को तैयार हैं ताकि बाकी बच्चों को खिला सकें

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    • Author, योगिता लिमये
    • पदनाम, बीबीसी दक्षिण एशिया और अफ़ग़ानिस्तान संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

जैसे ही सुबह होती है, अफ़ग़ानिस्तान के ग़ोर प्रांत की राजधानी चघचरान में एक धूल भरे चौक पर सैकड़ों आदमी इकट्ठा हो जाते हैं.

थके हुए चेहरों के साथ वे इस उम्मीद में सड़क किनारे लाइन में खड़े रहते हैं कि कोई आएगा और उन्हें कुछ काम देगा. उसी पर निर्भर करता है कि उस दिन उनके परिवार को खाना मिलेगा या नहीं.

हालांकि, काम मिलने की संभावना बहुत कम है.

45 वर्षीय जुमा ख़ान को पिछले छह हफ्तों में सिर्फ़ तीन दिन का ही काम मिला है, जिसके लिए उन्हें रोज़ 150 से 200 अफ़ग़ानी (2.35 से 3.13 डॉलर) मिलते थे.

चेतावनी: इस लेख के कुछ विवरण आपको विचलित कर सकते हैं

वह कहते हैं, "मेरे बच्चे लगातार तीन रात भूखे सोए. मेरी पत्नी रो रही थी, मेरे बच्चे भी रो रहे थे. इसलिए मैंने पड़ोसी से आटा खरीदने के लिए पैसे उधार मांगे."

"मुझे डर है कि मेरे बच्चे भूख से मर जाएंगे."

उनकी कहानी बिल्कुल भी अनोखी नहीं है.

ग़रीब, कर्ज़ में डूबे और लाचार

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, चौंकाने वाली स्थिति यह है कि आज अफ़ग़ानिस्तान में हर चार में से तीन लोग अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं. बेरोज़गारी व्यापक है, स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा चुकी हैं और कभी लाखों लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने वाली मदद, अब बहुत कम रह गई है.

अफ़ग़ानिस्तान में भूख अब रिकॉर्ड स्तर पर है और अनुमान है कि करीब 47 लाख लोग, जो देश की आबादी के दसवें हिस्से से भी ज़्यादा हैं, अकाल के कगार पर हैं.

जुमा खान (बीच में)

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ग़ोर उन प्रांतों में से एक है जो सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. यहां के लोग बेहद हताश हैं.

भर्राई आवाज़ में रबानी कहते हैं, "मुझे फ़ोन आया कि मेरे बच्चों ने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है. मुझे लगा कि मुझे खुद को मार लेना चाहिए. लेकिन फिर मैंने सोचा इससे मेरे परिवार को क्या मदद मिलेगी? इसलिए मैं काम की तलाश में यहां खड़ा हूं."

ख्वाजा अहमद मुश्किल से कुछ शब्द ही कह पाते हैं कि उनकी रुलाई फूट पड़ती है.

वह कहते हैं, "हम भूख से तड़प रहे हैं. मेरे कुछ बच्चे मर चुके हैं, इसलिए मुझे अपने परिवार को खिलाने के लिए काम करना है. लेकिन मैं बूढ़ा हूं, कोई मुझे काम नहीं देना चाहता."

जब चौक के पास एक स्थानीय बेकरी खुलती है, तो मालिक भीड़ में बासी रोटी बांटता है. कुछ ही सेकंड में छीना-झपटी में रोटियां टुकड़ों में बंट जाती हैं और आधा दर्जन लोग उन कीमती टुकड़ों को कसकर पकड़ लेते हैं.

अचानक एक और अफ़रा-तफ़री मच जाती है. मोटरसाइकिल पर सवार एक व्यक्ति आता है, जिसे ईंट ढोने के लिए एक मज़दूर चाहिए. दर्जनों आदमी उसकी ओर भागते हैं.

हम वहां दो घंटे रहे, इस दौरान सिर्फ़ तीन लोगों को काम मिला.

पास की बस्तियों के पीछे सियाह कोह पर्वत श्रृंखला की बर्फ़ से ढकी चोटियां हैं. उनके आगे बंजर, भूरे पहाड़ों पर बिखरे कच्चे घरों में बेरोज़गारी का विनाशकारी असर साफ़ दिखता है.

अब्दुल रशीद अज़ीमी हमें अपने घर ले जाते हैं और अपने दो बच्चों, सात साल की जुड़वां बेटियों रोकिया और रोहिला, को हमारे सामने लाते हैं. वह उन्हें अपने पास कसकर थाम लेते हैं, यह बताने के लिए बेक़रार कि वह कितने असहनीय फै़सले लेने पर मजबूर हैं.

वह रोते हुए कहते हैं, "मैं अपनी बेटियों को बेचने के लिए तैयार हूं. मैं ग़रीब हूं, कर्ज़ में डूबा हूं और लाचार हूं."

"मैं काम से घर लौटता हूं तो होंठ सूखे होते हैं, भूखा-प्यासा, परेशान और उलझन में होता हूं. मेरे बच्चे मेरे पास आकर कहते हैं, 'बाबा, हमें रोटी दो.' लेकिन मैं क्या दूं? काम कहां है?"

अब्दुल बताते हैं कि वह अपनी बेटियों को शादी के लिए या घरेलू काम के लिए बेचने को तैयार हैं. वह कहते हैं, "अगर मैं एक बेटी को बेच दूं, तो मैं अपने बाकी बच्चों को कम से कम चार साल तक खिला सकता हूं."

वह रोहिला को गले लगाते हैं और रोते हुए उसे चूमते हैं. "इससे मेरा दिल टूट जाता है, लेकिन यही एक रास्ता है."

उनकी मां कायहान कहती हैं, "हमारे पास खाने के लिए सिर्फ़ रोटी और गर्म पानी है, चाय भी नहीं."

बेटों की बजाय बेटियों को बेचने का फ़ैसला इस वजह से है कि सांस्कृतिक रूप से बेटों को भविष्य में कमाने वाला माना जाता है, और यहां अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और काम पर तालिबान की पाबंदियों के कारण यह सोच और भी गहरे पैठ हो गई है.

इसके अलावा, एक परंपरा भी है जिसमें शादी के दौरान लड़के के परिवार की ओर से लड़की के परिवार को उपहार दिया जाता है.

अब्दुल और कायहान के दो किशोर बेटे शहर के केंद्र में जूते पॉलिश करने का काम करते हैं. एक अन्य कचरा इकट्ठा करता है, जिसे कायहान खाना पकाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल करती हैं.

बेटी को बेच दिया... कम से कम वह ज़िंदा तो रहेगी

सईद अहमद कहते हैं कि उन्होंने अपनी पांच साल की बेटी शाइका को बेच दिया है

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सईद अहमद बताते हैं कि जब उनकी पांच साल की बेटी शाइका को अपेंडिसाइटिस और लिवर में सिस्ट हो गया था तो उन्हें उसे बेचने पर मजबूर होना पड़ा, .

वह कहते हैं, "मेरे पास इलाज के ख़र्च के लिए पैसे नहीं थे. इसलिए मैंने अपनी बेटी को एक रिश्तेदार को बेच दिया."

शाइका की सर्जरी सफल रही. इसके लिए पैसा उन 2 लाख अफ़ग़ानी (3,200 डॉलर) से आया, जिसमें उसे बेचा गया था.

सईद बताते हैं, "अगर मैंने उस समय पूरी रकम ले ली होती, तो वह उसे अपने साथ ले जाता. इसलिए मैंने उससे कहा कि अभी इलाज के लिए जितने पैसे चाहिए उतने दे दो, और बाकी अगले पांच साल में दे देना, जिसके बाद तुम उसे अपने साथ ले जा सकते हो. वह उसकी बहू बन जाएगी."

शाइका अपनी छोटी-छोटी बाहें उनके गले में डाल देती है. दोनों के बीच गहरा लगाव साफ़ दिखता है, लेकिन पांच साल बाद, जब वह सिर्फ़ 10 साल की होगी, उसे घर छोड़कर उस रिश्तेदार के यहां जाकर उसके किसी बेटे से शादी करनी होगी.

सईद कहते हैं, "अगर मेरे पास पैसे होते, तो मैं कभी यह फ़ैसला नहीं करता. लेकिन फिर मैंने सोचा, अगर सर्जरी के बिना वह मर गई तो?"

"इतनी कम उम्र में अपने बच्चे को दे देना बहुत चिंता पैदा करता है. कम उम्र की शादियों की अपनी समस्याएं होती हैं; लेकिन क्योंकि मैं उसके इलाज का ख़र्च नहीं उठा सकता था, मैं यही सोच रहा था कि कम से कम वह ज़िंदा तो रहेगी."

अफ़ग़ानिस्तान में कम उम्र की शादी की प्रथा अब भी व्यापक है और लड़कियों की शिक्षा पर तालिबान सरकार की पाबंदी के कारण यह बढ़ रही है.

सिर्फ़ दो साल पहले तक सईद को कुछ मदद मिल रही थी.

तब अफ़ग़ानिस्तान के लाखों अन्य लोगों की तरह, उन्हें और उनके परिवार को खाद्य सहायता मिल रही थी- आटा, खाना पकाने का तेल, दालें और बच्चों के लिए पोषक सप्लीमेंट.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सहायता में हुई भारी कटौती ने इस जीवनरक्षक मदद से बड़ी आबादी को वंचित कर दिया है.

कभी अफ़ग़ानिस्तान के सबसे बड़े दानदाता रहे अमेरिका ने पिछले साल देश के लिए लगभग सारी सहायता बंद कर दी. कई अन्य प्रमुख दानदाताओं ने भी अपने योगदान में भारी कमी की है, जिनमें ब्रिटेन भी शामिल है. संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अब तक मिली सहायता 2025 की तुलना में 70% कम है.

गरीब अफ़गान काम के इंतज़ार में, जिसके मिलने की उम्मीद काफ़ी कम है

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देश के आधे से ज़्यादा प्रांतों को प्रभावित करने वाला भीषण सूखा हालात को और बदतर बना रहा है.

ग्रामीण अब्दुल मलिक कहते हैं, "हमें किसी से कोई मदद नहीं मिली- न सरकार से, न ही गैर-सरकारी संगठनों से."

कुपोषण की वजह से बढ़ी बाल मृत्यु दर

2021 में सत्ता में आने वाली तालिबान सरकार इसके लिए अफ़ग़ानिस्तान की पिछली सरकार को ज़िम्मेदार ठहराती है- जिसे विदेशी सेनाओं के देश छोड़ने के बाद सत्ता से हटा दिया गया था.

तालिबान सरकार के उप-प्रवक्ता हम्दुल्लाह फ़ित्रत बीबीसी से कहते हैं, "आक्रमण के 20 सालों के दौरान, अमेरिकी डॉलर के प्रवाह के कारण एक कृत्रिम अर्थव्यवस्था बनाई गई थी."

"आक्रमण के समाप्त होने के बाद हमें गरीबी, कठिनाइयां, बेरोज़गारी और अन्य समस्याएं विरासत में मिलीं."

हालांकि, दानदाता देशों के हाथ पीछे खींचने का एक प्रमुख कारण तालिबान की अपनी नीतियां भी हैं, ख़ासकर महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंध.

जब इस बारे में पूछा गया, तो तालिबान सरकार ने दानदाताओं के पीछे हटने के लिए किसी भी तरह ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया और कहा कि "मानवीय सहायता का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए."

फ़ित्रत ने यह भी कहा कि तालिबान "बड़ी आर्थिक परियोजनाओं को लागू करके गरीबी कम करने और रोज़गार पैदा करने" की योजना बना रहा है. इसके लिए उन्होंने कुछ बुनियादी ढांचा और खनन परियोजनाओं का उल्लेख भी किया.

नर्स फ़ातिमा कहती हैं कि बच्चों को मरते देखना उनके लिए लगभग सामान्य सा हो गया है

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लेकिन भले ही दीर्घकालिक परियोजनाएं किसी दिन मददगार साबित हों, यह साफ़ है कि लाखों लोग ऐसे हैं जो तत्काल सहायता के बिना ज़िंदा नहीं रह पाएंगे.

जैसे मोहम्मद हाशेम की 14 महीने की बच्ची, जिसकी कुछ सप्ताह पहले मौत हो गई.

वह कहते हैं, "मेरी बच्ची भूख और दवाइयों की कमी से मर गई… जब कोई बच्चा बीमार और भूखा होता है, तो साफ़ है कि वह मर जाएगा."

एक स्थानीय बुज़ुर्ग कहते हैं कि बाल मृत्यु दर पिछले दो वर्षों में "वास्तव में बहुत बढ़ गई है", ख़ासकर कुपोषण की वजह से.

हालांकि यहां मौतों का कोई औपचारिक रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. बच्चों की मौतों में बढ़ोतरी के सबूत सिर्फ कब्रिस्तान में ही मिलते हैं. और इसलिए हमने छोटी और बड़ी कब्रों को अलग-अलग गिना. ऐसा हमने पहले भी किया है. छोटी कब्रों की संख्या बड़ी कब्रों से लगभग दोगुनी थी- जिससे यह संकेत मिलता है कि मरने वाले बच्चों की संख्या वयस्कों से लगभग दोगुनी है.

चघचरान के मुख्य प्रांतीय अस्पताल में भी इसी तरह के और सबूत मिले.

'10% तक पहुंच जाती है मृत्यु दर, यह स्वीकार्य नहीं'

नवजात शिशु इकाई सबसे व्यस्त है. हर बिस्तर भरा हुआ है, कुछ पर दो-दो बच्चे हैं. इनमें से ज़्यादातर कम वज़न के हैं और अधिकतर को खुद सांस लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

एक नर्स एक छोटा-सा पालना लेकर आती है, जिसमें नवजात जुड़वां बच्चियां हैं. वे समय से दो महीने पहले पैदा हो गई थीं. एक का वज़न 2 किलो है, जबकि दूसरी का सिर्फ़ 1 किलो.

उनकी हालत गंभीर है. उन्हें तुरंत ऑक्सीजन पर रखा गया.

उनकी मां, 22 साल की शकीला, प्रसूति वार्ड में हैं.

जुड़वां बच्चियों की दादी गुलबदन बताती हैं, "वह कमज़ोर है क्योंकि गर्भ के दौरान उसके पास खाने के लिए लगभग कुछ भी नहीं था, सिर्फ़ रोटी और चाय. इसी वजह से बच्चियों की हालत ऐसी है."

उस दिन हमारे अस्पताल से निकलने के कुछ ही घंटों बाद, ज़्यादा वज़न वाली बच्ची की मौत हो गई, नामकरण होने से पहले ही.

समय से पहले पैदा हो गईं जुड़वा बच्चियां बमुश्किल सांस ले पा रही थीं

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अगले दिन उनकी दुखी दादी ने कहा, "डॉक्टरों ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन वह मर गई."

"मैंने उसके छोटे से शरीर को कपड़े में लपेटा और घर ले गई. जब उसकी मां को पता चला, तो वह बेहोश हो गई."

गुलबदन जीवित बची बच्ची की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, "मुझे बस उम्मीद है कि यह कम से कम बच जाए."

नर्स फ़ातिमा हुसैनी कहती हैं कि कुछ दिन तो तीन तक बच्चों की मौत हो जाती है.

वह कहती हैं, "शुरुआत में, जब मैं बच्चों को मरते देखती थी, तो मुझे बहुत मुश्किल होती थी. लेकिन अब यह हमारे लिए लगभग सामान्य सा हो गया है."

नवजात इकाई चलाने वाले डॉक्टर मोहम्मद मूसा ओलदात कहते हैं कि मृत्यु दर 10% तक पहुंच जाती है, जो 'स्वीकार्य नहीं है'.

वह कहते हैं, "लेकिन गरीबी की वजह से मरीज़ों की संख्या हर दिन बढ़ रही है. और यहां हमारे पास बच्चों का ठीक से इलाज करने के लिए पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं."

बाल चिकित्सा इंटेंसिव केयर यूनिट में, छह हफ्ते का ज़मीर मेनिन्जाइटिस और निमोनिया से जूझ रहा है. दोनों का इलाज संभव है, लेकिन डॉक्टरों को एमआरआई स्कैन करना होगा और उनके पास इसके लिए सही उपकरण नहीं हैं.

लेकिन शायद सबसे चौंकाने वाली बात जो डॉक्टर ने बताई, वह यह थी कि सरकारी अस्पताल में अधिकांश मरीज़ों के लिए दवाइयां नहीं थीं, और परिवारों को बाहर की दवा दुकानों से दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं.

फ़ातिमा कहती हैं, "कभी-कभी, अगर किसी संपन्न परिवार के बच्चे की दवाइयां बच जाती हैं, तो हम उन्हें उन बच्चों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिनके परिवार उन्हें खरीद नहीं सकते."

पैसों की कमी कई परिवारों को कठिन फ़ैसले लेने पर मजबूर कर रही है.

गुलबदन की जीवित पोती का वज़न थोड़ा बढ़ा और उसकी सांसें स्थिर हो गईं. लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसका परिवार उसे घर ले गया. वे उसे अस्पताल में रखने का ख़र्च नहीं उठा सकते थे.

ज़मीर को भी उसके माता-पिता इसी वजह से घर ले गए.

अब उनके नन्हे शरीरों को अपने दम पर ही ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करना होगा.

अतिरिक्त रिपोर्टिंग: इमोजेन एंडरसन, महफ़ूज़ ज़ुबैदे और संजय गांगुली

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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