बुज़ुर्ग आबादी वाले इस राज्य की कोशिश कि कोई बूढ़ा अकेला न रहे कितनी कामयाब

    • Author, निकिता यादव और अशरफ़ पदन्ना
    • पदनाम, दिल्ली और केरल
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

केरल में 70 वर्षीय टीओ डॉमिनिक ज़्यादातर अपने दिन की शुरुआत अपने बेटों में से किसी एक को फ़ोन करके करते हैं.

उनका एक बेटा पड़ोसी राज्य कर्नाटक में रहता है, दूसरा मध्य-पूर्व में. दोनों ही कुछ साल पहले बेहतर रोज़गार की तलाश में राज्य से बाहर चले गए थे. तब से उन्हें और उनकी पत्नी एमजे मार्था को अपनी ज़िम्मेदार ख़ुद ही उठानी पड़ती है.

ये फ़ोन कॉल्स सुकून देते हैं और उनमें अक्सर स्वास्थ्य और मौसम जैसी आम चीज़ों पर बात होती है. लेकिन जब घर पर मदद की ज़रूरत होती है, तो बेटे काम नहीं आते.

उन जैसी स्थिति अब केरल में आम होती जा रही है, जो भारत का सबसे तेज़ी से बूढ़ा होता राज्य है. यहाँ पलायन के कारण बड़ी संख्या में बुज़ुर्ग अकेले रह रहे हैं.

पिछले महीने राज्य सरकार ने बुज़ुर्गों के कल्याण के लिए एक अलग विभाग बनाने की घोषणा की. अधिकारियों का कहना है कि यह भारत में अपनी तरह का पहला विभाग है, जो वृद्ध आबादी की चुनौतियों से निपटने के लिए बनाया गया है.

डॉमिनिक कहते हैं, "हम पूरी तरह पड़ोसियों पर निर्भर हैं." उनका घर कभी बच्चों की चहचहाहट से भरा रहता था, लेकिन अब वह अक्सर वहां ख़ामोशी के बीच बैठे रहते हैं.

वह कहते हैं, "हमारे बच्चे बहुत कम आते हैं और आस-पास कोई रिश्तेदार भी नहीं है जो मदद कर सके. हालात दिन-ब-दिन मुश्किल होते जा रहे हैं."

उनके पास बैठी मार्था कहती हैं कि बुढ़ापे में अकेलापन अब ज़्यादा आम हो गया है.

यह उनकी अकेले की कहानी नहीं है.

'बुढ़ापा अब सिर्फ़ कल्याण का मुद्दा नहीं है'

पीढ़ियों से भारत में बुज़ुर्ग अपने बच्चों के साथ रहते आए हैं और उन्हीं पर देखभाल के लिए निर्भर रहा करते थे. लेकिन रोज़गार और शिक्षा के लिए पलायन ने इस परंपरा को धीरे-धीरे कमज़ोर कर दिया है, ख़ासकर केरल में. लेकिन भारत के इस सबसे तेज़ी से बूढ़े होते राज्य में सरकार इसका हल ढूंढने की कोशिश कर रही है.

नए विभाग के प्रमुख डॉक्टर रतन केलकर कहते हैं कि विभाग की रणनीति 'अपने घर में ही वृद्धावस्था बिताने' पर केंद्रित है यानी बुज़ुर्गों को बाहर संस्थानों में भेजने के बजाय उनके घरों और समुदायों में ही रहने में मदद करना.

इसकी योजनाओं में सामुदायिक और घर-आधारित देखभाल का विस्तार करना और 'सोशल प्रिस्क्राइबिंग' शुरू करना शामिल है - यानी बुज़ुर्गों को सार्थक सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना.

राज्य अब एक प्रमाणित देखभालकर्ता प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने, पेशेवर देखभालकर्मियों की टीम बनाने और बुज़ुर्गों के लिए पार्क, डे-केयर केंद्र और फ़िटनेस सुविधाएं तैयार करने की योजना बना रहा है. वरिष्ठ नागरिकों का एक राज्यव्यापी सर्वेक्षण दीर्घकालिक 'सिल्वर इकॉनमी' रोडमैप को दिशा देगा.

डॉक्टर केलकर कहते हैं, "बुढ़ापा अब सिर्फ़ कल्याण का मुद्दा नहीं रह गया है. यह स्वास्थ्य सेवा, आवास, परिवहन, स्थानीय प्रशासन, तकनीक, रोज़गार, सुरक्षा, वित्तीय सेवाओं और सामुदायिक जीवन - सबको प्रभावित करता है."

भारत के बड़े राज्यों में सबसे ज़्यादा बुज़ुर्ग केरल में हैं. भारतीय रिज़र्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2036 तक राज्य की 22.8% आबादी यानी कि हर चार में से लगभग एक व्यक्ति की उम्र 60 से अधिक होगी. इसके मुकाबले राष्ट्रीय औसत 14.9% रहेगा.

राज्य की वृद्ध आबादी सामाजिक प्रगति और पलायन दोनों को दर्शाती है.

बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, लंबी आयु और घटती जन्म दर ने इसे भारत के सबसे पुराने राज्यों में से एक बना दिया है. हालांकि पीढ़ियों से लोग काम के लिए अक्सर माता-पिता को पीछे छोड़कर मध्य-पूर्व, यूरोप और अन्य जगहों पर जाते रहे हैं,

'मैंने ख़ुद को बेहद लाचार महसूस किया'

प्रवासी आय ने आमदनी और जीवन स्तर को बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी आई है: अब ज़्यादा बुज़ुर्ग अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बच्चों से अलग रह रहे हैं.

और विदेश में रहने वालों के लिए यह दूरी भावनात्मक बोझ भी बन सकती है.

सिडनी में रहने वाले एक आईटी पेशेवर, जिनके माता-पिता केरल में अकेले रहते हैं, कहते हैं, "हालाँकि मैं नियमित रूप से घर पैसे भेजता हूँ, लेकिन सिर्फ़ आर्थिक मदद काफ़ी नहीं है. ज़रूरी मौकों पर शारीरिक रूप से मौजूद रहना, ख़ासकर मेडिकल इमरजेंसी में या भावनात्मक सहारा देने के लिए, एक ऐसी चीज़ है जिसे पैसे से नहीं बदला जा सकता."

जब उनके माता-पिता बीमार थे, तो उन्हें हज़ारों किलोमीटर दूर से फ़ोन और वीडियो कॉल्स पर ही निर्भर रहना पड़ा. वह कहते हैं, "मैंने खुद को बेहद लाचार महसूस किया."

यही वह चुनौती है जिससे निपटने की कोशिश अब केरल सरकार कर रही है.

डॉक्टर केलकर कहते हैं कि राज्य शून्य से शुरुआत नहीं कर रहा है. पेंशन, वयोमित्रम् योजना और अन्य कल्याण योजनाएँ पहले से मौजूद हैं. वह कहते हैं कि कमी बस इन सबको एक साथ लाने वाला एकीकृत तंत्र की थी.

वयोमित्रम् योजना एक व्यापक रूप से अध्ययन किया गया समुदाय आधारित उपशामक देखभाल तंत्र (पैलिएटिव केयर सिस्टम) है.

वह कहते हैं, "कोई एक संस्थागत व्यवस्था नहीं थी जो इन सभी क्षेत्रों को जोड़ने, कमियों की पहचान करने, समन्वय बनाने और भविष्य की योजना बनाने की ज़िम्मेदारी ले."

लेकिन वह यह भी मानते हैं कि केवल ढाँचा और सेवाएँ ही बुढ़ापे की सभी चुनौतियों का हल नहीं कर सकतीं.

"अकेलापन और सामाजिक अलगाव केरल में बुढ़ापे की मुख्य चुनौतियों में से एक बन गए हैं."

इसे दूर करने के लिए विभाग स्वयंसेवी नेटवर्क और सामुदायिक कार्यक्रमों की संभावनाएँ तलाश रहा है, ताकि बुज़ुर्गों में अलगाव को कम किया जा सके.

"हमारा सोचना यह है कि केरल में कोई भी बुज़ुर्ग परित्यक्त या ऐसा न महसूस करें कि उन्हें कोई देख ही नहीं रहा है, चाहे उनके बच्चे कहीं भी रहते हों."

10 करोड़ रुपये आवंटित, महज़ प्रतीकात्मक?

डॉक्टरों का कहना है कि अकेले बुढ़ापा बिताने का डर अब पूरे देश में आम होता जा रहा है.

दिल्ली के अपोलो अस्पताल में जेरियाट्रिक्स यूनिट के प्रमुख डॉक्टर प्रसून चटर्जी कहते हैं, "मेरे मरीज़ पूछते हैं - अगर उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़े, तो उनकी देखभाल कौन करेगा?"

कुछ अन्य लोग और तात्कालिक चिंता जताते हैं - अगर वे आधी रात को बीमार पड़ जाएँ, तो उन्हें अस्पताल कौन ले जाएगा.

उनके कई मरीज़ जीवनसाथी को खोने या बच्चों के दूर चले जाने के बाद अकेले रहते हैं.

डॉक्टर चटर्जी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ी कमी की ओर भी इशारा करते हैं: जेरियाट्रिक विशेषज्ञों की संख्या बहुत कम है, और कई बुज़ुर्ग अब भी ऐसी सेवाओं पर निर्भर हैं जो उनकी ज़रूरतों के लिए बनी ही नहीं हैं.

वह कहते हैं कि ज़रूरत एक व्यापक सहयोगी नेटवर्क की है जिसमें डे-केयर सेंटर्स और सामुदायिक स्थलों से लेकर सुलभ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और बुज़ुर्गों के लिए सामाजिक रूप से जुड़े रहने के अवसर हों.

वह कहते हैं, "कोई एक विभाग यह सब नहीं कर सकता."

इन योजनाओं के साथ-साथ यह सवाल भी बना हुआ है कि क्या केरल का नया विभाग अपनी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप संसाधन जुटा पाएगा.

राज्य ने इस साल बुज़ुर्ग कल्याण के लिए 10 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जिसे कुछ लोग महज़ प्रतीकात्मक बताते हैं.

डॉक्टर केलकर कहते हैं कि यह फंडिंग समन्वय क्षमता बनाने, पायलट प्रोजेक्ट्स को समर्थन देने और दीर्घकालिक प्रतिक्रिया के लिए ज़रूरी डेटा सिस्टम विकसित करने के लिए है.

वह आगे कहते हैं, "सरकार बुढ़ापे को अल्पकालिक परियोजना नहीं बल्कि दीर्घकालिक विकास प्राथमिकता मानती है."

सीनियर केयर के लिए क्या हैं मानक

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नीति-निर्णय पर्याप्त नहीं हैं. वो निजी क्षेत्र की भागीदारी और स्वीकार्यता की ज़रूरत की ओर इशारा करते हैं.

अतुल्य सीनियरकेयर कई राज्यों में बुजुर्गों के रहने की संस्थाएं चलाती है. उसके सीईओ श्रीनिवासन गोविंदराज कहते हैं, "सीनियर केयर के लिए अब भी कोई ठीक से रेगुलेटेड बाज़ार नहीं है. कई छोटे खिलाड़ी हैं, लेकिन कोई समान मानक या गुणवत्ता मापदंड नहीं है."

वह कहते हैं कि केरल की वृद्ध आबादी को केवल कल्याण योजनाओं की नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद और विनियमित देखभाल तंत्र की ज़रूरत होगी, जो उन परिवारों का सहारा बन सके जो निजी संस्थाओं का खर्च वहन नहीं कर सकते.

82 वर्षीय रिटायर्ड वैज्ञानिक एमएसआर देव के लिए सवाल कुछ और सरल है, क्या बुज़ुर्ग लोग अपने आसपास की दुनिया से जुड़े रह पाएँगे.

वह मानते हैं कि केरल स्वीडन जैसे देशों से सबक ले सकता है, जहाँ सामुदायिक सहयोग तंत्र बुज़ुर्गों को सक्रिय और स्वतंत्र बनाए रखने में मदद करता है.

वह कहते हैं, "संचार बेहद ज़रूरी है.

सिर्फ़ भोजन या स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं. सामाजिक प्राणी होने के नाते लोगों को जुड़ने की जगह चाहिए."

अपने घर में डॉमिनिक और मार्था नीति के इंतज़ार में नहीं बैठे हैं. वे हमेशा की तरह पड़ोसियों पर निर्भर हैं.

मार्था कहती हैं कि उनकी चाहत जटिल नहीं है कि कोई ऐसा हो जिसे फ़ोन किया जा सके और जो सचमुच आ सके.

केरल जैसे राज्य में जहाँ परिवार अक्सर महासागरों और टाइम-ज़ोन्स से अलग हो जाते हैं, राज्य का नया विभाग यह सब कर पाएगा या नहीं, यह देखना अभी बाकी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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