नेपाल में किस वजह से आई विनाशकारी बाढ़, वैज्ञानिकों ने क्या बताया?

लैंगटांग लिरुंग चोटी का एक मनोरम दृश्य. बर्फ से ढकी चोटी साफ नीले आसमान के नीचे दिखाई दे रही है.
इमेज कैप्शन, वैज्ञानिकों का कहना है कि लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास एक ग्लेशियर के टूटने से यह आपदा आई होगी
    • Author, टेसा वोंग
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

नेपाल और तिब्बत के सीमांत इलाक़े में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर टूटने को एक बड़ी वजह बताया है.

वैज्ञानिकों ने बीबीसी को बताया कि शुरुआती जांच पता चला है कि ग्लेशियर टूटने से बर्फ़ तेजी से पिघली होगी.

शुरुआती रिपोर्टों के कारण कई लोगों का मानना था कि एक भूकंप के कारण भूस्खलन हुआ था. हालांकि, यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने बाद में स्पष्ट किया कि यह आपदा 'हिमनद के एक हिस्से के टूटने' के कारण हुई.

यूएसजीएस के आंकड़ों और घटना का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक़, एक विशाल ग्लेशियर के घाटी की तलहटी से टकराने का असर 5.2 तीव्रता वाले भूकंप जितना था.

डंडी विश्वविद्यालय में ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. साइमन कुक ने बीबीसी को बताया कि उनकी टीम ने पता लगाया है कि नेपाल में लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास एक ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूट गया. यह बाढ़ वाली जगह से लगभग 15 किलोमीटर पश्चिम में है.

उन्होंने अनुमान लगाया कि ग्लेशियर उत्तर-पश्चिम दिशा में टूटा और फिर पश्चिम की ओर नदी के बहाव में गिर पड़ा.

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बर्फ़ और चट्टानों का बड़ी मात्रा में मलबा नदी में गिरा

इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के एक विश्लेषण के मुताबिक़, ये शायद आईस-रॉक के मिश्रण का एवलांच था.

इसके कारण बर्फ़ और चट्टानों का बड़ी मात्रा में मलबा भोटेकोशी नदी की सहायक नदी लेंडे खोला में गिर गया. इसके बाद नदी में अचानक बाढ़ आ गई. नदी का पानी गाद और बड़े-बड़े पत्थरों को बहाकर नीचे की ओर ले गया.

आईसीआईएमओडी ने पाया कि निचले इलाकों में नदियों का जलस्तर आधे घंटे के अंदर सात से नौ मीटर तक बढ़ गया और कई जल निगरानी केंद्र तक बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए.

ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में अर्थ साइंस के प्रोफ़ेसर माइक सर्ल ने कहा कि भूस्खलन से लेकर बाढ़ तक की यह पूरी प्रक्रिया घंटों या यहां तक कि कई दिनों तक चल सकती थी.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मलबे के विशाल सैलाब से पता चलता है कि पहले भूस्खलन हुआ होगा, पानी जमा हुआ होगा, नदी पर बांध बन गया होगा, और फिर एक भीषण बाढ़ के रूप में वह फूट पड़ा होगा."

क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ने भी बाढ़ को और अधिक गंभीर बना दिया.

सर्ल ने बताया कि लैंगटांग लिरुंग ऊंचे हिमालय की चोटी पर स्थित है और पहाड़ के दोनों ओर 'बेहद खड़ी घाटियां' हैं, जिनसे पानी तेज़ गति से बह सकता था.

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भूगर्भीय हलचल की कितनी बड़ी भूमिका

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बुधवार को ग्लेशियर के ढहने का कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है.

सर्ल ने कहा कि हिमालय के बाकी हिस्सों की तरह, लैंगटांग लिरुंग लंबे समय से टेक्टोनिक (भूगर्भीय) हलचल के कारण धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है.

टेक्टोनिक हलचल में एक प्लेट दूसरी प्लेट को ऊपर धकेल रही है. उनके अनुसार, "यह ऐसा है जैसे कार के नीचे जैक लगाकर उसे ऊपर उठाना."

"जैसे-जैसे पहाड़ ऊपर उठता है, ग्लेशियर और भी अधिक ढलान वाला होता जाता है, और यह निश्चित है कि इसके कुछ हिस्से टूटकर गिर जाएं."

उन्होंने कहा कि लेकिन आमतौर पर ये छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं जो नदियों को अस्थायी रूप से रोकते हैं और बाद में आसानी से बह जाते हैं.

हालांकि, इस आपदा में, पूरा ग्लेशियर एक ही झटके में टूट गया लगता है, जिसे सर्ल ने 'बहुत असामान्य' बताया.

वो कहते हैं, "ऐसी बाढ़ अक्सर आती रहती है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नहीं."

उन्होंने कहा कि बुधवार की घटना शायद 'दो अलग-अलग प्रक्रियाओं' के कारण हुई.

पहला, हिमालय के ऊपर उठने में टेक्टोनिक हलचल और दूसरा, बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने के साथ जलवायु परिवर्तन की भी भूमिका रही होगी.

"ये सभी फ़ैक्टर मिलकर उन विनाशकारी आपदाओं को जन्म दे रहे हैं जिन्हें हम अब नियमित रूप से देख रहे हैं."

वैज्ञानिक, सालों से जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में बर्फ़ और पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी जमी हुई मिट्टी) के पिघलने की चेतावनी देते रहे हैं.

इस साल की शुरुआत में आईसीआईएमओडी ने एक विश्लेषण में पाया कि हिंदूकुश के ग्लेशियरों से अब साल 2000 की तुलना में दोगुनी रफ़्तार से बर्फ़ हट रही है. इससे बाढ़ जैसे ख़तरे और भी बढ़ जाते हैं.

डॉ. कुक ने बताया कि हाल के सालों में भारत, स्विट्जरलैंड और इटली में ग्लेशियरों के टूटने से बाढ़ और भूस्खलन की ऐसी ही घटनाएं हुई हैं.

साल 2021 में, उत्तर भारत की चमोली घाटी में हिमालयी ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूट गया, जिससे मलबे और पानी का सैलाब उमड़ पड़ा. इस घटना में लगभग 200 लोगों की मौत हो गई.

वैज्ञानिकों ने बाद में अनुमान लगाया कि इस हिमखंड के ढहने का असर '15 परमाणु बमों' के बराबर था.

नेपाल में भी पिछले साल तिब्बत में एक हिमनद झील के फटने के कारण बाढ़ आई थी.

जलवायु परिवर्तन का असर

नेपाल बाड़
इमेज कैप्शन, बुधवार को नेपाल के नुवाकोट ज़िले में त्रिशूली और तादी नदियों के संगम पर अचानक आई बाढ़ के बाद का मंज़र

आईसीआईएमओडी के विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक़ आज़म ने कहा, "क्रायोस्फीयर (पृथ्वी के जमे हुए हिस्सों) में ख़तरों का बार बार आना 'पहले से कहीं अधिक हो रहा है. बदलाव की गति बहुत तेज़ है."

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि कोई एक घटना जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है या नहीं.

डॉ. कुक ने कहा, "जब आप इन घटनाओं के पैटर्न को देखते हैं, तो आपको लगता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हो सकता है."

"तर्क यह है कि पृथ्वी के गर्म होने से बर्फ़ पिघलेगी और ग्लेशियर सिकुड़ेंगे. कुछ पर्वतों को आंशिक रूप से थामे रखने वाली पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी मिट्टी) गर्म हो रही है, पिघल रही है और ख़राब हो रही है."

"इसलिए आपको अधिक भूस्खलन, मलबे का सैलाब, हिमनदों का पिघलना, झीलों का फटना, हिमनदों के टूटने जैसी घटनाएं देखने को मिलेंगी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन अंततः इन उच्च पर्वतीय इलाकों को अस्थिर कर देता है."

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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