नेपाल के पीएम शाह हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए भारत और चीन को साथ ला पाएंगे?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत, चीन और नेपाल के नेतृत्व में 'हिमालयी जलवायु संकट से निपटने की साझा व्यवस्था' बनाने का प्रस्ताव दिया है.
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    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हाल में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दिया.

इस भाषण का बड़ा हिस्सा बीते अगस्त में नेपाल में आई मलबे से भरी विनाशकारी बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र पर मंडरा रहे आपदाओं के ख़तरों पर था.

लेकिन उनके भाषण की एक बात ने भारत सहित दुनिया के मीडिया का ख़ास ध्यान खींचा.

उन्होंने भारत, चीन और नेपाल के नेतृत्व में 'हिमालयी जलवायु संकट से निपटने की साझा व्यवस्था' बनाने का प्रस्ताव दिया.

'सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी साझा करें'

नेपाल के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह विचार अभी शुरुआती दौर में है.
इमेज कैप्शन, नेपाल के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह विचार अभी शुरुआती दौर में है

उन्होंने कहा, "इस व्यवस्था के ज़रिए हम सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी और अपनी विशेषज्ञता साझा करें. ख़तरनाक हिमनद झीलों पर नज़र रखें और मिलकर चेतावनी व्यवस्था इस तरह मज़बूत बनाएं, जो आपदा आने से पहले लोगों को आगाह कर सके."

"जब कोई आपदा आए तो हम सीमाओं के आर-पार मदद पहुंचाने में आपसी तालमेल बनाएं."

उन्होंने कहा, "हिमालय ऐसी सीमा न बने, जहां जानकारी अलग-अलग टुकड़ों में बंटी हो. इसके बजाय उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनाया जाए."

नेपाल के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह विचार अभी शुरुआती दौर में है.

अधिकारी ने कहा, "प्रधानमंत्री के प्रस्ताव ने एक राजनीतिक दिशा दी है. हमारा मंत्रालय दूसरी संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर एक शुरुआती योजना तैयार कर रहा है. इसके आधार पर तीनों देशों के बीच साझा समझ बनाई जा सकती है."

भारत और चीन की ओर से इस प्रस्ताव पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. बीबीसी ने प्रतिक्रिया के लिए दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों से संपर्क किया है.

क्या नेपाल, भारत-चीन को सचमुच साथ ला पाएगा?

भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र में क़रीब 3,500 किलोमीटर यानी 2,174 मील लंबी सीमा है.
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इन सारी बातों के बीच सवाल ये है कि क्या नेपाल हिमालय से जुड़े किसी मुद्दे पर भारत और चीन को सचमुच साथ ला सकता है?

ख़ासकर तब, जब हिमालय के कुछ हिस्सों को लेकर इन दोनों बड़ी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच कड़ा विवाद है.

भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र में क़रीब 3,500 किलोमीटर यानी 2,174 मील लंबी सीमा है. इसे वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी कहा जाता है.

इलाक़ों को लेकर चले आ रहे विवाद के कारण दोनों देश युद्ध लड़ चुके हैं. उनके सैनिकों के बीच जानलेवा झड़पें हुई हैं और कई बार दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ चुकी हैं.

लेकिन हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी एक और बड़ी समस्या है. यह इलाक़ा दुनिया के औसत के मुक़ाबले दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहा है.

इस वजह से हमेशा जमी रहने वाली ज़मीन और ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं. इसके कारण ग्लेशियर टूटने, पहाड़ी ढलान खिसकने, चट्टानें और बर्फ़ गिरने और ग्लेशियरों से बनी झीलें फटने जैसी जानलेवा आपदाएं आ रही हैं.

इन आपदाओं से पहाड़ों के नीचे बसे इलाक़ों में बहुत बड़ा नुक़सान हो सकता है.

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मार्च में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर पहले से ज़्यादा तेज़ी से पिघल रहे हैं. साल 2000 के बाद से वहां बर्फ़ घटने की रफ़्तार दोगुनी हो गई है.

चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ के इंस्टीट्यूट ऑफ़ माउंटेन हैज़र्ड्स एंड एनवायरनमेंट के निदेशक कांग शिचांग ने पीपल्स डेली ऑनलाइन से कहा कि पिछले 60 साल में छिंगहाई-तिब्बत के पठार पर ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 24 फ़ीसदी कम हो गया है.

ग्लेशियरों की संख्या या उनका आकार घटने पर आमतौर पर ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों की संख्या बढ़ती है. इसकी वजह ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना है.

इनमें से कुछ झीलें ख़तरनाक स्तर तक बड़ी हो जाती हैं. इनके फटने से बाढ़ आ सकती है, जो कई बार सीमा पार करके नेपाल, भारत या भूटान तक पहुंच जाती है.

इन देशों की कई नदियों को ग्लेशियरों से पानी मिलता है और वे तिब्बत से निकलती हैं. पीपल्स डेली के मुताबिक़, छिंगहाई-तिब्बत के पठार पर अब 14 हज़ार से ज़्यादा हिमनद झीलें हैं.

ये झीलें कुल मिलाकर 1,100 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा क्षेत्र में फैली हैं. अमेरिकन जियोफ़िज़िकल यूनियन की ओर से 2024 में प्रकाशित एक दूसरे अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि आने वाले दशकों में हिमालय और तिब्बत में भूस्खलन का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाएगा.

अध्ययन में कहा गया, "जिन इलाक़ों में ख़तरा पहले से ज़्यादा है, वहां कुल बढ़ोतरी सबसे अधिक होगी."

"इनमें मध्य हिमालय, भारत के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र और नेपाल के इलाक़े शामिल हैं. लेकिन मौजूदा स्थिति के मुक़ाबले सबसे बड़ा बदलाव तिब्बत के पठार पर दिखाई देगा."

क्या इन ख़तरों के आधार पर नेपाल, भारत और चीन को साथ आने के लिए मना सकता है?

साल 2009 में भारत और चीन ने हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर का मिलकर अध्ययन करने का फ़ैसला किया था
इमेज कैप्शन, साल 2009 में भारत और चीन ने हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर का मिलकर अध्ययन करने का फ़ैसला किया था

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं में दोनों एशियाई देश पश्चिमी देशों के सामने एक साथ खड़े हुए हैं. भारत और चीन का कहना रहा है कि उन्हें विकास करने का अधिकार है.

दोनों देशों का यह भी कहना है कि उनसे उस स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, जिस स्तर पर विकसित देशों को अपना उत्सर्जन कम करने की ज़रूरत है.

लेकिन जिस हिमालयी क्षेत्र में भारत और चीन की सीमा मिलती है, वहां जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच लगभग कोई सहयोग नहीं है.

साल 2009 में दोनों देशों ने हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर का मिलकर अध्ययन करने का फ़ैसला किया था.

उस समय बीजिंग की यात्रा से लौटने के बाद तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि इस साझा अध्ययन की ज़िम्मेदारी दो संस्थानों को दी गई है.

इनमें भारत का वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी और चीन का कोल्ड एंड एरिड रीजंस एनवायरनमेंटल एंड इंजीनियरिंग रिसर्च शामिल थे.

लेकिन अधिकारियों के मुताबिक़, यह योजना जल्द ही ठंडी पड़ गई.

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी में ग्लेशियरों के अध्ययन से जुड़े कार्यक्रम का नेतृत्व कर चुके रिटायर्ड ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉक्टर डीपी डोभाल ने कहा, "हमारी और चीन की टीम के बीच एक बैठक हुई थी. बस उतना ही हुआ. उससे कुछ निकलकर सामने नहीं आया."

उन्होंने कहा, "उसके बाद क्या हुआ, यह कोई नहीं जानता." उस समय भी दोनों देशों के बीच शक काफ़ी गहरा था.

'हाल में हुए बदलाव कुछ उम्मीद तो जगाते हैं'

नेपाल में आई बाढ़ की भयावह तस्वीर (फ़ाइल फ़ोटो)
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फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने उस समय मंत्री जयराम रमेश के हवाले से कहा था, "भारत, चीन के वैज्ञानिकों को अपने सभी ग्लेशियरों पर घूमने की अनुमति नहीं देगा."

भारत और चीन के बीच साल 2000 के दशक की शुरुआत से कम से कम दो समझौते मौजूद थे.

इन समझौतों के तहत बाढ़ के मौसम में सीमा पार बहने वाली ब्रह्मपुत्र और सतलुज नदियों के पानी के बहाव और स्तर से जुड़ी जानकारी साझा की जाती थी.

लेकिन अब दोनों समझौतों की समय-सीमा ख़त्म हो चुकी है.

विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह के मुताबिक़, चीन ने दोनों नदियों के पानी से जुड़े आंकड़े देना बंद कर दिया है.

उन्होंने अगस्त 2025 में राज्यसभा को बताया था, "सरकार ने चीन के साथ कई द्विपक्षीय बैठकों में सीमा पार बहने वाली नदियों पर सहयोग की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है."

"इसमें चीन की ओर से पानी से जुड़ी जानकारी दोबारा दिए जाने का मुद्दा भी शामिल है."

कुछ जानकारों का कहना है कि भारत और चीन के बीच हाल में हुए कुछ बदलाव उम्मीद जगाते हैं.

इनमें दोनों देशों के बड़े राजनीतिक नेताओं के बीच बातचीत, सीमा पार व्यापार दोबारा शुरू होना और हिमालय से होकर गुज़रने वाले अहम व्यापारिक रास्तों का फिर खुलना शामिल है.

'चीन अपनी तरफ़ से सावधानी बरतेगा'

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में उत्तर-पूर्वी एशिया के वरिष्ठ विश्लेषक विलियम यांग कहते हैं, "इन बदलावों से संकेत मिलता है कि तीनों देशों के लिए जलवायु से जुड़े सहयोग की संभावनाएं तलाशने की कुछ और गुंजाइश बन सकती है."

लेकिन वह कहते हैं कि रिश्तों में नरमी आने के बावजूद हिमालयी क्षेत्र में भारत और नेपाल के साथ किसी बड़े समझौते को लेकर चीन सावधानी बरतेगा.

उनके मुताबिक़, इसकी वजह यह है कि सीमा विवाद से पैदा हुआ तनाव अब भी ख़त्म नहीं हुआ है.

इसलिए तीनों देशों के बीच सहयोग की किसी व्यवस्था को लागू करने के लिए इस तनाव को बहुत सावधानी से संभालना होगा.

दुनिया के सबसे पुराने रक्षा और सुरक्षा थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट के इंडो-पैसिफ़िक कार्यक्रम से जुड़े वॉल्टर लैडविग भी इस राय से सहमत हैं.

वह कहते हैं कि जलवायु से जुड़े ख़तरों से निपटने के लिए आंकड़े साझा करने को केवल वैज्ञानिक जानकारी के लेन-देन के रूप में नहीं देखा जाता.

वह कहते हैं, "जलवायु वैज्ञानिक जिस जानकारी को शोध के लिए बेहद ज़रूरी मान सकते हैं, वही जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लोगों को रणनीतिक ख़ुफ़िया जानकारी जैसी लग सकती है."

"ख़ासकर ऐसे माहौल में, जहां विवादित सीमा के दोनों ओर दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने तैनात हों."

'इन आंकड़ों का दो तरह से इस्तेमाल हो सकता है'

'विस्तृत नक़्शे, सैटेलाइट तस्वीरें, दूर से जानकारी जुटाने वाली तकनीक से मिले आंकड़े और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल सही कामों के लिए हो सकता है. लेकिन यही जानकारी सेना के काम भी आ सकती है.'

इस तरह की मुश्किलों के कारण पहले भी सीमा पार होने वाली हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की कोशिशों में रुकावट आई है.

काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईएमओडी तीन दशक से ज़्यादा समय से क्षेत्र के देशों को ऐसे मुद्दों पर साथ लाने की कोशिश कर रहा है.

इन मुद्दों में बाढ़ आने से पहले चेतावनी देने की व्यवस्था बनाना भी शामिल है. लेकिन यह काम आसान नहीं रहा है.

आईसीआईएमओडी में कई साल तक वरिष्ठ विशेषज्ञ के रूप में काम कर चुके अरुण भक्त श्रेष्ठ ने कहा, "सीमा पार मामलों में कुछ मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं."

"इनमें नदियों के बहाव से जुड़ी पूरी जानकारी शामिल है. देश, ख़ासकर नदी के ऊपरी हिस्से वाले देश, शायद इसे साझा नहीं करना चाहेंगे."

"इसलिए हमें ऐसे मुद्दों को छोड़ना होगा और उस जानकारी पर ध्यान देना होगा, जो हिमालयी क्षेत्र में संभावित आपदाओं के ख़तरों के बारे में देशों के पास पहले से मौजूद है."

जानकार कहते हैं कि इस पहल के लिए नेपाल को शुरुआत बहुत छोटे स्तर से करनी होगी.
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आरयूएसआई के वॉल्टर लैडविग भी इससे सहमत हैं.

वह कहते हैं, "मेरे ख़याल से सबसे अहम सवाल यह है कि क्या पर्यावरण के लिए उपयोगी वैज्ञानिक जानकारी की ऐसी श्रेणियां हैं, जिनके बारे में दूसरे देश को यह न लगे कि उनका इस्तेमाल सैन्य फ़ायदे के लिए किया जा सकता है."

"इसलिए शायद शुरुआत बहुत छोटे स्तर से करनी होगी."

"सबसे पहले ऐसी सामान्य जानकारी साझा करनी होगी, जिससे किसी तरह का ख़तरा पैदा होने की आशंका सबसे कम हो."

"नेपाल के शामिल होने से मदद मिल सकती है. इससे भारत और चीन एक साथ काम कर पाएंगे और दोनों में से किसी सरकार को सार्वजनिक रूप से यह नहीं लगेगा कि उसने दूसरे के सामने रणनीतिक रियायत दी है."

सवाल यह है कि क्या भारत और चीन भी इसी तरह सोचेंगे?

और अगर वे इसके लिए तैयार हो भी गए, तो क्या नेपाल दोनों देशों के बीच अपनी भूमिका असरदार तरीक़े से निभा पाएगा?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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