मक्का समझौता: अरब मीडिया क्या लिख रहा है, मिस्र के न होने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
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मध्य पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर अरब मीडिया ने अलग-अलग तरीक़े से कवरेज की है.
सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इसी शुक्रवार, 7 अगस्त को एक शिखर बैठक की और 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए.
कई मीडिया आउटलेट्स ने इसे मध्य पूर्व के शक्ति संतुलन में नया मोड़ बताया है तो कुछ ने इस्लामिक नेटो की संभावना की ओर इशारा किया है. लेकिन मिस्र के इस त्रिपक्षीय समझौते में शामिल न होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
सऊदी और क़तर के प्रमुख चैनल अल अरबिया और अल जज़ीरा ने इस समझौते को विस्तृत लाइव कवरेज दी है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के मीडिया संस्थानों ने इस ख़बर को सीमित महत्व दिया.
इस समझौते से एक सप्ताह पहले पाकिस्तान ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट, लाल सागर और अदन की खाड़ी से गुज़रने वाले समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए सऊदी नेतृत्व वाले बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन का समर्थन किया था.
पिछले महीने 30 जुलाई को सऊदी अरब ने लाल सागर में समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा के लिए एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की योजना की घोषणा की थी. ये घोषणा ऐसे समय की गई जब यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी जहाज़ों पर हमले किए.
उस समय सरकारी टेलीविज़न ने ज़ोर देकर कहा कि यह गठबंधन 'पूरी तरह रक्षात्मक' होगा, जबकि विश्लेषकों का मानना है कि यह समुद्री ख़तरों के ख़िलाफ़ प्रभावी डिटरेंस (प्रतिरोध) की भूमिका निभा सकता है.
सऊदी अरब हूती हमलों के बाद नौसैनिक गठबंधन की योजना बना रहा था.
त्रिपक्षीय समझौते का क्या है संदेश
अल जज़ीरा से बातचीत में सऊदी राजनीतिक विश्लेषक ख़ालिद बातरफ़ी ने कहा कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है, लेकिन यह किसी भी आक्रमण का जवाब देगा, ख़ासकर अगर वह ईरान या इसराइल की तरफ़ से हो.
उन्होंने ईरान को सावधान रहने की चेतावनी भी दी, अगर वह इन तीनों देशों में से किसी पर हमला करने की योजना बना रहा है.
तुर्की के शोधकर्ता मुस्तफ़ा जिनार ने भी कहा कि यह समझौता मध्य पूर्व के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है.
सैन्य विश्लेषक फ़ैसल अल-हमद ने अल अरबिया से कहा कि यह समझौता "एक संदेश है कि यह पूरी तरह रक्षात्मक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करना है."
उन्होंने यह भी कहा कि यह गठबंधन किसी विशेष क्षेत्रीय घटना के जवाब के तौर पर नहीं बनाया गया है.
राजनीतिक शोधकर्ता मुस्तफ़ा शलाश ने कहा कि यह एक रणनीतिक समझौता है, जो तीनों देशों को एक-दूसरे की क्षमताओं का पूरक बनने में मदद करेगा.
अल अरबिया के सहयोगी चैनल अल हदथ ने सऊदी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से कहा कि मक्का समझौते का परमाणु हथियार हासिल करने या किसी सांप्रदायिक गठबंधन बनाने की कोशिशों से कोई संबंध नहीं है.

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'इस्लामी नेटो'
क़तर स्थित अल अरब टीवी के पाकिस्तान संवाददाता ने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से कई मुस्लिम देशों को एक ही सैन्य छतरी के नीचे लाने की इच्छा रखता रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक मुनीफ़ अम्माश ने 6 अगस्त को सऊदी अल अरबिया एफ़एम रेडियो से कहा कि यह रक्षा समझौता 'मौजूदा क्षेत्रीय व्यवस्था के बीच एक नए क्षेत्रीय ढांचे की नींव' बन सकता है.
उन्होंने कहा, "सऊदी अरब क्षेत्र में ईरान समर्थित मिलिशिया के साथ नए नियम तय कर रहा है."
मिस्र के सऊदी समर्थक पत्रकार जमाल सुल्तान, एक्स पर जिनके 7.23 लाख फ़ॉलोअर्स है, उन्होंने लिखा कि यह "एक ऐतिहासिक घटना है... दुनिया जेद्दा में 'एक इस्लामी नेटो' के जन्म की गवाह बन सकती है."
इराक़ी शोधकर्ता लिक़ा मक्की ने 6 अगस्त को अल जज़ीरा के "डिस्कशन ऑफ़ द ऑवर" कार्यक्रम में कहा कि यह शिखर सम्मेलन एक नए गठबंधन की शुरुआत हो सकता है, जिसमें आगे चलकर सीरिया, क़तर और संभवतः कुवैत भी शामिल हो सकते हैं.
लंदन से प्रकाशित अरब राष्ट्रवादी अख़बार अल-कुद्स अल-अरबी ने 7 अगस्त के अपने संपादकीय में सवाल उठाया कि "क्या सऊदी गठबंधन हूती गतिविधियों को नियंत्रित करने में सफल होंगे?" इसमें ईरान समर्थित यमनी समूह का ज़िक्र किया गया है.
यूएई मीडिया में चुप्पी
स्काई न्यूज़ अरबिया और लेबनानी प्रबंधन वाले अल मशहद टीवी सहित प्रमुख अमीराती मीडिया संस्थानों ने 7 अगस्त को इस समझौते को सीमित महत्व दिया.
स्काई न्यूज़ अरबिया ने हस्ताक्षर समारोह का लाइव प्रसारण नहीं किया. उसने लगभग दो घंटे बाद अपने समाचार बुलेटिन में इस ख़बर को प्रसारित किया.
अल मशहद ने भी समारोह का लाइव कवरेज नहीं किया और अगले बुलेटिन में इस ख़बर को नज़रअंदाज़ कर दिया. बाद में उसने अपनी वेबसाइट पर केवल एक संक्षिप्त तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की.
अल-ऐन और एरेम न्यूज़ जैसी प्रमुख अमीराती वेबसाइटों ने भी इस समझौते पर कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की.

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मिस्र की ग़ैर-मौजूदगी पर बहस
मिस्र के सरकारी चैनल अल-काहिरा न्यूज़ टीवी ने 7 अगस्त की दोपहर की ख़बरों में इस समझौते को प्रमुखता दी, जबकि विपक्षी विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि मिस्र इस गठबंधन का हिस्सा क्यों नहीं बना.
मोहम्मद अब्बास ने कहा कि इस समय मिस्र का इसमें शामिल न होना 'तार्किक' है, जबकि तुर्की स्थित रक्षा विशेषज्ञ मोअमेन अशरफ़ ने इसे 'स्पष्ट कूटनीतिक विफलता' बताया.
अमेरिका में रहने वाले पत्रकार मोहम्मद शुहूद ने फ़ेसबुक पर लिखा कि हस्ताक्षर समारोह में मिस्र की ग़ैर-मौजूदगी का यह मतलब नहीं है कि भविष्य में उसके शामिल होने के रास्ते बंद हो गए हैं.
लेखक याहिया अल-गेबाली ने इस समझौते को 'एक ऐतिहासिक घटना और नया गठबंधन बताया, जो मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बदल देगा... और जिसका संदेश केवल क्षेत्र के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है.'
दूसरी ओर, ब्रिटेन में रहने वाले पत्रकार अब्देलमोनेम महमूद ने सवाल उठाया कि यह गठबंधन कितना व्यावहारिक है और क्या यह लंबे समय तक टिक पाएगा?
टिप्पणीकार अब्दो फ़ायद ने इस समझौते के महत्व को कम करके आंकते हुए इसे 'ईरान को डराने के लिए सुरक्षा सरपरस्त खोजने की सऊदी कोशिश' बताया.
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