महिलाओं को अपने निजी अंगों पर शर्म करने के लिए किसने मजबूर किया?

महिला
इमेज कैप्शन, महिलाओं के निजी अंगों को प्रजनन क्षमता का प्रतीक समझा जाता था लेकिन बाद में यह शर्म का प्रतीक बन गया
    • Author, बीबीसी अफ़्रीका
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

हज़ारों साल से इंसान महिलाओं के बाहरी जननांग या वल्वा के बारे में बात करते आए हैं.

शुरुआत में, शरीर के इस हिस्से को प्रजनन क्षमता का प्रतीक माना जाता था, लेकिन बाद में इसे शर्मनाक समझा जाने लगा और इसे छिपाने की जरूरत महसूस की गई.

आज वल्वा के आसपास एक पूरा उद्योग खड़ा हो गया है, जो इसे 'जवान' बनाने के साथ-साथ कई तरह की कॉस्मेटिक और सर्जिकल प्रक्रियाओं की पेशकश करता है.

आज कलाकार इस हिस्से को अपनी कला (रचना) में दिखाते हैं, कार्यकर्ता इसे विरोध के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

जबकि डॉक्टर यह समझाने की कोशिश करते हैं कि महिलाओं के जननांगों की सामान्य शारीरिक बनावट एक इंसान से दूसरे इंसान में काफ़ी अलग हो सकती है.

मानव शरीर का यह हिस्सा प्रजनन क्षमता के प्रतीक से शर्म की वस्तु और सुंदरता के संकेत से राजनीतिक प्रतीक कैसे बन गया?

फ़्रांसीसी अख़बार ले मोंद ने इस इतिहास को समझने की कोशिश की है, जबकि ब्रिटिश अख़बार 'द गार्डियन' ने पोर्नोग्राफ़ी और सोशल मीडिया के प्रभाव से जुड़े आंकड़े दिए हैं.

दोनों मिलकर दिखाते हैं कि महिलाओं के जननांगों को लेकर बहस सिर्फ़ शरीर तक सीमित नहीं है. यह सत्ता, शर्म, सुंदरता और अपने शरीर के बारे में ख़ुद फ़ैसला लेने के अधिकार से भी जुड़ी है.

प्रजनन क्षमता का प्रतीक

इंसानी शरीर की बनावट को कलाकार अपनी कला में प्रदर्शित करते रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)
इमेज कैप्शन, इंसानी शरीर की बनावट को कलाकार अपनी कला में प्रदर्शित करते रहे हैं (सांकेतिक तस्वीर)
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आज यह कल्पना करना मुश्किल है कि योनि या वल्वा के बाहरी हिस्से को बिना शर्म या उसे छिपाने की कोशिश के खुले तौर पर कला में दिखाया जाता था.

हज़ारों साल पहले इंसान महिलाओं के शरीर के चित्र और मूर्तियां बनाते थे, जिनमें जननांगों पर ख़ास जोर दिया जाता था.

इसके प्रमाण फ़्रां में 'ला फेरासी' के प्राचीन स्थल और शोवे गुफा में मिले हैं, जहां दुनिया की कुछ सबसे पुरानी गुफा चित्रकारी संरक्षित है.

एक और दिलचस्प खोज भी हुई है. उदाहरण के लिए, मोनपाजियर की छोटी वीनस मूर्ति में महिला के निजी अंगों को जानबूझकर बड़ा दिखाया गया है. माना जाता है कि प्राचीन लोग शायद महिला की बच्चे को जन्म देने की क्षमता पर जोर देना चाहते थे.

प्राचीन मेसोपोटामिया में भी महिला की कामुकता को शर्म की बात नहीं माना जाता था. एक प्राचीन ग्रंथ में देवी इश्तर अपने चुने हुए व्यक्ति से कहती हैं, "मेरे प्रिय, मेरी योनि में बीज बोओ."

लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया.

प्राचीन इतिहासकार क्रिश्चियन-जॉर्ज श्वेंट्जेल ने 'ले मोंद' से कहा कि प्राचीन ग्रीस और फिर रोम में एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ, जब महिला की कामुकता को ख़तरनाक चीज के रूप में देखा जाने लगा.

इतिहासकार बताते हैं, "ग्रीस में और फिर रोम में योनि के बाहरी हिस्से को तिरस्कार की वस्तु माना जाने लगा."

स्वतंत्र इच्छाओं वाली महिला धीरे-धीरे ऐसी शख़्सियत के रूप में देखी जाने लगी, जिसे रोकने और नियंत्रित करने की ज़रूरत थी.

और यह विचार लंबे समय तक बना रहा.

मनोविश्लेषक सारा पियाज़ा महिलाओं के 'निजी अंगों के डर' की बात करती हैं. उनके अनुसार, यह डर प्राचीन काल से लेकर आज तक महिलाओं के चित्रण के पूरे इतिहास में बना रहा है.

सुंदरता के पीछे छिपा नियंत्रण

आज महिलाएं अपने शरीर के साथ क्या करना चाहती हैं, इसका फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं
इमेज कैप्शन, आज महिलाएं अपने शरीर के साथ क्या करना चाहती हैं, इसका फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं (सांकेतिक तस्वीर)

महिलाओं के जननांगों के स्वरूप को बदलने की इच्छा आधुनिक दौर की देन नहीं है.

अलग-अलग संस्कृतियों में ऐसी प्रथाएं रही हैं, जिनमें जननांगों के कुछ हिस्सों को हटाया जाता था या उनके स्वरूप में बदलाव किया जाता था.

आधुनिक कॉस्मेटिक सर्जरी के आने से पहले ही यूरोपीय चिकित्सा में छोटी लेबिया या योनि के बाहरी हिस्से को छोटा करने के लिए की जाने वाली सर्जिकल प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है.

आज महिलाएं अपने शरीर के साथ क्या करना चाहती हैं, इसका फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं.

लेकिन इससे एक सवाल उठता है कि अगर समाज अब भी महिलाओं को यह बताता रहे कि 'आदर्श' महिला का शरीर कैसा दिखना चाहिए, तो क्या यह आज़ादी वास्तव में पूरी तरह अपने आप में स्वतंत्र है?

चिकित्सकीय जवाब यह है कि महिलाओं के बाहरी जननांगों का कोई एक तय और 'सही' आकार या स्वरूप नहीं होता.

सेक्सोलॉजिस्ट जोएल मिग्नो इस बात पर जोर देते हैं कि कोई भी मेडिकल स्टैंडर्ड यह तय नहीं कर सकता कि महिलाओं के जननांगों का स्वरूप कैसा होना चाहिए. महिलाओं के शरीर में बहुत अंतर होता है, ठीक वैसे ही जैसे पुरुषों के शरीर में होता है.

फिर भी, एक महिला अपने बिल्कुल सामान्य शरीर को देखकर सोच सकती है कि उसमें कुछ गड़बड़ है.

सुंदरता की परिभाषा किसने तय किया?

सांकेतिक तस्वीर
इमेज कैप्शन, आजकल योनि को आज़ादी के अधिकार के लिए आवाज़ उठाने के तौर पर दिखाया जा रहा है (सांकेतिक तस्वीर)

पिछले कुछ दशकों में पोर्नोग्राफ़ी उद्योग, सोशल मीडिया, कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं और सर्जरी के विज्ञापनों के साथ-साथ प्यूबिक हेयर को स्थायी रूप से हटाने के चलन ने इस दबाव को और बढ़ाया है.

धीरे-धीरे 'आदर्श महिला' की एक सीमित छवि बनाई गई. ऐसी महिला, जिसकी त्वचा मुलायम हो, शरीर पर बाल न हों, कोई दिखाई देने वाली झुर्रियां न हों, त्वचा लचीली हो, रंग गुलाबी हो और कोई गंध न हो.

स्त्री रोग विशेषज्ञ सोफ़ी बर्विल इसे 2000 के दशक में सामने आए एक तरह के 'गोल्ड स्टैंडर्ड' के रूप में बताती हैं.

'द गार्डियन' का कहना है कि समस्या यह है कि युवाओं को यह आसानी से देखने को नहीं मिलता कि महिला के निजी अंगों का सामान्य स्वरूप कितना अलग-अलग हो सकता है.

2024 में अख़बार ने ऑस्ट्रेलिया में किए गए एक अध्ययन के नतीजों का हवाला दिया.

इसमें बताया गया कि 18 से 24 साल की उम्र की 23 फ़ीसदी महिलाएं अपने लैबिया या योनि के बाहरी हिस्से के स्वरूप को लेकर चिंतित या असहज महसूस करती थीं और इनमें से आधी महिलाएं सर्जरी कराने पर विचार कर रही थीं.

हालांकि, अपने शरीर में बदलाव चाहने वाली सभी महिलाएं सिर्फ़ विज्ञापनों, सोशल मीडिया या पोर्नोग्राफ़ी की शिकार नहीं हैं.

स्त्री रोग विशेषज्ञ सोफी बर्विल ने 'ले मोंद' को बताया कि उनकी कुछ महिला मरीज कई सालों से अपने निजी अंगों के स्वरूप को लेकर असहज थीं.

उनके मुताबिक़ कुछ को अपने साथी के सामने कपड़े उतारने में शर्म आती थी या वे यौन संबंधों से बचती थीं.

उन्होंने बताया कि प्रक्रिया के बाद कुछ महिलाओं ने मानसिक रूप से बेहतर महसूस किया और उनकी सेक्स लाइफ़ में भी सुधार हुआ.

इसलिए मामला सिर्फ़ 'सर्जरी करानी है या नहीं' का नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि महिलाएं संभावित जोखिमों और साइड इफेक्ट्स को समझती हैं या नहीं और यह फ़ैसला वास्तव में उसका अपना है या नहीं.

अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स (एसीओजी) इंटरनेट और पोर्नोग्राफ़ी को लेकर चेतावनी देता है. इनके कारण कोई व्यक्ति यह सोच सकता है कि उसके शरीर का प्राकृतिक स्वरूप स्वीकार्य नहीं है.

इसके अलावा, इस क्षेत्र में की जाने वाली कई कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं की सुरक्षा और असर को लेकर उपलब्ध सबूत अब भी पर्याप्त नहीं हैं.

शर्म से विरोध और जानकारी तक

सांकेतिक तस्वीर फूल
इमेज कैप्शन, 1970 के दशक में नारीवादी कलाकारों ने महिलाओं के निजी अंगों की तस्वीरों और उनके स्वरूप का इस्तेमाल खुलकर करना शुरू किया (सांकेतिक तस्वीर)

कहानी एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है.

जिस शरीर को लंबे समय तक छिपाने के लिए मजबूर किया गया, वही सार्वजनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया.

साल 1969 में ऑस्ट्रियाई कलाकार वाली एक्सपोर्ट एक भड़काऊ पोशाक पहनकर म्यूनिख के एक सिनेमा में पहुंचीं.

इस जानबूझकर उठाए गए कदम का मक़सद बहस को जन्म देना और इस सवाल को उठाना था कि पुरुषों की नज़र महिलाओं के शरीर को किस तरह एक वस्तु के रूप में पेश करती है.

इस तरह एक्सपोर्ट ने दर्शकों को टीवी पर सिर्फ़ एक कामुक तस्वीर देखने के बजाय अपने सामने एक वास्तविक महिला को देखने का मौक़ा दिया, जिसके साथ वे सीधे बातचीत कर सकते थे.

1970 के दशक में नारीवादी कलाकारों ने महिलाओं के निजी अंगों की तस्वीरों और उनके स्वरूप का इस्तेमाल अपने काम में खुलकर करना शुरू किया.

इसके जरिए महिला होने, महिलाओं के शरीर और अपने शरीर के बारे में खु़द फै़सला लेने के उनके अधिकार जैसे मुद्दों को उठाया गया.

जूडी शिकागो इस आंदोलन से जुड़ी प्रमुख कलाकारों में शामिल हैं.

इतिहासकार और कला समीक्षक सिंडी नेम्सर ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने नारीवादी कला पर लिखा और इसमें शामिल महिला कलाकारों का समर्थन किया.

समय के साथ यह मुद्दा कला की सीमाओं से आगे निकल गया.

साल 2019 में कलाकार डेबोरा डी रोबर्टिस यूरोपीय संसद के सामने नग्न होकर दिखाई दीं. उन्होंने सत्ता के पदों पर महिलाओं की कम मौजूदगी के विरोध में ऐसा किया था.

इसी दौरान शर्म को जानकारी में बदलने के मक़सद से कई परियोजनाएं भी शुरू हुईं.

पुरुषों की तरह ही अलग-अलग महिलाओं के शरीर और उसके अंगों की बनावट अलग-अलग होती है (सांकेतिक तस्वीर)
इमेज कैप्शन, पुरुषों की तरह ही अलग-अलग महिलाओं के शरीर और उसके अंगों की बनावट अलग-अलग होती है (सांकेतिक तस्वीर)

साल 2011 में कलाकार जेमी मैकार्टनी ने 'द ग्रेट वॉल ऑफ़ वजाइना' नाम की कला कृति बनाई. इसमें 400 महिलाओं के जननांगों को दिखाया गया था, ताकि महिला शरीर में मौजूद विविधता को सामने लाया जा सके.

साल 2016 में 'वल्वा गैलरी' की शुरुआत हुई. यह एक ऑनलाइन प्रोजेक्ट है, जिसमें महिलाओं के जननांगों के स्वरूप में मौजूद विविधता को दिखाया गया है.

और साल 2019 में लंदन में वजाइना म्यूजियम खोला गया. इस संग्रहालय का मक़सद लोगों को महिला शरीर की शारीरिक संरचना और स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देना है. साथ ही यह भी समझाना है कि समाज महिलाओं के शरीर को किस नज़र से देखता है.

आज योनि एक बार फिर सार्वजनिक रूप से दिखाई जा रही है, लेकिन इस बार वजह अलग है.

इसे स्वतंत्रता के अधिकार के लिए आवाज़ उठाने के तौर पर दिखाया जा रहा है.

शर्म से लड़ने के लिए इसका अध्ययन किया जा रहा है. कला में इसे सत्ता और हर व्यक्ति के अपने शरीर के बारे में खु़द फै़सला लेने के अधिकार को सामने रखने के लिए दिखाया जा रहा है.

अब सवाल यह नहीं है कि 'योनि का बाहरी हिस्सा कैसा दिखना चाहिए?'

इसके अलग-अलग आकार और स्वरूप हो सकते हैं. और यह बिल्कुल सामान्य है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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