इसरो से इतनी बड़ी संख्या में वैज्ञानिक इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हैं? बदले गए इस्तीफ़ा स्वीकार करने के नियम

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
देश के स्पेस स्टार्टअप्स का बढ़ता असर अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो तक पहुँच गया है.
स्टार्टअप सेक्टर ने देश में कई क्षेत्रों में नए मानक स्थापित किए हैं, लेकिन अब इसने प्रतिष्ठित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो को भी झकझोर दिया है.
अब अंतरिक्ष विभाग ने अपने वैज्ञानिकों के इस्तीफ़े स्वीकार करने के नियमों में बदलाव किया है. इसकी वजह यह बताई जा रही है कि पिछले एक साल में अनुमानित 100-120 वैज्ञानिक इसरो छोड़कर स्पेस स्टार्टअप्स से जुड़ गए हैं.
केंद्र सरकार के इस विभाग ने एक ऑफिस मेमोरेंडम में कहा है कि उसने गगनयान और अन्य अहम मिशनों या परियोजनाओं से जुड़े ग्रुप 'ए' के वैज्ञानिक के अलावा तकनीकी कर्मियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) और इस्तीफ़े के अनुरोध को अब सामान्य प्रक्रिया के तहत स्वीकार नहीं करने का फ़ैसला किया है.
यानी इसरो के अलग-अलग केंद्रों के निदेशकों या प्रमुखों के पास इस्तीफ़ा स्वीकार करने का अधिकार अब नहीं रहेगा.
विभाग ने कहा है कि "साइंटिस्ट/इंजीनियर-एसजी रैंक से नीचे के अधिकारियों के मामलों में भी संबंधित केंद्रों के निदेशक या यूनिट हेड अपनी स्पष्ट सिफ़ारिशों के साथ प्रस्ताव विभाग को भेजेंगे, जहाँ अंतिम फ़ैसला लिया जाएगा."
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वालों में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम-3) परियोजना निदेशक विक्टर जोसेफ़ भी शामिल हैं.
बताया जाता है कि इसरो के सभी केंद्रों में से यूआर राव सैटेलाइट सेंटर ने अपने 14,600 वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मचारियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक खोए हैं.
भारत की प्रमुख अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी संस्था के इस फ़ैसले ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के बीच बहस छेड़ दी है कि स्टार्टअप्स के ज़रिए स्पेस सेक्टर मज़बूत कैसे होगा और क्या इस तरह प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को दूसरे संस्थानों की ओर से आकर्षित किया जाना उचित है.

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क्या सरकारी नीति बदल गई है?
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इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर का कहना है कि यह स्थिति आईटी क्रांति के दौरान पैदा हुई थी और यह उसी का दोहराव है.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "इस तरह की प्रक्रिया इसरो की गतिविधियों पर गंभीर असर डाल सकती है."
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि इस तरह प्रतिभाओं को दूसरे संस्थानों में जाना नहीं होना चाहिए. इस इंडस्ट्री को बढ़ने का पूरा अधिकार है, लेकिन उन्हें अपने लोगों की भर्ती और ट्रेनिंग ख़ुद करना चाहिए, न कि इसरो जैसी स्थापित संस्थाओं से अनुभवी पेशेवरों को ले जाना चाहिए."
हालांकि, इसरो के पूर्व वैज्ञानिक सचिव पी.जी. दिवाकर इसरो छोड़ने वाले वैज्ञानिकों की संख्या से हैरान नहीं हैं. उनका मानना है कि पहले इसरो बड़ी संख्या में अर्थ ऑब्जर्वेशन और कम्युनिकेशन सैटलाइट लॉन्च करता था, लेकिन "आज अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटलाइट की कमी है."
दिवाकर कहते हैं, "सरकार की पूरी नीति बदल गई है. पहले सरकार इसरो को रिसोर्ससैट, कार्टोसैट और ओशनसैट जैसी परियोजनाओं के लिए पैसे देती थी. इसरो सामाजिक हित में ये सैटलाइट बनाता था. लेकिन अब सरकार ने अलग-अलग मंत्रालयों से कहा है कि वे अपनी ज़रूरत के अनुसार, अपने सैटलाइट ख़ुद लॉन्च करें."
उनका मानना है कि मंत्रालयों को सामाजिक हित के लिए उपग्रहों में निवेश की ज़रूरत समझने में अभी कुछ समय लगेगा. हालांकि, उन्हें यह भी उम्मीद है कि भारत में स्पेस स्टार्टअप्स तेज़ी से आगे बढ़ेंगे.
उन्होंने कहा, "फ़िलहाल वैज्ञानिकों को यह एक आकर्षक विकल्प लग रहा है."

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निजी सेक्टर में वैज्ञानिक इसरो वाला काम कर पाएंगे?
लेकिन सवाल यह है कि क्या स्टार्टअप्स में वैज्ञानिकों को वैसा वैज्ञानिक विकास मिलेगा, जैसा इसरो जैसी संस्था में मिलता है?
दिवाकर का कहना है कि शुरुआत में शायद ऐसा अवसर न मिले, लेकिन "अगर स्टार्टअप्स आगे बढ़ते हैं तो वैज्ञानिकों को भी फ़ायदा होगा और यह सिर्फ़ कमाई तक सीमित नहीं रहेगा."
वहीं माधवन नायर इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है, "प्राइवेट सेक्टर ज़्यादा सैलरी दे सकता है, लेकिन वहाँ उतने चुनौतीपूर्ण वैज्ञानिक काम नहीं होंगे."
उन्होंने इस सवाल पर टिप्पणी करने से इनकार किया कि क्या इसरो के भीतर मौजूद किसी व्यवस्थागत समस्या के कारण वैज्ञानिक प्राइवेट सेक्टर की ओर जा रहे हैं. हालांकि उन्होंने माना कि प्राइवेट सेक्टर और सरकारी सैलरी के बीच बड़ा अंतर है.

उन्होंने कहा, "यह बहुत ख़ास सेक्टर है, जहाँ असाधारण प्रतिभा वाले लोगों की ज़रूरत होती है. ऐसी प्रतिभा को बनाए रखने के लिए सरकार को ख़ास प्रयास करने होंगे. इसरो के वैज्ञानिकों के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं ख़त्म हुईं."
माधवन नायर ने बताया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में "हम सरकार को यह समझाने में सफल रहे थे कि स्पेस और न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टरों को अन्य सरकारी नौकरियों से अलग माना जाना चाहिए."
इसके बाद परफॉर्मेंस आधारित प्रोत्साहन योजना, नक़द इनाम योजना और स्पेशल सैलरी वृद्धि जैसी कई योजनाएं शुरू की गई थीं.
उन्होंने कहा, "समय के साथ इनमें से कई योजनाएं धीरे-धीरे वापस ले ली गईं."
नायर ने कहा, "इन फ़ैसलों को लेने वाले कुछ लोग शायद अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की जटिलताओं और उसकी मांगों को पूरी तरह नहीं समझते."

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स्पेस स्टार्टअप्स का विस्तार
एक समय था जब इसरो कम्युनिकेशन सैटलाइट, अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटलाइट बनाने के साथ-साथ चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशन भी संचालित कर रहा था.
दिवाकर कहते हैं, "आज तस्वीर बदल चुकी है. आज आपके पास पिक्सेल, स्काईरूट, अग्निकुल, गैलेक्सआई जैसी कंपनियां हैं. मैं ऐसे 10-15 बेहतरीन स्पेस स्टार्टअप्स के नाम गिना सकता हूँ, जो विदेशी निवेश भी आकर्षित कर रहे हैं."
जनवरी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में बताया था कि भारत की स्पेस इकॉनमी बढ़कर लगभग 8.4 अरब डॉलर तक पहुँच गई है और देश में 399 स्पेस स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं. ये स्टार्टअप्स लॉन्च व्हीकल, सैटलाइट, प्रोपल्शन सिस्टम और स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं.
जितेंद्र सिंह ने दिल्ली में पत्रकारों को बताया, "प्रशासनिक कारणों से यह मेमो तैयार किया गया है, ताकि इस पर कहीं अधिक परिपक्व स्तर पर निर्णय लिया जा सके. इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि वैज्ञानिकों के आने-जाने का परियोजना पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े."
सरकार ने 2019 में इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड अथोराइजेशन सेंटर (इन-स्पेस) की स्थापना के साथ स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया था. यह संस्था प्राइवेट सेक्टर और इसरो जैसी सरकारी एजेंसियों के बीच एक सिंगल-विंडो इंटरफेस के रूप में काम करती है.
इसरो के अधिकारियों की प्रतिक्रिया मिलने के बाद इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा. इसरो के एक अधिकारी, जिन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं है, ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया कि अध्यक्ष वी. नारायणन दिल्ली में हैं और मीडिया से बात करने के लिए उन्हीं को अधिकृत किया गया है.
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