झारखंड: सरसों के तेल में मिलावट से होने वाली बीमारी ने ली छह की जान, क्या है गांव का हाल? - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, मोहम्मद सरताज आलम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
"गुज़रे दो हफ़्ते में माता-पिता समेत परिवार के छह सदस्यों का अंतिम संस्कार करने के बाद मेरी हिम्मत टूट चुकी है."
अनुज महतो के चेहरे पर पिता, माँ, दो बहनें, भाई और पत्नी को खो देने का दुख साफ़ नज़र आता है.
दरअसल झारखंड के पलामू ज़िले के सिक्का गांव में एक ही परिवार के छह सदस्यों की मौत एपिडेमिक ड्रॉप्सी की वजह से हो गई.
पलामू ज़िले के सिविल सर्जन डॉक्टर अनिल कुमार श्रीवास्तव ने मौत के पीछे की वजह की पुष्टि की है.
उन्होंने कहा, "ये छह मौतें किसी रहस्यमयी बीमारी से नहीं, बल्कि 'आर्जेमोन मेक्सिकाना' मिले हुए सरसों के तेल के इस्तेमाल से एपिडेमिक (महामारी) 'ड्रॉप्सी' के कारण हुई हैं."
मौत का सिलसिला: पहले पिता, फिर बहन, फिर पत्नी...

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परिवार में 19 जून को सबसे पहले कुलदीप महतो की मौत हुई. अगले ही दिन उनकी बड़ी बेटी यानी अनुज की बहन बबीता कुमारी ने अंतिम सांस ली.
अपने पिता और बहन की मौत की ख़बर सुनने के बाद बेंगलुरु में काम करने वाले अनुज महतो तत्काल वहां से घर लौट आए.
अनुज महतो कहते हैं, "पिता और बहन से नहीं मिल पाने का ग़म मुझे सारी ज़िंदगी सताता रहेगा. मैं सिर्फ़ उनका अंतिम संस्कार ही कर पाया."
वो बताते हैं, "तब मुझे ये अंदाज़ा नहीं था कि इन दो लोगों के बाद मेरी पत्नी, छोटी बहन, भाई और मां भी दुनिया छोड़ जाएंगे."

26 जून को अनुज महतो की 18 वर्षीय बहन इंदु कुमारी और 28 जून को अनुज की पत्नी श्वेता देवी की मौत रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (रिम्स) में हो गई.
बहन और पत्नी की मौत से टूट चुके अनुज अपने एक साल के बेटे को लेकर घर पर ही रुक गए. जबकि उनकी बड़ी बहन मनीता देवी अस्पताल में रुक गईं थीं क्योंकि उनकी मां और भाई का इलाज रिम्स के आईसीयू में चल रहा था.
29 जून को उनके भाई नकुल महतो की भी मौत हो गई और आठ जुलाई की सुबह मां लाखो देवी ने भी दम तोड़ दिया.
एपिडेमिक ड्रॉप्सी से ग्रसित सिर्फ सुनील हो रहे हैं स्वस्थ

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इस परिवार में बीमार पड़े एक सदस्य सुनील महतो ही ठीक हो पाए. जब वो अपनी मां के अंतिम संस्कार में आए तो लोगों का ध्यान उनकी पैर की तरफ़ गया जो अब भी सूजा हुआ था. उनकी आंखें पीली पड़ी हुई थी.
उनका कहना है, "अब पहले से बेहतर हूं, जून के तीसरे हफ्ते में मुझे कई दिनों तक हर वक़्त उल्टी महसूस हुई, फिर कमज़ोरी आने लगी. देखते ही देखते मेरे पैरों में सूजन आ गई, मल में खून आने लगा. तब जीजाजी ने मुझे पलामू सदर अस्पताल में भर्ती करवाया."
सुनील महतो की हालत पर उनके बहनोई दीपक देव वर्मा बताते हैं कि शुरुआत में परिवार के लोगों को मिचली महसूस हुई तो उन्हें लगा कि ये गर्मी की वजह से है तो उन्होंने नींबू और ठंडी चीजें खानी शुरू कर दीं, लेकिन फिर सबके पैर फूलते चले गए.
दीपक देव वर्मा ने बताया, "सभी का इलाज प्राइवेट से लेकर सरकारी अस्पताल तक हर जगह करवाया, लेकिन न बीमारी का पता चल रहा था और न ही कोई ठीक हो रहा था."

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जांच में सरसों तेल में आर्जेमोन के तेल की पुष्टि
सिविल सर्जन अनिल कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, 29 जून को अनुज के घर से खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने सरसों तेल के अलावा आटा, दाल, चावल, पानी आदि के सैंपल जांच के लिए एकत्र किए.
अनिल कुमार ने बताया, "सभी मरीजों के शुरुआती लक्षणों में उल्टी, मल में खून का आना, पैर में सूजन और सांस लेने में दिक्कत जैसी स्थितियां शामिल थीं. ये देखकर मुझे खाने-पीने की चीजों पर और ख़ास तौर पर सरसों तेल पर शक हुआ. जब घर के दूसरे हिस्से से ऑर्गेमोन का तेल मिला तो शक और गहरा हो गया.
वो बताते हैं, "जांच मैंने सरसों सहित सभी चीजों की कराई. सरसों में आर्जेमोन की मिलावट निकली. सैंपल एकत्र करते समय जानकारी मिली कि आर्जेमोन के तेल का इस्तेमाल इस क्षेत्र में हर घर में गाय-बैल की बीमारी को दूर करने के लिए होता है."
घर की खाद्य सामग्री की जांच दो स्थानों पर हुई, एक सिविल सर्जन ने मेडिकल कॉलेज के बायोकेमिस्ट्री की लैब में कराई और दूसरी जांच स्टेट फ़ूड टेस्टिंग लैब में हुई.

इस लैब के खाद्य विश्लेषक चतुर्भुज मीणा ने बीबीसी से कहा, "जांच में आर्जेमोन ऑयल की मौजूदगी पाई गई, जो कि फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 के तहत ज़िंदगी के लिए बेहद ख़तरनाक है."
डॉक्टर श्रीवास्तव कहते हैं, "मुझे पहले ही शक था कि ये एपिडेमिक ड्रॉप्सी का मामला है. दोनों ही रिपोर्ट से इस बात की पुष्टि हो गई कि सरसों के तेल में ऑर्गेमोन मौजूद है, जो परिवार के छह सदस्यों की मौत का कारण बना."
इसके बाद डॉक्टर श्रीवास्तव ने ग्रामीणों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े एकत्र करने के लिए एक फू़ड सेफ्टी टीम को सिक्का गांव भेजा.
वो बताते हैं कि 195 घरों के सर्वे में 1,378 लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी एकत्र की गई. इनमें से 56 लोगों के ब्लड सैंपल लिए गए, लेकिन किसी में भी ड्रॉप्सी के लक्षण नहीं दिखे.
अनिल कुमार श्रीवास्तव कहते हैं, "एपिडेमिक ड्रॉप्सी कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, बल्कि विषाक्त है. जो ऑर्गेमोन मिले हुए सरसों के तेल के सेवन से होती है."

परिवार का कहना है कि उन्होंने कहीं से सरसों का तेल ख़रीदा नहीं बल्कि खुद ही घर के सरसों से तेल निकलवाया था.
लेकिन अपोलो अस्पताल की पूर्व डायटिशियन और खाद्य सुरक्ष विशेषज्ञ निवेदिता शर्मा कहती हैं, "आर्जेमोन बीज सरसों की तुलना में थोड़े बड़े होते हैं तो तेल निकालने में चूक कैसे हो गई."
वहीं, मनीता देवी का कहना है, "सभी कह रहे हैं कि सरसों तेल में कटैला (आर्जेमोन मैक्सिकाना) के बीज का तेल मिला था, तो उस तेल को मैंने भी खाया है, मुझे कुछ क्यों नहीं हुआ?"
इस पर निवेदिता शर्मा कहती हैं, "इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे इनकी बॉडी में आर्जेमोन मैक्सिकाना की मात्रा कम पहुंची हो, और इनके बेहतर पाचन शक्ति के कारण वह मेटाबोलाइज हो गई हो, ऐसे में प्रभाव पड़ने की संभावना कम होती है."
इस तर्क से मनीता देवी के पड़ोसी दीपक मेहता सहमत दिखे.
वह कहते हैं, "मनीता दीदी तो बीमारी की ख़बर सुनकर यहां आईं और सभी को इलाज के लिए अपने गांव ले गईं, उसके बाद लंबे समय तक वह रिम्स अस्पताल में रहीं, ऐसे में उस तेल का सेवन उन्होंने कितना ही किया."
क्या है आर्जेमोन मेक्सिकाना?

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कटैला के नाम से पहचाना जाने वाला आर्जेमोन मेक्सिकाना एक गहरा हरा कांटेदार पत्तों वाला जंगली पौधा है. जिसमें पीले रंग के फूल होते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, जब इसका तेल सरसों तेल में मिलता है तो इसमें सैंग्विनारिन नाम का ज़हरीला तत्व होता है जो सेवन करने वाले के खून की नसों में पहुंचकर शरीर के विभिन्न अंगों को नुकसान पहुंचाता है.
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ निवेदिता शर्मा बताती हैं कि इसी दुष्प्रभाव को एपिडेमिक ड्रॉप्सी कहते हैं.
वह बताती हैं, "अगर 200 लीटर सरसों तेल में दो बूंद आर्जेमोन तेल मौजूद हो तो एपिडेमिक ड्रॉप्सी के लक्षण सेवन करने वाले के शरीर में फौरन नज़र आने लगेंगे."
वह बताती हैं कि ऐसे हालात में आगे चलकर फेफड़े के टिश्यूज़ में सूजन आने पर ब्लड वैसल्स संकुचित हो जाती हैं.
निवेदिता शर्मा कहती हैं, "ऐसे में जब खून हृदय तक नहीं पहुंचेगा तो हृदयघात की आशंका पैदा हो जाती है और किडनी भी फेल होगी, क्योंकि वह इन प्रभावों के बाद ब्लड को फ़िल्टर करना बंद कर देगी."
सिविल सर्जन डॉक्टर श्रीवास्तव दावा करते हैं, "साल 2011 के बाद से भारत में एपिडेमिक ड्रॉप्सी का ये पहला मामला है. इससे पहले साल 2011 में, पंजाब के फ़तेहगढ़ इलाक़े में एक परिवार इस बीमारी का शिकार हुआ था."
उनके मुताबिक़ इस बीमारी से पहले भी लोगों की मौत हुई हैं. साल 1998 में दिल्ली में लगभग तीन हज़ार लोग इस बीमारी से पीड़ित पाए गए थे, जिनमें से 60 लोगों की मौत हो गई थी.

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अपने परिवार में छह लोगों को खोने के बाद अनुज महतो अपने बेटे और छोटे भाई के साथ घर में अकेले से पड़ गए हैं. हाल ही में परिवार ने एक नया मकान बनाया था, जिस पर अभी प्लास्टर नहीं चढ़ा है,
घर के आंगन में बैठीं मनीता देवी आर्थिक तंगी से जूझ रहे अपने मायके की मौजूदा हालात से चिंतित हैं.
वह बताती हैं कि उनके पिता ने पहले ही भाई की शादी और घर बनाने के लिए क़र्ज ले रखा था और अब परिवार के लोगों के इलाज के लिए भी कर्ज लेना पड़ा.
अनुज के सामने कर्ज अदा करना सबसे बड़ी चुनौती है.
कर्ज और परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर पलामू के ज़िला अधिकारी दिलीप प्रताप सिंह शेखावत ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "परिवार को मुआवज़ा दिया जाएगा. साथ ही खेतों के क्षेत्रफल के आधार पर किसान सम्मान निधि से जोड़ा जाएगा. प्रभावित परिवार के सदस्य को रोज़गार से भी जोड़ेंगे."
ज़िलाधिकारी शेखावत का मानना है कि भविष्य में ऐसे और मामले न सामने आए इसके लिए ऑर्गेमोन मेक्सिकाना के दुषप्रभाव के प्रति गांवों में जागरूकता भी फैलाई जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.





























