'डॉग फ़्रूट' से लेकर 'डार्लिंग' तक का सफ़र: भारत में एवोकाडो कैसे मशहूर हो रहा है

कोट्टानाड प्लांटेशन्स से एवोकाडो की एक टोकरी

इमेज स्रोत, Cottanad Plantations

इमेज कैप्शन, भारत में एवोकाडो की मांग में ज़बरदस्त उछाल आया है.
    • Author, प्रीति गुप्ता
    • पदनाम, बिज़नेस रिपोर्टर
    • ........से, मुंबई
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

मधु बोपैया याद करते हैं कि 15 साल पहले भारत में एवोकाडो का लगभग कोई बाज़ार नहीं था.

वो कहते हैं कि पके हुए फल पेड़ों से गिर जाते थे और कुत्ते उन्हें खा जाते थे. इस वजह से एवोकाडो को एक अरुचिकर नाम कुत्तों का फल या 'डॉग फ्रूट' मिल गया था.

बोपैया पिछले 26 साल से भारत के प्लांटेशन उद्योग में काम कर रहे हैं. फ़िलहाल वह दक्षिण भारत के केरल राज्य के वायनाड की पहाड़ियों में कोको, रबर, कॉफ़ी, मसालों और एवोकाडो समेत दूसरे फलों की खेती करने वाली कॉटनाड प्लांटेशंस में ग्रुप मैनेजर हैं.

वो कहते हैं, "हमने कभी एवोकाडो को अपनी मुख्य फ़सल के तौर पर नहीं लगाया. हमने इसे कॉफ़ी के बागान में छायादार पेड़ के तौर पर लगाया था और बाद में हमें एहसास हुआ कि यह एक फ़ायदेमंद कारोबार बन सकता है."

उनके मुताबिक़, बदलाव का दौर 2011 के आसपास आया, जब बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने कहा कि वह त्वचा की देखभाल के लिए एवोकाडो का इस्तेमाल करती हैं.

वो कहते हैं, "रातों-रात इसकी क़ीमतें दोगुनी हो गईं और फिर लगातार बढ़ती रहीं."

वेरोनिका के रेस्टोरेंट में मिलने वाला एवो स्नोब सैंडविच.

इमेज स्रोत, Hunger Inc. Hospitality

इमेज कैप्शन, भारतीय रेस्तरां अब एवोकाडो के अधिक व्यंजन परोस रहे हैं.

'किसानों के लिए यह एक बड़ा अवसर है'

इस मांग को देखते हुए अब वहां 40 एकड़ में एवोकाडो के पेड़ लगाए हैं. पिछले साल उन्होंने 10 से 15 टन के बीच फल की पैदावार की. अगले तीन-चार साल में उन्हें इसे बढ़ाकर 40 से 50 टन करने की उम्मीद है.

इस दौरान उन्हें बहुत कुछ सीखना पड़ा है.

बोपैया कहते हैं, "दक्षिण अफ़्रीका के विशेषज्ञों से सीखने के बाद हमने एवोकाडो उगाने का अपना तरीक़ा पूरी तरह बदल दिया. आज हम ऊंची क्यारियों, पेड़ों के बीच ज़्यादा दूरी और पौधे लगाने के अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि एवोकाडो की जड़ें बीमारियों के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं."

भारतीय किसानों के लिए उत्पादन बढ़ाने की काफ़ी गुंजाइश है.

भारत के एवोकाडो उद्योग को बढ़ावा देने में मदद करने वाले मणिलाल पल्लीअथ कहते हैं, "जब हमने बाज़ार का अध्ययन किया तो हमें मांग और आपूर्ति के बीच बहुत बड़ा अंतर मिला. भारत हर साल क़रीब 15,000 टन एवोकाडो आयात करता है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल क़रीब 8,000-9,000 टन है."

उनका मानना है कि किसानों के लिए यह एक बड़ा अवसर है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि पारंपरिक फ़सलों को नुक़सान हुआ है.

वो कहते हैं, "बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण कॉफ़ी और काली मिर्च की फ़सल को नुक़सान हुआ है, जिससे किसानों के लिए फ़सलों में विविधता लाना ज़रूरी हो गया है."

भारत में एक बागान में एवोकाडो के पेड़

इमेज स्रोत, Ajay Rajput

इमेज कैप्शन, भारत में हस जैसी विदेशी किस्मों की मांग है.

'इसराइल की एवोकाडो तकनीक दुनिया में सबसे उन्नत'

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

भारत में मांग बढ़ रही है, लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं है कि यह मांग स्थानीय स्तर पर उगाए गए फलों की ही हो.

हंगर इंक. हॉस्पिटैलिटी के एग्ज़ीक्यूटिव शेफ़ हुसैन शहज़ाद कहते हैं, "भारत में उगाए जाने वाले एवोकाडो की गुणवत्ता बेहतर हो रही है और कुछ अच्छे किसान स्थानीय किस्मों के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन मौसम और क्षेत्र के आधार पर इनकी गुणवत्ता और उपलब्धता में काफ़ी अंतर हो सकता है."

यह ग्रुप मुंबई में चार रेस्तरां चलाता है, जिनमें वेरोनिका'ज़ और द बॉम्बे कैंटीन शामिल हैं.

वो कहते हैं, "हमने भारत में उपलब्ध एवोकाडो की अलग-अलग किस्मों को आज़माया है, लेकिन फ़िलहाल आयात किए गए एवोकाडो स्वाद, बनावट, आकार और पकने के मामले में वह एकरूपता देते हैं, जिसकी हमें ज़रूरत होती है."

लेकिन कैटरिंग उद्योग से जुड़े कई अन्य लोगों की तरह वह भी स्थानीय स्तर पर मिलने वाली सामग्री लेना पसंद करेंगे.

वो कहते हैं, "स्थानीय स्तर पर मिलने वाली बेहतर उपज जैसे-जैसे विकसित होती है, हम उसे तलाशने में हमेशा दिलचस्पी रखते हैं. भारतीय कृषि को समर्थन देना और स्थानीय सामग्रियों के साथ काम करना, खाने को लेकर हमारे नज़रिए का अहम हिस्सा है."

कुछ भारतीय उद्यमियों का लक्ष्य आयात किए जाने वाले फलों जैसी गुणवत्ता और एकरूपता हासिल करना है.

हर्षित गोधा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इंडो-इसराइल एवोकाडो नर्सरी के संस्थापक हैं.

उन्होंने 2021 में नर्सरी का कारोबार शुरू किया था. इससे पहले उन्होंने एवोकाडो उद्योग के बारे में सीखने के लिए एक महीना इसराइल में बिताया था.

इसके बाद से कारोबार तेज़ी से बढ़ा है. पिछले पांच साल में गोधा ने पूरे भारत के किसानों को क़रीब 18,000 एवोकाडो पौधे उपलब्ध कराए हैं.

सभी पौधे हस और पिंकर्टन जैसी अंतरराष्ट्रीय किस्मों के हैं.

गोधा कहते हैं, "इसराइल क़रीब 13,000 हेक्टेयर में एवोकाडो उगाता है. यह एक छोटा देश है, जहां साल के आठ महीने लगभग बारिश नहीं होती. यही वजह है कि इसराइल की एवोकाडो तकनीक दुनिया में सबसे उन्नत है."

एक पेड़ पर एवोकैडो का एक बड़ा गुच्छा लटका हुआ है.

इमेज स्रोत, IIHR, Bengaluru

इमेज कैप्शन, अर्का सुप्रीम घरेलू स्तर पर विकसित एवोकाडो की एक किस्म है.

काफ़ी देखभाल की ज़रूरत

व्यावसायिक स्तर पर एवोकाडो का बाग़ तैयार करना और उसे चलाना आसान नहीं है. यह भारत में एवोकाडो की खेती के पारंपरिक तरीक़े से काफ़ी अलग है, जिसमें पेड़ों को छाया के लिए दूसरी फ़सलों के बीच लगाया जाता था.

शुरुआत के लिए, आप केवल बीज से पेड़ नहीं उगा सकते. व्यावसायिक रूप से उगाए जाने वाले पेड़ में एक रूटस्टॉक होता है, जिसे स्थानीय परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता के आधार पर चुना जाता है. इसके ऊपर के हिस्से पर एक दूसरी किस्म की कलम जोड़ी जाती है, जो यह तय करती है कि किस तरह का फल पैदा होगा.

इसके बाद पेड़ों को काफ़ी देखभाल की ज़रूरत होती है.

गोधा कहते हैं, "जब आप एक पेशेवर बाग़ लगाते हैं तो आपको पेड़ों की छंटाई की तकनीक पता होनी चाहिए. एक पेड़ छह से सात साल में 25 फ़ीट तक ऊंचा हो सकता है और 25 फ़ीट की ऊंचाई पर फल तोड़ना लगभग असंभव है."

कामगारों के लिए फल तोड़ने की ऊंचाई को सुविधाजनक बनाए रखने के लिए "आक्रामक" छंटाई करनी पड़ती है.

इसके अलावा, एवोकाडो का पेड़ आसानी से ख़ुद परागण नहीं कर सकता. फल पाने के लिए एवोकाडो की दो अलग-अलग किस्मों के पेड़ एक-दूसरे के बिल्कुल पास लगाने पड़ते हैं. एक किस्म को ठीक उसी समय मादा फूल के रूप में खुला होना चाहिए, जब दूसरी किस्म नर फूल के रूप में पराग छोड़ रही हो.

गोधा कहते हैं, "अगर कोई किसान पेड़ लगाने का यह अनुपात सही नहीं रखता है तो पेड़ फल नहीं देंगे, चाहे सिंचाई की तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो. वनस्पति विज्ञान की यह एक छोटी-सी बात ही एक बेहद मुनाफ़े वाली, ज़्यादा पैदावार देने वाले बाग़ और ऐसे बाग़ के बीच फ़र्क करती है, जो काग़ज़ पर तो बहुत अच्छा दिखता है लेकिन असल में नाकाम हो जाता है."

ताज़ा ग्वाकामोल, पेस्टो सॉस और कटे हुए एवोकाडो के साथ टोस्ट किया हुआ ब्रेड, ऊपर से चिली ऑयल छिड़का हुआ. सेहतमंद लोगों के लिए ताज़ा ठंडा सैंडविच मील प्लेट. शाकाहारी भोजन.

इमेज स्रोत, Getty Image

इमेज कैप्शन, पेस्टो सॉस के साथ एवोकाडो टोस्ट

'एवोकाडो आपको कभी निराश नहीं करेगा'

लोकप्रिय विदेशी किस्मों का इस्तेमाल भारत के एवोकाडो उद्योग को आधुनिक बनाने का एक तरीक़ा है. दूसरा तरीक़ा उन पेड़ों में सुधार करना है, जो भारत में पीढ़ियों से उगाए जा रहे हैं.

आईसीएआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चरल रिसर्च (आईआईएचआर), बेंगलुरु के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. गणेशन करुणाकरन कहते हैं, "भारत में एवोकाडो के पेड़ों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हर घर के आंगन में लगा पेड़ आनुवंशिक रूप से अलग होता है."

वो कहते हैं, "इसी वजह से भारतीय बाज़ार में अलग-अलग गुणवत्ता वाले मिश्रित फल बड़ी मात्रा में मिलते हैं. अगर हमें एक भरोसेमंद व्यावसायिक बाज़ार तैयार करना है तो मानकीकृत किस्में बेहद ज़रूरी हैं."

वो पिछले 25 साल से एक प्रजनन परियोजना पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत स्थानीय पेड़ों के आधार पर दो किस्में विकसित की गई हैं.

करुणाकरन कहते हैं, "हमारा उद्देश्य किसानों को हज़ारों अलग-अलग और बिना नाम वाले पेड़ों के बजाय एक जैसी गुणवत्ता वाले, अधिक पैदावार देने वाले और अच्छी गुणवत्ता के पौधे उपलब्ध कराना है."

वह बिना नियमन वाली उन नर्सरियों को लेकर भी चिंतित हैं, जो बिना पहचान वाले या बीमार पौधे बेचती हैं.

वह कहते हैं, "किसान अनजाने में बीमार पौधे ख़रीद सकते हैं. शुरुआत में पेड़ स्वस्थ दिख सकते हैं, लेकिन पांच या सात साल बाद वे अचानक मर सकते हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है."

लकड़ी की मेज़ पर ताज़ी सामग्री से बना ग्वाकामोली का कटोरा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, एवोकाडो से बना एक व्यंजन

चुनौतियों के बावजूद, किसान एवोकाडो की खेती शुरू करने में संभावनाएं देख रहे हैं.

शिजू सेबास्टियन इस बदलाव को अपनाने वाले शुरुआती किसानों में से एक थे. आठ साल पहले उन्होंने केरल के वायनाड में अपने खेत की दो एकड़ ज़मीन पर एवोकाडो की खेती शुरू की.

वह कहते हैं, "किसान एवोकाडो उगाने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें सही मार्गदर्शन और सुनिश्चित बाज़ार की ज़रूरत है."

इस साल वह 3,500 किलो एवोकाडो की पैदावार कर रहे हैं, जिसका पूरा फल बेंगलुरु शहर में बिक जाता है.

वह कहते हैं, "एवोकाडो आपको कभी निराश नहीं करेगा. यह इतना प्यारा और पसंद किए जाने वाला फल है. अब मुझे इस फल से प्यार हो गया है. मैं तीन एकड़ और ज़मीन पर एवोकाडो लगाने की योजना बना रहा हूं - सिर्फ़ एवोकाडो."

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.