नेपाल का 'काला गांव' जहां नहीं आई बाढ़ फिर किस लिए परेशान हैं यहां के लोग

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- Author, ग़नी अंसारी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ नेपाली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
रसुवा के इस गांव को भोटेकोशी-त्रिशूली इलाक़े में आई विनाशकारी बाढ़ ने अलग-अलग स्तर की पीड़ा पहुँचाई है.
एक तरफ़ उन लोगों का दर्द है जिन्होंने अपने खेतों और रिश्तेदारों समेत उस भयानक बाढ़ में सब कुछ खो दिया है. दूसरी तरफ़ उन लोगों का ग़म है जिनके अपने तो बाढ़ में नहीं बचे, लेकिन खेत बच गए हैं.
रसुवा की अमाचोडिंगमो ग्रामीण नगरपालिका-3 के गतलांग गांव को स्थानीय लोग 'काला गांव' भी कहते हैं.
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने बताया है कि इस गाँव में बाढ़ के बाद से कम से कम 29 लोग लापता हैं.
हालाँकि गाँव में बाढ़ का पानी नहीं आया था, फिर भी वहाँ के कई लोग इसकी चपेट में आ गए. ये लोग गाँव के पास स्थित एक बाज़ार में काम करने गए थे.
स्थानीय प्रतिनिधियों के अनुसार, उस भयानक बाढ़ में गतलांग गांव के कंटेनर ड्राइवरों, रसुवा-तिब्बत सीमा पर दुकानें चलाने वालों और सप्लायर्स की जान गई है.

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'अगर सड़क नहीं बनी तो…'
इस गाँव में तमांग समुदाय के लोग रहते हैं. अपनों को बाढ़ में खोने के अलावा अब इस गांव को एक और चिंता सता रही है. बाढ़ ने गाँव का सड़क संपर्क ख़त्म कर दिया है.
ग्रामीणों का कहना है कि अगर उनके खेतों में उगने वाली लाखों की पत्तागोभी सड़क नेटवर्क के अभाव के कारण बिना बिके सड़ गई, तो उनके लिए रोज़ी-रोटी का सवाल पैदा हो जाएगा.
गतलांग की रहने वालीं 40 वर्षीय फुरपु वांगमो तमांग विनाशकारी बाढ़ के कई दिनों बाद शनिवार को अपने खेत में पहुँचीं. पहुँचते ही उन्होंने खेत की सफ़ाई शुरू कर दी.
फुरपु ने बीबीसी न्यूज़ नेपाली को बताया, "अगले 15-20 दिनों में पत्तागोभी तैयार हो जाएगी, लेकिन अभी तक सड़क नहीं बनी है. मुझे डर है कि सब कुछ सड़ जाएगा."
"अगर तब तक सड़क नहीं बनी तो फ़सल बर्बाद हो जाएगी. पत्तागोभी बेचकर अपने लिए खाने-पीने का सामान ख़रीदने वाले किसान मुश्किल में पड़ जाएंगे. अगर पत्तागोभी नहीं बिकी तो इस इलाके़ में खाने की कमी हो जाएगी."
वह कहती हैं कि किसान चावल, नमक और तेल ख़रीदने के लिए पत्तागोभी बेचते हैं और फिर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं.
उन्होंने कहा, "वे क्या खाएंगे, अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे? मैं बहुत चिंतित हूँ."
फुरपु कहती हैं, "पिछले साल हमने दो लाख रुपये की पत्तागोभी बेची थी. इस साल हमने पिछले साल से ज़्यादा पत्तागोभी लगाई है."

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फुरपु के पति, नीमा नोरबू तमांग, एक स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में काम करते हैं. अपने ख़ाली समय में वो अपनी पत्नी को खेती-बाड़ी में मदद करते हैं.
फुरपु और नीमा बीते पाँच सालों से पत्तागोभी उगा रहे हैं, लेकिन परिवार ने पिछले तीन वर्षों से उत्पादन बढ़ा दिया है.
नीमा बताते हैं, "पिछले साल बिक्री अच्छी हुई थी, इसलिए इस साल बाक़ी किसानों ने भी अधिक से अधिक गोभी की खेती की. लेकिन इस बार यह विपत्ति आ गई है. अगर बिक्री नहीं हुई तो हम मवेशियों को चारा तक नहीं खिला पाएंगे."
नीमा बताते हैं कि गतलांग के लोग पिछले कुछ सालों से हर साल करोड़ों रुपये से अधिक की पत्तागोभी बेचते आ रहे हैं.
और इस बार गाँव के किसानों ने पहले से कहीं अधिक पत्तागोभी की खेती की है.
नीमा के मुताबिक़, किसानों ने अच्छी आमदनी और कैश में पेमेंट मिलने की उम्मीद में अन्य फ़सलों को छोड़कर गोभी का उत्पादन बढ़ा दिया है.
लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि बाढ़ की वजह से गाँव का संपर्क बाक़ी दुनिया से टूट जाएगा. बाढ़ के कारण गाँव का सड़क नेटवर्क पूरी तरह बह चुका है.
नीमा ने कहा, "कुछ किसान अपने रिश्तेदारों को खोने से चिंतित हैं, और अब वे इस बात से चिंतित हैं कि उनकी बोई हुई फ़सलें सड़ जाएंगी."

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'पूरा गांव चिंतित है'
गतलांग के रहने वाले 31 वर्षीय तेनपी नीमा तमांग ने अपने चचेरे भाइयों सहित छह अन्य लोगों के साथ मिलकर इस साल बड़े रकबे पर पत्तागोभी की खेती की है.
उन्होंने बताया कि पिछले साल की तुलना में पूरे गांव में अधिक पत्तागोभी का उत्पादन हुआ है और अगर इन्हें बेचा जा सके तो इस साल अच्छी कमाई होगी.
तेनपी उम्मीद जताते हैं, "इस मौसम में पूरे गांव ने आठ से नौ करोड़ रुपये की पत्तागोभी की खेती की है. अगर हमें अच्छी कीमत मिली तो हम भाई लगभग तीन करोड़ की कमाई कर लेंगे."
लेकिन तेनपी सड़क की वजह से चिंतित हैं.
उन्होंने कहा, "मुख्य चिंता सड़क की है. पासांग ल्हामू राजमार्ग के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद, हमारे लोग काठमांडू, पोखरा, हेटौडा, बीरगंज, भैरहवा, बुटवल और अन्य जगहों की यात्रा कैसे करेंगे?"
और अगर उत्पाद बिक नहीं पाता है, तो वे और भी ज़्यादा चिंतित हो जाते हैं और भविष्य में आने वाली समस्याओं के बारे में सोचने लगते हैं.
उन्होंने आगे कहा, "पत्तागोभी बेचकर हम चावल ख़रीदते हैं, अपने बच्चों की स्कूल फ़ीस भरते हैं और उनका इलाज करवाते हैं. अगर वह पैसा न मिले तो हम क्या कर पाएंगे? पूरा गांव बहुत चिंतित है."

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अमाचोडिंगमो ग्रामीण नगरपालिका की उपाध्यक्ष चंडिका तमांग भी कहती हैं कि उन्हें भी ग्रामीणों की समस्याओं की चिंता है.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ नेपाली को बताया, "अगर सड़क नहीं बनी तो किसानों की फ़सल बर्बाद हो जाएगी, जिससे करोड़ों रुपये का नुक़सान होगा."
उन्होंने कहा कि रसुवा के स्याफ्रुबेसी को सानो भरखू से जोड़ने वाली सड़क पूरी तरह से ग़ायब हो गई है.
नगरपालिका की उपाध्यक्ष चंडिका कहती हैं, "अगर हम तुरंत बेली ब्रिज बना लें, तो हमें वह नुक़सान नहीं उठाना पड़ेगा. अन्यथा, हमें भारी नुक़सान उठाना पड़ेगा."
चंडिका के मुताबिक़, केवल गतलांग में ही नहीं, बल्कि अमाचोडिंगमो ग्रामीण नगरपालिका के अन्य वार्डों के किसान भी बड़े इलाक़े में पत्तागोभी की खेती कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "मैं सटीक क्षेत्र तो नहीं बता सकती, लेकिन इस मौसम में पत्तागोभी की खेती काफ़ी हुई है."
अधिकारियों ने कहा है कि नेपाल-चीन सीमा पर आई भीषण बाढ़ ने सड़कों, संचार व्यवस्था और बिजली के बुनियादी ढाँचे को व्यापक क्षति पहुँचाई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि रसुवा से लेकर नुवाकोट और धाडिंग तक के ज़िलों में हुए नुक़सान के स्तर को देखते हुए, नेपाल को पुनर्निर्माण में लंबा समय लग सकता है.
फुरपु, तेनपी और नीमा जैसे किसानों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है.
जिस फ़सल को उगाने में उन्होंने लाखों का निवेश किया है, वे उसे बेचने की पूरी कोशिश करेंगे क्योंकि उनके लिए ये वाक़ई रोज़ी-रोटी का सवाल है.
नीमा को उम्मीद है कि "जल्द ही उनके गांव से कोई वैकल्पिक रास्ता निकलेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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