साप्ताहिक इंसुलिन इंजेक्शन किन मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद है?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, डिंकल पोपली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने 9 जुलाई को भारत में 'एविक्ली' नाम का इंसुलिन इंजेक्शन लॉन्च किया.
यह दुनिया का पहला साप्ताहिक बेसल इंसुलिन इंजेक्शन है, जिसे क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए मंज़ूरी मिली है.
टाइप 1 डायबिटीज़ के मरीज़ों का शरीर ख़ुद से इंसुलिन नहीं बनाता, इसलिए वे रोज़ाना इंजेक्शन पर निर्भर रहते हैं.
इसी तरह टाइप 2 या प्रेग्नेंसी डायबिटीज़ में जब गोलियां और जीवनशैली में बदलाव काम नहीं करते, तब इंसुलिन की ज़रूरत पड़ती है. हालांकि, हर मरीज़ के लिए इंसुलिन की डोज़ अलग-अलग होती है.
इंसुलिन कैसे काम करता है और यह नया साप्ताहिक इंजेक्शन इलाज में किस तरह मदद करेगा?
ये जानने के लिए बीबीसी न्यूज़ पंजाबी ने लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (डीएमसीएच) के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. नवीन मित्तल और मुंबई के सैफी अस्पताल की कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. शहला शेख़ से बात की.
एविक्ली क्या है और इसकी क़ीमत कितनी है?

इमेज स्रोत, Getty Images
एविक्ली (जिसका जेनेरिक नाम इंसुलिन आइकोडेक है) टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज़ वाले वयस्क मरीज़ों के लिए अल्ट्रा-लॉन्ग-एक्टिंग बेसल इंसुलिन है.
कंपनी के मुताबिक, इससे किसी व्यक्ति को साल में 365 के बजाय 52 इंजेक्शन लेने पड़ेंगे.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत श्रोतारिया ने बताया कि एविक्ली की 70 यूनिट की एक डोज़ की क़ीमत 261 रुपये है. यह दो पेन फॉर्मेट में उपलब्ध है.
1 मिली पेन (700 यूनिट) की क़ीमत 2,611 रुपये और 3 मिली पेन (2,100 यूनिट) की क़ीमत 7,833 रुपये है.
इसके मुक़ाबले भारत में रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले बेसल इंसुलिन की 70 यूनिट की मौजूदा क़ीमत 345 से 453 रुपये के बीच है.
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत इसे लॉन्च करने वाला दुनिया का सातवां देश है.
नोवो नॉर्डिस्क के अनुमान के मुताबिक, भारत में 10.1 करोड़ से ज़्यादा लोग किसी न किसी तरह की डायबिटीज़ से पीड़ित हैं और 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज़ की स्थिति में हैं.
इंजेक्शन के डर और आर्थिक चिंताओं के कारण भारत में लोग इंसुलिन शुरू करने में 7 से 9 साल की देरी करते हैं. फ़िलहाल क़रीब 60 लाख लोग इंसुलिन ले रहे हैं.
ये कैसे काम करता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
डॉ. मित्तल बताते हैं कि ग्लार्जिन या डिग्लुडेक जैसे रोज़ाना लिए जाने वाले इंसुलिन, जो 18 से 24 घंटे तक काम करते हैं, उनकी तुलना में इंसुलिन आइकोडेक की संरचना अलग है.
इसकी वजह से यह लंबे समय तक धीरे-धीरे रिलीज़ होता है.
"प्राकृतिक इंसुलिन का असर केवल 4 से 6 घंटे तक रहता है. वैज्ञानिकों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए इंसुलिन के अणु में बदलाव किया है, जिससे इंजेक्शन लगाने के बाद इंसुलिन आइकोडेक ख़ून में मौजूद एल्ब्यूमिन से जुड़ जाता है."
"यह 7 दिनों तक धीरे-धीरे रिलीज होता है और शुगर को नियंत्रित रखता है."
डॉ. शेख़ के मुताबिक़, "इसे सप्ताह में एक बार लिया जाता है. साप्ताहिक डोज़ तय करने के लिए रोजाना की डोज़ को 7 से गुना किया जाता है."
"यह उन मरीज़ों के लिए ठीक है, जिन पर गोलियों का असर कम हो गया है या जो रोज़ाना इंजेक्शन लेने में असहज महसूस करते हैं."
यह किन मरीज़ों के लिए ठीक है?

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत में एविक्ली को केवल 18 साल और उससे अधिक उम्र के वयस्कों के लिए मंज़ूरी मिली है.
डॉ. मित्तल के मुताबिक़, "यह टाइप 2 डायबिटीज़ वाले उन वयस्कों के लिए अच्छा है, जिनकी डायबिटीज़ गोलियों से नियंत्रित नहीं होती, लेकिन वे रोज़ाना इंजेक्शन लेने से हिचकते हैं. यह उन लोगों के लिए भी अच्छा है, जो रोज़ रोज़ के इंजेक्शन लेने से राहत चाहते हैं."
बेसल कवरेज: एविक्ली केवल बेसल इंसुलिन के रूप में काम करता है और 24 घंटे शरीर में शुगर के बैकग्राउंड स्तर को नियंत्रित करता है.
खाने के समय वाला इंसुलिन: जिन मरीज़ों को खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ने पर शॉर्ट-एक्टिंग (बोलस) इंसुलिन की ज़रूरत होती है, उन्हें एविक्ली के साथ ये इंजेक्शन अलग से लेते रहने की सलाह दी जाती है.
क्या हैं फ़ायदे

इमेज स्रोत, Getty Images
कम इंजेक्शन: 365 के बजाय साल में केवल 52 इंजेक्शन.
नियमितता: डोज़ छूटने की संभावना कम होती है.
जीवनशैली में सुधार: व्यस्त रहने वाले या यात्रा करने वाले लोगों के लिए ज़्यादा सुविधाजनक.
बेहतर शुगर नियंत्रण: आंकड़ों से पता चलता है कि यह बेहतर शुगर नियंत्रण देता है और हाइपोग्लाइसीमिया (लो ब्लड शुगर) के ख़तरे को कम करता है.
मददगार: अकेले रहने वाले या इंजेक्शन से डरने वाले लोगों के लिए आसान है, क्योंकि परिवार का कोई सदस्य सप्ताह में एक बार इंजेक्शन लगा सकता है.
संभावित ख़तरे और नुक़सान

इमेज स्रोत, Getty Images
डॉ. मित्तल चेतावनी देते हैं कि साप्ताहिक डोज़ सुविधाजनक है, लेकिन इसमें सावधानी ज़रूरी है.
लंबे समय तक हाइपोग्लाइसीमिया का ख़तरा: इंसुलिन का मुख्य ख़तरा ब्लड शुगर का बहुत ज़्यादा गिरना है. रोज़ाना लिए जाने वाले इंसुलिन के मामले में लो ब्लड शुगर की समस्या 24 घंटे के भीतर ठीक की जा सकती है, लेकिन साप्ताहिक इंसुलिन 7 दिनों तक शरीर में रहता है. इसलिए मरीज़ की लगातार निगरानी करनी पड़ती है.
डोज़: यह इंसुलिन काफ़ी ज़्यादा केंद्रित है, जिसमें प्रति मिलीलीटर 700 यूनिट होती हैं. इसके ख़ास पेन में 1 क्लिक 10 यूनिट के बराबर होता है. ग़लती से बहुत ज़्यादा क्लिक करने पर ओवरडोज हो सकता है.
डोज़ छूटना या दोहरी डोज़ लेना: डोज़ छूट जाने या ग़लती से दो बार डोज़ लेने से पूरे सप्ताह आपकी डायबिटीज़ और बिगड़ सकती है.
इससे लो ब्लड शुगर या वज़न बढ़ने जैसे सामान्य ख़तरे हो सकते हैं, हालांकि आइकोडेक के बारे में वज़न बढ़ने को कम करने की बात सामने आई है.
अगर ब्लड शुगर गिर जाए, तो '15 मिनट के नियम' का पालन करें. यानी तुरंत कोई मीठी चीज़ खाएं और 15 मिनट बाद फिर से अपना ब्लड शुगर जांचें.
किन लोगों को साप्ताहिक इंसुलिन नहीं लेना चाहिए?

इमेज स्रोत, Getty Images
विशेषज्ञों का कहना है कि इन लोगों को इंसुलिन आइकोडेक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए-
बच्चे: 18 साल से कम उम्र के मरीज़ों के लिए इसे मंज़ूरी नहीं मिली है.
अस्थिर डायबिटीज़ वाले मरीज़: जिनका ब्लड शुगर स्तर बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे होता रहता है.
जिन्हें इसके संकेत महसूस नहीं होते: जिन लोगों को ब्लड शुगर गिरने पर शरीर में इसके लक्षण महसूस नहीं होते.
गंभीर दृष्टि समस्या वाले लोग: जो बिना मदद के पेन के क्लिक नहीं देख सकते.
अचानक बीमारी या जीवनशैली में बदलाव: अगर आपको बार-बार लो ब्लड शुगर होता है, आप बहुत ज़्यादा मेहनत वाला व्यायाम कर रहे हैं या बीमार हैं, तो इसे शुरू न करें.
इसके अलावा, जिन लोगों को इस दवा से एलर्जी है, उन्हें भी इससे बचना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.




















