राजीव गांधी को कितनी मिलती थी तनख़्वाह और सोनिया गांधी से कैसे हुई मुलाक़ात

सारांश
  • भारत के पूर्व प्रधानमंत्री का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ था, गुरुवार को उनकी 82वीं जयंती है.
  • दिल्ली में राजीव गांधी के समाधि स्थल वीर भूमि पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत कई पार्टी नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.
  • पढ़िए 19 फ़रवरी 2020 को राजीव गांधी के बारे में छपा रेहान फ़ज़ल का ये लेख
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राजीव गांधी और सोनिया गांधी

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इमेज कैप्शन, राजीव गांधी की सोनिया से पहली मुलाक़ात साल 1965 में कैंब्रिज में हुई थी

बात मई 1981 की है. राजीव गाँधी अमेठी से लोकसभा के लिए उपचुनाव लड़ने वाले थे. वो अपने चुनाव क्षेत्र में घूम रहे थे.

कुछ घंटों बाद उन्हें लखनऊ से दिल्ली की फ़्लाइट पकड़नी थी. लेकिन तभी ख़बर आई कि 20 किलोमीटर दूर तिलोई में 30-40 झुग्गियों में आग लग गई है.

उन्होंने लखनऊ जाने की बजाय अपनी कार का रुख़ तिलोई की तरफ़ मोड़ दिया.

वहाँ उन्होंने जल गई झुग्गियों में रहने वालों को दिलासा दिया. इस बीच उनके पीछे खड़े संजय सिंह उनके कान में फुसफुसाते रहे, "सर आपकी फ़्लाइट मिस हो जाएगी."

लेकिन राजीव ने लोगों से बात करना जारी रखा. जब वो सबसे मिल चुके तो उन्होंने संजय सिंह से मुस्कुरा कर पूछा, यहाँ से लखनऊ पहुंचने में कितना समय लगेगा?

'द लोटस इयर्स - पॉलिटिकल लाइफ़ इन इंडिया इन द टाइम ऑफ़ राजीव गांधी' के लेखक अश्विनी भटनागर बताते हैं, "संजय सिंह ने जवाब दिया, कम से कम दो घंटे. लेकिन अगर आप स्टीयरिंग संभालें तो हम एक घंटे 40 मिनट में वहाँ होंगे."

"राजीव ने गाड़ी में बैठते ही कहा, उन तक ख़बर पहुंचा दीजिए कि हम एक घंटे, 15 मिनट में अमौसी हवाई अड्डे पहुंच जाएंगे. राजीव की कार इस तरह चली जैसे स्पेस शटल चलता है. तय समय से पहले राजीव हवाई अड्डे पर थे."

अश्विनी भटनागर की किताब 'द लोटस इयर्स - पॉलिटिकल लाइफ़ इन इंडिया इन द टाइम ऑफ़ राजीव गांधी' का कवर

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इमेज कैप्शन, अश्विनी भटनागर की किताब 'द लोटस इयर्स - पॉलिटिकल लाइफ़ इन इंडिया इन द टाइम ऑफ़ राजीव गांधी' का कवर

फ़्लाइट के दौरान पूरा नाम बताने की मनाही

लेकिन तेज़ गति से कार चलाने के शौकीन राजीव बहुत ही अनुशासित ढंग से विमान चलाते थे. शुरू में वो डकोटा चलाते थे लेकिन बाद में वो बोइंग उड़ाने लगे थे.

जब भी वो पायलट की सीट पर होते थे, कॉकपिट से सिर्फ़ अपना पहला नाम बताकर यात्रियों का स्वागत करते थे.

उनके कैप्टंस को भी निर्देश थे कि फ़्लाइट के दौरान कभी भी उनका पूरा नाम न बताया जाए.

उस ज़माने में उन्हें पायलट के रूप में 5000 रुपये तनख़्वाह में मिलते थे जो एक अच्छा वेतन माना जाता था.

सोनिया के पास बैठने के लिए 'रिश्वत'

जब राजीव गांधी इंजीनियरिंग का ट्राइपोस कोर्स करने कैंब्रिज गए तो वहाँ 1965 में उनकी मुलाक़ात इटली में पैदा हुईं सोनिया गाँधी से हुई थी.

वो दोनों एक ग्रीक रेस्तराँ में जाया करते थे.

अश्विनी भटनागर बताते हैं, "राजीव ने रेस्तराँ के मालिक चार्ल्स एन्टनी को मनाया कि वो उन्हें सोनिया की बग़ल वाली मेज़ पर बिठा दें. एक अच्छे ग्रीक व्यापारी की तरह चार्ल्स ने उनसे इस काम के लिए दोगुने पैसे वसूले."

"बाद में उन्होंने राजीव गाँधी पर सिमी गरेवाल की बनाई फ़िल्म में कहा कि 'मैंने पहले किसी को इतने अधिक प्यार में नहीं देखा.' जब राजीव कैंब्रिज में पढ़ते थे तो अपना ख़र्चा चलाने के लिए वो आइसक्रीम बेचा करते थे और सोनिया से मिलने साइकिल पर जाया करते थे. हालांकि उनके पास एक पुरानी फ़ोक्सवैगन हुआ करती थी जिसके पेट्रोल का ख़र्चा उनके दोस्त 'शेयर' करते थे."

सोनिया गांधी

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इमेज कैप्शन, रशीद किदवई बताते हैं कि "दिलचस्प बात ये है कि राजीव ने आख़िर तक सोनिया को नहीं बताया कि वो भारत की प्रधानमंत्री के बेटे हैं"

नैपकिन पर सोनिया के लिए लिखी कविता

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राजीव और सोनिया की कैंब्रिज की मुलाक़ातों का ज़िक्र मशहूर पत्रकार रशीद किदवई ने सोनिया पर लिखी जीवनी में भी किया है.

रशीद किदवई बताते हैं, "वर्सिटी रेस्तराँ में रोज़ कैंब्रिज विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का जमावड़ा लगता था. वो सब बियर पिया करते थे. उनमें से राजीव अकेले थे जो बियर को हाथ भी नहीं लगाते थे. तभी सोनिया की नज़र उस लंबे, काली आँखों और मोहक मुस्कान वाले मासूम लड़के पर पड़ी."

"दोनों तरफ़ आकर्षण बराबर का था. राजीव ने पहली बार एक नैपकिन पर उनके सौंदर्य पर एक कविता लिखकर एक वेटर के ज़रिए सोनिया की तरफ़ भिजवाई थी. सोनिया उसे पाकर थोड़ी असहज हुई थीं लेकिन राजीव के एक जर्मन दोस्त ने, जो सोनिया को भी जानते थे, एक संदेशवाहक की भूमिका को बख़ूबी निभाया."

रशीद किदवई आगे बताते हैं, "दिलचस्प बात ये है कि राजीव ने आख़िर तक सोनिया को नहीं बताया कि वो भारत की प्रधानमंत्री के बेटे हैं. बहुत समय बाद एक अख़बार में इंदिरा गांधी की तस्वीर छपी. तब राजीव गाँधी ने सोनिया से कहा कि ये उनकी माँ की तस्वीर है."

"तब कैंब्रिज में पढ़ने वाले एक भारतीय छात्र ने उन्हें बताया कि इंदिरा भारत की प्रधानमंत्री हैं. तब जाकर सोनिया को पहली बार पता चला कि वो कितने महत्वपूर्ण शख़्स से इश्क फ़रमा रही हैं."

अमिताभ बच्चन

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इमेज कैप्शन, राजीव गांधी से अमिताभ बच्चन की दोस्ती थी

महमूद और राजीव गांधी की मुलाक़ात

रशीद किदवई कहते हैं कि राजीव गांधी की अमिताभ बच्चन से तब से दोस्ती थी जब वो चार साल के हुआ करते थे. अमिताभ जब मुंबई में स्ट्रगल कर रहे थे तो एक बार राजीव गाँधी उनसे मिलने मुंबई गए. अमिताभ उन्हें हास्य कलाकार महमूद से मिलवाने ले गए.

रशीद किदवई बताते हैं, "उस ज़माने में महमूद को कॉम्पोज़ गोलियाँ खाने की आदत थी और वो हमेशा सुरूर में रहते थे. अमिताभ ने उनसे राजीव का परिचय करवाया लेकिन वो नशे में होने की वजह से समझ नहीं पाए कि उनको किससे मिलवाया जा रहा है."

"उन्होंने 5000 रुपये निकाले और अपने भाई अनवर से कहा कि इसे राजीव को दे दें. अनवर ने पूछा कि आप इन्हें क्यों पैसे दे रहे हैं? महमूद बोले कि अमिताभ के साथ जो शख़्स आए हैं, वो उनसे ज़्यादा गोरे और स्मार्ट हैं. एक दिन वो ज़रूर इंटरनेशनल स्टार बनेंगे. ये 5000 रुपये मेरी अगली फ़िल्म के लिए साइनिंग अमाउंट है."

"अनवर ने ज़ोर का ठहाका लगाया और राजीव का फिर से परिचय करवाते हुए कहा कि ये स्टार-विस्टार नहीं, इंदिरा गांधी के बेटे हैं. महमूद ने तुरंत अपने 5000 रुपये वापस ले लिए और राजीव से माफ़ी माँगी. लेकिन भविष्य में राजीव वाकई स्टार बने, फ़िल्म के क्षेत्र में नहीं, लेकिन राजनीति के क्षेत्र में ज़रूर."

इंदिरा और राजीव गांधी

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विमान में पता चला इंदिरा गाँधी की हत्या का

संजय गाँधी की विमान दुर्घटना में मौत के बाद राजीव इंदिरा गाँधी की मदद के लिए राजनीति में आए. लेकिन कुछ समय बाद ही इंदिरा गाँधी की उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. उस समय राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे. वायु सेना के जिस विमान से राजीव गांधी दिल्ली लौटे थे, उसमें बाद में दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने वालीं शीला दीक्षित भी उनके साथ थीं.

शीला दीक्षित ने बीबीसी को बताया था, "जैसे ही विमान ने उड़ान भरी राजीव कॉकपिट में पायलट के पास चले गए थे. वहाँ से वापस आने के बाद उन्होंने हमें विमान के पिछले हिस्से में बुलाकर कहा कि इंदिरा जी नहीं रहीं. फिर उन्होंने हमसे पूछा कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाता है?"

"प्रणब मुखर्जी ने जवाब दिया कि पहले से ये परंपरा रही है कि जो सबसे वरिष्ठ मंत्री होता है उसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई जाती है और बाद में प्रधानमंत्री का चुनाव होता है. लेकिन मेरे ससुर उमाशंकर दीक्षित ने कहा कि वो कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने का जोखिम नहीं लेंगे और राजीव को ही प्रधानमंत्री बनाएंगे."

प्रणब मुखर्जी

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी के कैबिनेट में प्रणब मुखर्जी भी थे

प्रणब मुखर्जी की सलाह उनके ख़िलाफ़ गई

मैंने शीला दीक्षित से पूछा था कि क्या प्रणब मुखर्जी का सबसे वरिष्ठ मंत्री को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने का ज़िक्र उनके ख़िलाफ़ गया?

शीला दीक्षित का जवाब था, "हाँ, थोड़ा बहुत तो ख़िलाफ़ गया क्योंकि जब राजीव जीतकर आए तो उन्होंने प्रणब को अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया जबकि वो इंदिरा के कैबिनेट में नंबर दो हुआ करते थे. कुछ दिनों बाद प्रणब ने पार्टी को भी छोड़ दिया. सबसे सीनियर मंत्री वहीं थे."

"लेकिन मैं नहीं समझती कि उन्होंने अपनी उम्मीदवारी मज़बूत करने के लिए वो बात कही थी. वो तो सिर्फ़ पुराने उदाहरण बता रहे थे लेकिन उनके विरोधियों ने उसे बिल्कुल दूसरे रूप में राजीव के सामने पेश किया."

अश्विनी भटनागर बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल (बाएं) के साथ
इमेज कैप्शन, अश्विनी भटनागर बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल (बाएं) के साथ

मालदीव के राष्ट्रपति को बचाया

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में बहुत काम किया. दलबदल कानून, 18 वर्ष के युवाओं को मताधिकार और भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति बनाने में राजीव की बहुत बड़ी भूमिका रही.

अश्वनी भटनागर बताते हैं, "शपथ लेते ही उन्होंने तेज़ी से फ़ैसले लिए चाहे वो शिक्षा के क्षेत्र में हों, प्रदूषण के क्षेत्र में हों, राजनीतिक व्यवस्था को साफ़ करने के क्षेत्र में हों या फिर कांग्रेस शताब्दी समारोह में उनका भाषण रहा हो. इस सबसे लोगों को एक तरह का सुखद आश्चर्य हुआ."

"आज लोग सर्जिकल स्ट्राइक की बात करते हैं, राजीव ने 1988 में 4000 किलोमीटर दूर मालदीव में स्ट्राइक किया था जब 10 घंटे के नोटिस पर आगरा से 3000 सैनिक एयर लिफ़्ट किए गए थे. वहाँ के राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ बग़ावत हो चुकी थी और वो छिपे छिपे घूम रहे थे. उन्होंने न सिर्फ़ उनकी सत्ता में वापसी करवाई बल्कि उनका विरोध करने वालों को गिरफ़्तार भी करवाया."

सैम पित्रोदा

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इमेज कैप्शन, भारत में डिजिटल क्रांति के लिए सैम पित्रोदा और राजीव गांधी को श्रेय दिया जाता है

सैम पित्रोदा की मदद से संचार क्रांति

सैम पित्रोदा की मदद से भारत में जो संचार क्रांति आई उसका बहुत कुछ श्रेय राजीव गाँधी को दिया जा सकता है.

सैम पित्रोदा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, "वी क्लिक्ड. मैं उन्हें बहुत पसंद करता था. वो हमसे बहुत प्रेम से बात करते थे. हमारी बात समझते थे. उनसे हमारी दोस्ती हो गई. उन्होंने हमारी मुहिम को राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रदान की. सी डॉट का विचार हमारा और राजीव का था. उसके लिए हमें 400 इंजीनियर और जगह चाहिए थी."

"हमने बेंगलुरु में हार्डवेयर डिज़ाइन करना शुरू किया और यहाँ दिल्ली में सॉफ़्टवेयर. जब यहाँ कहीं जगह नहीं मिली तो राजीव ने हमें एशियाड विलेज में भेजा. वो जगह तो बहुत अच्छी थी, लेकिन वहाँ एयरकंडीशनिंग नहीं थी. इसके बिना सॉफ़्टवेयर का काम तो नहीं हो सकता था. अकबर होटल में जगह खाली थी. हमने वहाँ दो फ़्लोर ले लिए."

"वहाँ कोई फ़र्नीचर नहीं था. इसलिए हम लोगों ने छह महीने तक खटिया पर बैठ कर काम किया. हमने युवा लोगों की सेवाएं लीं. उनको ट्रेन किया. फिर पता लगा कि महिलाएं कम हैं तो हमने महिलाओं की भी भर्ती की इस मिशन के लिए."

सोनिया गांधी वोट डालते हुए

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इमेज कैप्शन, राजीव ने पहली बार एक नैपकिन पर उनके सौंदर्य पर एक कविता लिख कर एक वेटर के ज़रिए सोनिया की तरफ़ भिजवाई थी

नौकरशाहों से बेहतर फ़ाइल वर्क

राजीव गांधी के साथ काम करने वाले पूर्व कैबिनेट और रक्षा सचिव नरेश चंद्रा उन्हें बहुत अच्छा प्रशासक मानते थे, जबकि उनका पहले प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था.

नरेश चंद्रा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, "राजीव गांधी बहुत युवा थे और आश्चर्यजनक रूप से मेहनती थे. वो फ़ाइलें बहुत ग़ौर से पढ़ते थे और उनकी ड्राफ़्टिंग नौकरशाहों से बेहतर हुआ करती थी. मैं समझता हूँ कि अगर वो दोबारा सत्ता में आते तो और अच्छा करते."

राजीव गांधी

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देर रात तक जागते थे राजीव

राजीव सुबह जल्दी उठते थे और देर रात तक काम किया करते थे. एक बार वो एक बैठक में भाग लेने हैदराबाद गए. उस समय एनटी रामाराव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

राजीव को नज़दीक से जानने वाले और बाद में मुख्य सूचना आयुक्त और अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने वजाहत हबीबुल्लाह याद करते हैं, "एनटी रामाराव के साथ तेलुगु गंगा पर बैठक हो रही थी. रामा राव बहुत जल्दी करीब आठ बजे सो जाते थे, ताकि वो सुबह 3 बजे उठ सकें. ये बैठक रात के करीब 10 बजे रखी गई थी."

"उस समय एनटीआर और भारत सरकार के बीच इस परियोजना को लेकर गहरे मतभेद थे. उस समय एनटीआर की आँखें नींद से मुंदी जा रही थीं. जैसे ही राजीव उनसे पूछते थे, इस बारे में आपकी क्या राय है? एनटीआर मुंदी आँखों में ही बोलते थे, 'आई डू नॉट अग्री.' ये कहकर वो फिर ऊँघने लगते थे."

"ये बैठक क़रीब रात 11 बजे ख़त्म हुई. तब राव साहब ने बहुत तहज़ीब से राजीव गांधी से कहा 'सर इस मीटिंग के लिए इतनी देर तक जागने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया.' राजीव ने कहा, अरे अभी तो कुछ भी समय नहीं हुआ है. अभी तो सोने से पहले मुझे बहुत काम करना है. फिर वो तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए राजभवन के अपने बेडरूम में चले गए."

राजीव गांधी

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राजीव गाँधी गृह सचिव को उनके घर छोड़ने पर अड़े

इसी तरह की एक घटना 1985 में हुई थी. राजीव गांधी ने गृह सचिव राम प्रधान को देर रात फ़ोन मिलाया. उस समय प्रधान गहरी नींद सो रहे थे. उनकी पत्नी ने फ़ोन उठाया. राजीव बोले, "क्या प्रधान जी सो रहे हैं. मैं राजीव गांधी बोल रहा हूं." उनकी पत्नी ने तुरंत उन्हें जगा दिया. राजीव ने पूछा, "आप मेरे घर से कितनी दूर रहते हैं?"

प्रधान ने बताया कि वह 2एबी, पंडारा रोड पर हैं. राजीव बोले, "मैं आपको अपनी कार भेज रहा हूं. आप जितनी जल्दी हो, यहां आ जाइए." उस समय राजीव के पास पंजाब के राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर राय कुछ प्रस्तावों के साथ आए हुए थे.

चूंकि राय उसी रात वापस चंडीगढ़ जाना चाहते थे, इसलिए राजीव ने गृह सचिव को इतनी रात गए तलब किया था. दो घंटे तक ये लोग मंत्रणा करते रहे. रात दो बजे जब सब बाहर आए तो राजीव ने राम प्रधान से कहा कि वह उनकी कार में बैठें. प्रधान समझे कि प्रधानमंत्री उन्हें गेट तक ड्रॉप करना चाहते हैं.

लेकिन राजीव ने गेट से बाहर कार निकाल कर अचानक बाईं तरफ टर्न लिया और प्रधान से पूछा, "मैं आपसे पूछना भूल गया कि पंडारा रोड किस तरफ़ है." अब तक प्रधान समझ चुके थे कि राजीव क्या करना चाहते हैं. उन्होंने राजीव का स्टीयरिंग पकड़ लिया और कहा, "सर अगर आप वापस नहीं मुड़ेंगे तो मैं चलती कार से कूद जाऊंगा."

प्रधान ने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने उनसे वादा किया था कि वह इस तरह के जोखिम नहीं उठाएंगे. बड़ी मुश्किल से राजीव गांधी ने कार रोकी और जब तक गृह सचिव दूसरी कार में नहीं बैठ गए, वहीं खड़े रहे.

वजाहत हबीबुल्लाह बीबीसी स्टूडियो में
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लक्षद्वीप में घायल व्हेल को बचाया

कुछ समय बाद राजीव एक बैठक के लिए लक्षद्वीप गए जहाँ वजाहत हबीबुल्लाह प्रशासक हुआ करते थे.

हबीबुल्लाह याद करते हैं, "राजीव हैलीपैड की तरफ़ जा रहे थे. हम उनके साथ जीप में बैठे हुए थे. तभी किसी ने दिखाया कि वहाँ व्हेल मछलियाँ पानी में फँस गई हैं. वहाँ लगून्स थे. वहाँ पानी कम होने वो काफ़ी उथले हो जाते हैं. व्हेल्स पानी के साथ आ तो गई थीं लेकिन वापस नहीं जा पा रही थीं और वहीं छप-छप कर रही थीं."

"राजीव ने गाड़ी रुकवाई और अपने जूते पायजामा पहने-पहने ही पानी में उतर गए. मैं सूट पहने हुए था. मैं भी कूदता-फाँदता राजीव के पीछे पहुंचा. राजीव के साथ कई दूसरे लोग भी पानी में पहुंच गए. उन्होंने उन लोगों की मदद से व्हेल को उठाया और वापस उस जगह छोड़ दिया जहाँ पानी अधिक था."

शंकर दयाल शर्मा, वीपी सिंह और राजीव गांधी

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बोफ़ोर्स में नाम आने से हुआ सबसे अधिक नुक़सान

राजीव का शायद पहला ग़लत क़दम शाहबानो के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद संसद में नया कानून बनाना था. बोफ़ोर्स दलाली मामले में उनका नाम आने पर उनकी छवि इतनी ख़राब हुई कि वो 1989 का चुनाव हार गए.

अश्विनी भटनागर बताते हैं, "झूठ की राजनीति बोफ़ोर्स से शुरू हुई थी. उस चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बहुत बड़ा झूठ बोला. एक चुनाव रैली में उन्होंने बहुत नाटकीय ढंग से अपने कुर्ते की जेब से एक पर्चा निकाल कर हवा में लहराकर कहा, 'इसमें राजीव गांधी के स्विस बैंक खाते का नंबर है जिसमें बोफ़ोर्स से मिली दलाली को जमा किया गया है.' उन्होंने ये दिखावा किया कि वो उसे पढ़ने जा रहे हैं लेकिन फिर वो रुक गए."

"उस समय भारत के लोगों में उनकी विश्वसनीयता इतनी अधिक थी कि लोगों ने यक़ीन कर लिया कि वो जो कुछ कह रहे हैं, सही कह रहे हैं. इसका नतीजा ये हुआ कि बोफ़ोर्स तो एक तरफ़ हो गया और 'राजीव गाँधी चोर है' का नारा गली-गली गूँजने लगा. किसी को अभी तक पता नहीं कि वास्तविकता क्या है. बोफ़ोर्स में निकला क्या?"

"अदालत ने तो सबको बरी कर दिया. आज तक ये सिद्ध नहीं हो पाया कि कितने पैसे दिए गए और किसको दिए गए और दिए भी गए कि नहीं दिए गए. जो ख़राब तोप लाने का आरोप वीपी सिंह ने लगाया था, वो भी कारगिल युद्ध में पूरी तरह ख़ारिज हो गया, क्योंकि कारगिल को जिताने में बोफ़ोर्स तोपों की बहुत बड़ी भूमिका रही."

(ये लेख इससे पहले 19 फ़रवरी 2020 को प्रकाशित हुआ था. अश्विनी भटनागर की किताब 'लोटस इयर्स' पर आधारित विवेचना)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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