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क्या ट्रंप ने वाकई 8 ईरानी महिलाओं को फांसी से बचा लिया है?
पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने 8 ईरानी महिलाओं को फांसी की सज़ा से बचाया.
लेकिन ईरान की न्यायपालिका ने कहा कि ये ग़लत है और जिन 8 महिलाओं का ट्रंप ने ज़िक्र किया उनको फांसी की सज़ा नहीं दी जाने वाली थी.
ईरान की ज्यूडीशरी ने कहा कि ट्रंप ने फ़ेक रिपोर्ट्स पर विश्वास कर लिया.
तो हम अब तक क्या जानते हैं.
ट्रंप का ये बयान तब आया जब सोशल मीडिया पर इन 8 महिलाओं के फ़ोटो के साथ एक दावा सर्कुलेट किया जाने लगा जिसमें कहा गया कि इन महिलाओं को फांसी दी जाने वाली है.
क्या ट्रंप का दावा सही है?
दावे के मुताबिक़ ये महिलाएं ईरान में जनवरी में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थीं. जिन पर सरकार ने बलपूर्वक क़ाबू पा लिया था.
ट्रंप ने मंगलवार, 21 अप्रैल को ऐसी ही एक पोस्ट शेयर करते हुए ईरानी शासन से इन महिलाओं के बारे में पूछा था और लिखा था कि उनकी रिहाई 'हमारी बातचीत की अच्छी शुरुआत होगी.'
ये तब हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में दूसरे दौर की बातचीत होने की संभावना जताई जा रही थी.
उसके बाद 22 अप्रैल यानी बुधवार को उन्होंने फिर ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट करते हुए दावा किया कि जिन आठ ईरानी महिला प्रदर्शनकारियों को फ़ांसी दी जानी थी, अब उन्हें फ़ांसी नहीं दी जाएगी.
हालांकि, ईरान ने कहा था कि इन महिलाओं को फ़ांसी देने का कोई इरादा ही नहीं था.
डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर लिखा था,"बहुत अच्छी ख़बर आ रही है. मुझे बताया गया कि इन सभी आठ महिला प्रदर्शनकारियों को नहीं मारा जाएगा. चार को तो फ़ौरन रिहा कर दिया जाएगा और बाक़ी चार को एक महीने तक जेल में रहना होगा. मैं ईरान और उसके नेताओं की इस बात के लिए सराहना करता हूं कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति होने के नाते मेरी अपील मानकर इन महिलाओं की फांसी की सज़ा रद्द कर दी."
ऐसा तब हुआ जब ख़बरें आ रही थीं कि जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल इन महिलाओं को ईरान में फांसी दी जाने वाली है.
बीबीसी अरबी के मुताबिक़, ईरानी न्यायपालिका से जुड़ी मिज़ान न्यूज़ एजेंसी ने बताया, "ट्रंप को झूठी ख़बरों ने गुमराह किया, जो विरोधी मीडिया चैनलों ने फैलाई थीं. कुछ महिलाएं पहले ही रिहा हो चुकी हैं और बाक़ी पर ऐसे आरोप हैं जिनमें मौत की सज़ा नहीं बनती."
बीबीसी संवाददाता लीस डूसेट ने बताया कि बीबीसी ने ईरान के न्यायिक अधिकारियों से इस संबंध में और जानकारी चाही और उनके जवाब का इंतज़ार किया जा रहा है.
लीस डूसेट ने बताया कि उन्होंने ओस्लो में मौजूद ईरान ह्यूमन राइट्स नाम के संस्थान से इस बारे में पूछा तो उन्होंने इनमें से पांच महिलाओं के बारे में जानकारी होने की बात कही.
ईरान ह्यूमन राइट्स के निदेशक महमूद अमीरी मोग़ादम ने बताया, "इनमें से डॉक्टर गुलनार नारग़ी और वीनस हुसैनीजाद को पिछले महीने ज़मानत पर रिहा कर दिया गया है. लेकिन ग़ज़ल गलान्दरी और महबूबे शबानी नाम की दो महिलाओं को फांसी की सज़ा दी जा सकती है. वहीं बीटा हिमाती नाम की महिला को फांसी की सज़ा देने का एलान हो चुका है. उन्हें जनवरी में अपने पति के साथ सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गिरफ़्तार किया गया था."
ईरान में फांसी की सज़ा देने का सिलसिला जारी है. ईरानी न्यायपालिका ने इस बात की पुष्टि की कि पिछले सप्ताह पांच लोगों को फांसी दी गई थी. इनमें से ज़्यादातर इसराइल के लिए जासूसी करने के दोषी पाए गए थे. पिछले साल 169 ईरानी नागरिकों को फांसी दी गई. ये 1989 के बाद से सबसे ज़्यादा है.
मानवाधिकार संगठन ईरान की इस बात के लिए आलोचना करते रहे हैं.
युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने 12 से ज़्यादा लोगों को फ़ांसी दी है. इनमें से कुछ पर इसराइल के लिए जासूसी करने का आरोप था और कुछ इस साल की शुरुआत में सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.