हूती कौन हैं जिनके निशाने पर है सऊदी अरब

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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने कहा है कि उनका देश हूती हथियारबंद गुट के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदी अरब का साथ देगा. उन्होंने कहा कि ब्रिटेन सऊदी अरब को 'रक्षात्मक' सैन्य मदद देगा.
ब्रिटेन सऊदी अरब को "रक्षात्मक एयर-टू-एयर ईंधन भरने" में मदद देगा. प्रधानमंत्री बर्नहम ने कहा कि यह फ़ैसला सऊदी अरब की ओर से "सैन्य सहायता" के अनुरोध के बाद लिया गया है.
यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और हूती लड़ाकों के बीच गृह युद्ध चल रहा है. इस युद्ध में पड़ोसी देश सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है.
हाल के दिनों में हूतियों ने दावा किया है कि उन्होंने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और लाल सागर से लगे इलाक़ों में ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए हैं.
सऊदी अरब ने बीते दिनों आरोप लगाया कि हूती लड़ाकों ने पवित्र शहर मक्का पर हमला करने की कोशिश की. हालांकि, सऊदी अरब के मुताबिक़ उसके एयर डिफ़ेंस सिस्टम ने मक्का के बाहरी इलाक़े में ही हूती हमलों को रोककर नष्ट कर दिया.
इस कथित हमले की दुनिया के कई मुस्लिम देशों और नेताओं ने आलोचना की.
हालांकि, हूती गुट और उसके समर्थकों ने सऊदी अरब के इस आरोप को ग़लत बताया है. यमन में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ हज़ारों हूती समर्थकों ने प्रदर्शन भी किए.
लाल सागर वैश्विक शिपिंग के लिए क्यों है अहम

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इससे पहले जनवरी 2024 में ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर पूरे यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए थे.
उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने कहा था कि जहाज़ों को निशाना बनाए जाने के बाद ब्रिटेन ने "आत्मरक्षा में कार्रवाई की". इन जहाज़ों में रॉयल नेवी का एक युद्धपोत भी शामिल था.
इसके बाद यमन में हूती लड़ाकों के साथ संघर्ष कुछ समय के लिए शांत रहा. लेकिन बीते कुछ हफ़्तों में एक बार फिर तनाव बढ़ा है. हूतियों ने यमन के कई इलाक़ों में अपनी पकड़ मज़बूत की है.
इनमें लाल सागर से होकर गुजरने वाले अहम शिपिंग रूट भी शामिल हैं. ये समुद्री रास्ते वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं.
हाल ही में हूतियों ने लाल सागर के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा और पेरिम द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया. पेरिम द्वीप लाल सागर के प्रवेश द्वार पर स्थित है.
यह इलाक़ा सऊदी अरब के लिए इस्तेमाल होने वाले एक अहम शिपिंग रूट का हिस्सा है.

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हूती लड़ाकों ने अचानक हमले करके कई जगहों से सरकारी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है. उन्होंने यमन के लाल सागर से लगे लगभग पूरे तटीय इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया है.
इस इलाक़े में बाब अल-मंदेब स्ट्रेट भी शामिल है. यह अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए बेहद अहम समुद्री रास्ता है.
इसराइल और अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज़ स्ट्रेट के लगभग पूरी तरह बंद रहने या वहां शिपिंग प्रभावित होने की आशंका के बीच बाब अल-मंदेब का समुद्री रास्ता और भी अहम हो गया है.
सऊदी अरब के ज़्यादातर ऊर्जा कारोबार के लिए भी इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल होता है. अब इस पर हूतियों के क़ब्ज़े से सऊदी अरब की चिंता बढ़ गई है.
सऊदी अरब के साथ संघर्ष

हूतियों ने कई साल पहले ही यमन के ज़्यादातर आबादी वाले इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इस महीने उन्होंने यमन के तट के साथ-साथ बाब अल-मंदेब की ओर तेज़ी से बढ़त बनाई है.
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि यमन के लाल सागर तट पर लड़ाई अचानक बढ़ने से बीते कुछ दिनों में एक लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं.
सऊदी अरब और हूतियों के बीच संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में 2022 में हुआ युद्धविराम पहले से ही अस्थिर था. हाल के महीनों में यह पूरी तरह टूट गया है. दोनों पक्ष मिसाइलों, ड्रोन और हवाई हमलों का इस्तेमाल कर रहे हैं.
सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है. उसने इस समतल तटीय इलाक़े में सैकड़ों हवाई हमले किए हैं.
वहीं, हूती इस इलाक़े में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहे हैं. उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी सऊदी अरब के शहरों और बुनियादी ढांचे पर भी सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं.
इस संघर्ष के चलते लाल सागर के दूसरी तरफ़ मौजूद छोटे से अफ़्रीकी देश जिबूती की अहमियत भी अचानक बढ़ गई है. जिबूती बाब अल-मंदेब के ठीक सामने स्थित है.

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जिबूती दुनिया में सबसे ज़्यादा सैन्य अड्डों वाले देशों में शामिल है. कभी यह फ़्रांस का उपनिवेश था.
साल 2003 से अमेरिका यहां एक बड़ा सैन्य अड्डा चला रहा है, जहां कई देशों की सेनाएं मौजूद हैं. चीन का भी यहां एक बड़ा सैन्य अड्डा है. हिंद महासागर क्षेत्र में यह चीन की सबसे बड़ी सैन्य मौजूदगी है. हाल ही में इसे और बेहतर बनाया गया है.
हालांकि, जिबूती ने साफ़ कर दिया है कि उसका हूतियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकार के बीच चल रहे युद्ध में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है.
हूती विद्रोही कौन हैं

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हूती यमन के अल्पसंख्यक शिया 'ज़ैदी' समुदाय का एक हथियारबंद समूह है.
इस समुदाय ने 1990 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के कथित भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए यह समूह बनाया था.
इसका नाम अभियान के संस्थापक हुसैन अल हूती के नाम पर पड़ा. हूती ख़ुद को 'अंसार अल्लाह' यानी 'ईश्वर के साथी' भी कहते हैं.
2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक़ पर हुए हमले के दौरान हूती विद्रोहियों ने एक नारा दिया था. इसमें अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ नारे लगाए गए थे और इस्लाम की जीत की बात कही गई थी.
हूतियों ने ख़ुद को हमास और हिज़्बुल्लाह के साथ ईरान के नेतृत्व वाले 'प्रतिरोध की धुरी' का हिस्सा बताया है. यह समूह इसराइल, अमेरिका और पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ है.
हूती ख़ुद को ईरान का सहयोगी भी बताते हैं. दोनों का एक साझा विरोधी सऊदी अरब है.
हूतियों को ईरान से हथियार मिलने के आरोप भी लगते रहे हैं. अमेरिका और सऊदी अरब का आरोप है कि ईरान ने हूती विद्रोहियों को बैलिस्टिक मिसाइलें भी दी हैं.
ईरान का समर्थन और हिज़्बुल्लाह मॉडल

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सऊदी अरब आरोप लगा चुका है कि ईरान ने हूती विद्रोहियों को क्रूज़ मिसाइल और ड्रोन भी दिए हैं.
यमन की बड़ी आबादी वाले इलाक़े हूती विद्रोहियों के नियंत्रण में हैं. उनका संगठन देश के उत्तरी हिस्से में टैक्स वसूलता है और अपनी मुद्रा भी जारी करता है.
हूती विद्रोही लेबनान के सशस्त्र शिया समूह हिज़्बुल्लाह से भी प्रेरणा लेते हैं.
अमेरिका के रिसर्च इंस्टिट्यूट 'कॉम्बैटिंग टेररिज़्म सेंटर' के मुताबिक़, हिज़्बुल्लाह ने 2014 से हूतियों को बड़े पैमाने पर सैन्य ट्रेनिंग और विशेषज्ञता दी है.
2014 की शुरुआत में यमन में हूती राजनीतिक रूप से काफ़ी मज़बूत हो गए. उस समय उन्होंने राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिया. हादी, अली अब्दुल्लाह सालेह के बाद राष्ट्रपति बने थे.
हूतियों ने अपने पुराने दुश्मन सालेह के साथ समझौता किया. वे उन्हें दोबारा सत्ता में लाना चाहते थे.
हूतियों ने यमन के उत्तरी हिस्से में सादा प्रांत पर नियंत्रण कर लिया. इसके बाद 2015 की शुरुआत में उन्होंने राजधानी सना पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.
इसके बाद राष्ट्रपति हादी यमन छोड़कर विदेश चले गए.
यमन के पड़ोसी सऊदी अरब ने सैन्य दख़ल दिया. उसने हूतियों को सत्ता से हटाकर हादी को फिर से सत्ता में लाने की कोशिश की. इस अभियान में यूएई और बहरीन ने भी सऊदी अरब का साथ दिया.
हूती विद्रोहियों ने इन हमलों का सामना किया और यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा.
2017 में हूतियों ने अली अब्दुल्लाह सालेह की हत्या कर दी. सालेह ने हूतियों से अपना गठबंधन तोड़कर सऊदी अरब के साथ जाने की कोशिश की थी.
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