ट्रंप को अपनी पाबंदियों पर भरोसा, क्या ईरान के पास है इस दांव की काट?

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- Author, अमीर अज़ीमी
- पदनाम, संपादक, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अमेरिका का कहना है कि उसने दुनिया भर में ईरान के वित्तीय ठिकानों पर 'बड़ा आर्थिक हमला' शुरू किया है.
वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि प्रतिबंधों के दायरे में डिजिटल संपत्ति, टेक्नोलॉजी, सोना, विमानन और शिपिंग शामिल हैं. उन्होंने कहा कि जो भी देश ईरान के साथ वित्तीय साझेदारी करेगा उसे अलग-थलग कर दिया जाएगा.
हालांकि, बेसेंट की इसे 'इकोनॉमिक डी-डे' (अर्थव्यवस्था पर बड़े हमले का दिन) करार देने वाली घोषणा अमेरिका में जितनी नाटकीय लगी उतनी ईरान में नहीं.
घोषणा के कुछ ही समय बाद ईरान के वित्त मंत्री अली मदानिजादेह ने इसे 'वही पुरानी बात' बताया और कहा कि ईरान 'हर स्थिति के लिए' तैयार है. उन्होंने कहा कि ईरान को इन कदमों की आशंका थी और उसने उनसे निपटने की योजना बना रखी थी.
ईरानी वित्त मंत्री की प्रतिक्रिया उस सबसे बड़े सवाल की ओर इशारा करती है, जो शायद ईरान के नेता पूछ रहे होंगे: अमेरिका आख़िर अब ऐसा क्या कर सकता है, जो वह पहले ही करके नहीं देख चुका है?
बेसेंट ने उन देशों, बैंकों और कंपनियों पर व्यापक अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है, जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखते हैं. लेकिन मूल नीति नई नहीं है.
ईरान कई साल से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. इनमें उसके साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध भी शामिल हैं.
ईरान के लिए अहम सवाल

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ईरान के लिए अहम सवाल यह है कि क्या अमेरिका पहले के मुक़ाबले और व्यापक स्तर पर प्रतिबंध लागू कर सकता है.
अमेरिकी नाकाबंदी का असर पहले से ही पड़ रहा है. इससे ईरान की समुद्र के रास्ते तेल निर्यात करने की क्षमता पहले की तुलना में कम हुई है. साथ ही, सामान और उपकरण आयात करना भी मुश्किल हुआ है.
ईरान की सात देशों के साथ लंबी ज़मीनी सीमाएं हैं और उसके पास प्रतिबंधों से बचने के लिए इन रास्तों को इस्तेमाल करने का सालों का अनुभव है. लेकिन ज़मीनी रास्ते आसानी से समुद्री व्यापार की जगह नहीं ले सकते, ख़ासकर तेल निर्यात के मामले में.
इसलिए यह दबाव उस स्थिति में काफ़ी गंभीर हो सकता है, जब अमेरिका उन चैनलों को भी बंद करने में कामयाब हो जाए, जो पिछले प्रतिबंधों के बावजूद खुले रहे हैं. ख़ास तौर पर चीन और ईरान के पड़ोसी देशों से जुड़े चैनल.
यह आसान काम नहीं है. चीन के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को इन प्रतिबंधों को गैरक़ानूनी बताते हुए कहा कि वह इनका दृढ़ता से विरोध करता है.
अगर प्रतिबंध नाकाम रहते हैं, तो बेसेंट के एलान से ईरान के भीतर उन लोगों की स्थिति मज़बूत हो सकती है, जो अमेरिका के साथ समझौते के विरोधी हैं.
वे तर्क दे सकते हैं कि अमेरिका फिर से आर्थिक दबाव का सहारा ले रहा है, क्योंकि उसके पास दूसरे विकल्प सीमित हैं.
नया सैन्य अभियान जोखिम भरा है, जबकि सालों के प्रतिबंध भी ईरान को अमेरिकी मांगों के आगे झुकने को मजबूर नहीं कर पाए हैं.
अधिकतम दबाव की रणनीति का असर

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अमेरिका ने कूटनीति के लिए गुंज़ाइश भी बहुत कम छोड़ी है.
हालांकि पाकिस्तान और दूसरे मध्यस्थ अब भी बातचीत फिर से शुरू कराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने आगे और हमले करने की संभावना से इनकार नहीं किया है.
नए सिरे से दी जा रही धमकियां उन ईरानी अधिकारियों की स्थिति को कमज़ोर कर सकती हैं, जो समझौते के पक्ष में हैं.
युद्ध शुरू होने से पहले ही ईरान गंभीर आर्थिक संकट में था. वहां महंगाई बहुत ज़्यादा थी और उसकी मुद्रा तेज़ी से कमज़ोर हो रही थी. 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल के हवाई हमलों के साथ लड़ाई शुरू होने के बाद ईरान की स्थिति और ख़राब हो गई है.
ईरान की मुद्रा, रियाल, के कमज़ोर होने का असर बेहद तीखा और व्यापक रूप से महसूस किया जा रहा है.
आयात महंगे हो गए हैं, कारोबारियों के लिए कोई योजना बनाना मुश्किल हो गया है और लोगों की बचत का कोई मूल्य नहीं रह गया है. तेल निर्यात पर लगी पाबंदियों की वजह से सरकार को विदेशी मुद्रा मिलना भी कम हो गया है.
34 साल की नेगिन (बदला हुआ नाम) का कहना है कि उनकी मासिक आय अब करीब 100 डॉलर है. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं सिनेमा, थिएटर या कंसर्ट में नहीं जाती. मैं किसी के लिए तोहफ़ा नहीं खरीदती. मैं जन्मदिन की पार्टियों में शामिल नहीं होती. मैं सरकारी सब्सिडी वाले वाउचर से ही मांस ख़रीद सकती हूं. वरना मैं इसे ख़रीद भी नहीं पाती."
दो बच्चों की मां और गृहिणी मोना का कहना है कि युद्ध शुरू होने के बाद से उनके पति बेरोज़गार हो गए हैं. वह कहती हैं, "हम डरे हुए हैं, ख़ासकर कल शुरू हुए प्रतिबंधों के बाद से. जंग शुरू होने के बाद से मेरे पति काम पर वापस नहीं गए हैं. पहले वह जहाज़ों पर काम करते थे."
वह कहती हैं, "हम जितना हो सके अपने खर्चों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमें अपने सभी अतिरिक्त खर्चों और छोटी-मोटी सुविधाओं में निश्चित रूप से कटौती करनी पड़ी है."
ईरान किस बात का इंतज़ार कर रहा है?

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ईरान को लग सकता है कि समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ख़िलाफ़ चल रहा है. होर्मुज़ स्ट्रेट में और रुकावट से तेल और पेट्रोल की क़ीमतें बढ़ सकती हैं. इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी और नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले यह ट्रंप के लिए राजनीतिक समस्या बन सकती है.
इससे ईरान को नज़र रखने के लिए एक निश्चित दिन तो मिल गया है, लेकिन अमेरिकी चुनावों पर भरोसा करना जोखिम भरा भी है.
तब तक ईरान की अर्थव्यवस्था काफ़ी कमजोर हो सकती है.
और मध्यावधि चुनाव के बाद एक और समस्या है. ट्रंप 2028 में दोबारा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. ऐसे में उनके मौजूदा प्रशासन को ईरान के साथ टकराव जारी रखने और उसकी क़ीमत चुकाने की ज़्यादा आज़ादी महसूस हो सकती है.
इसलिए ईरान की नज़र दो घड़ियों पर है.
एक राजनीतिक घड़ी, जो वॉशिंगटन में चल रही है. और दूसरी आर्थिक घड़ी है, जो ईरान के भीतर चल रही है.
हर महीने तेल निर्यात में कमी, व्यापार में रुकावट और रियाल पर दबाव के कारण जंग ख़त्म करने वाले समझौते का इंतज़ार और महंगा होता जा रहा है.
इससे ईरान के नेताओं के सामने एक मुश्किल चुनाव खड़ा हो गया है. अभी समझौता करना दबाव में आत्मसमर्पण करने जैसा लग सकता है और उन कट्टरपंथियों की स्थिति मजबूत कर सकता है, जो कहते हैं कि अमेरिका अब और भी ज़्यादा मांगें करेगा.
अगर ट्रंप की रणनीति राजनीतिक या आर्थिक समस्याओं में फंस जाती है तो इंतज़ार करने से ईरान की स्थिति बेहतर हो सकती है.
लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि ईरान को बाद में और कमज़ोर अर्थव्यवस्था के साथ बातचीत के लिए तैयार होना पड़े.
अब काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि ईरान के बाहर क्या होता है.
अगर चीनी बैंक, क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदार और कंपनियां अमेरिका की ओर से सज़ा दिए जाने के डर से पीछे हटने लगती हैं तो बेसेंट का अभियान तेहरान का गणित गड़बड़ा सकता है.
अगर ऐसा नहीं होता तो इसका उलटा असर हो सकता है.
समझौते का विरोध करने वाले ईरानी कहेंगे कि अमेरिका ने एक और निर्णायक दांव खेल लिया, लेकिन इससे संतुलन में कोई बदलाव नहीं आया है, और ईरान को या तो इंतज़ार करना चाहिए या प्रतिरोध जारी रखना चाहिए.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
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