राम मंदिर चंदा मामला: अयोध्या में अब श्रद्धालु क्या सोच रहे हैं और आगे की राह क्या होगी?

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राम मंदिर चंदे में गड़बड़ी के आरोप लगने के बाद इस मामले में एसआईटी बनी, पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज की और फिर ट्रस्ट के दो प्रमुख लोगों का इस्तीफ़ा भी हुआ.
इन सबके बावजूद इस घटना की न तो चर्चा थमी है और न ही दान से जुड़ी अनियमितताओं को लेकर, आम राम भक्तों के मन की सभी आशंकाओं के उत्तर मिले हैं.
बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में शामिल हुए विश्व हिन्दू संगठन (वीएचपी) के अंतरराष्ट्रीय प्रमुख आलोक कुमार ने स्वीकार किया कि "इससे राम भक्त आहत हैं और दोषियों को दंड दिलाकर हमें प्रायश्चित करना होगा."
उधर, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला केवल आपराधिक जांच का नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन, जवाबदेही और सरकारी निगरानी से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े करता है.
हालांकि चोरी का पूरा विवरण और ज़िम्मेदारियों का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही होगा.
फ़िलहाल माना जा रहा है कि दान से जुड़े इस विवाद का असर राम मंदिर ट्रस्ट, संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद और करोड़ों श्रद्धालुओं के भरोसे पर पड़ सकता है.
सवाल यह भी है कि क्या राम मंदिर की ज़िम्मेदारी अब प्रशासनिक हाथों में जा सकती है और इस विवाद का यूपी चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है?
इन्हीं मुद्दों पर कलेक्टिव न्यूज़ के डायरेक्टर ऑफ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने विशेषज्ञों से बात की.
कार्यक्रम में जुड़े वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी, विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार और बीबीसी हिन्दी की यूपी संवाददाता प्रेरणा, जिन्होंने अपने विचार रखे.
दान विवाद पर अयोध्या के लोगों की प्रतिक्रिया

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राम मंदिर दान में गड़बड़ी को लेकर अयोध्या के स्थानीय लोगों के बीच कैसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं?
इसके जवाब में संवाददाता प्रेरणा ने कहा कि स्थानीय लोगों ने कहा है कि वे दान चोरी के मामले में शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं, दूर-दूर से उनके रिश्तेदार तक इस बारे में फ़ोन करके पूछ रहे हैं.
उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग कह रहे हैं कि विवाद शुरू होने के बाद से श्रद्धालु घटे हैं. वे ख़ुद भी पिछले दस दिनों में मंदिर आने वालों की घटती संख्या देख चुकी हैं. हालांकि इसका एक कारण स्कूल खुल जाना हो सकता है.
स्थानीय दुकानदारों का हवाला देते हुए वह कहती हैं कि ये लोग रोज़ी-रोटी पर पड़ रहे असर से परेशान हैं और सख़्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "जो लोग एक दिन में 800 रुपये कमाते थे, वो अब 100-200 रुपये कमा रहे हैं."
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साथ ही, संवाददाता प्रेरणा ने बताया कि मंदिर में दर्शन करने के लिए आने वाले कुछ लोगों ने कैमरे पर बताया है कि "जब तक ये विवाद सुलझ नहीं जाता, वे दानपात्र में कोई दान नहीं देंगे."
वहीं, विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार भी मानते हैं कि श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हैं.
उन्होंने कहा, "सच कहूं तो हमें भी बहुत पीड़ा हुई है. हममें से कोई भी इस घटना का बचाव नहीं कर सकता और न ही इसके पक्ष में कोई तर्क दे सकता है."
"हमने शुरुआत से ही स्पष्ट कहा कि चढ़ावे में चोरी हुई है. अब इस तथ्य पर बहुत अधिक संदेह की गुंजाइश नहीं बची है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है और इसका प्रायश्चित होना चाहिए."
हालांकि वो यह भी कहते हैं कि अयोध्या का संबंध राम और राम भक्तों का है, इसमें प्रबंधन की सीधे कोई भूमिका नहीं है. इस संबंध पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
वो कहते हैं कि "प्रबंधन को अपने कार्यों में सुधार लाना होगा और उन्हें चलता है कि वे इसको लेकर अब सचेत रहेंगे."
विवाद के बाद राम मंदिर में क्या बदला?

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यह मामला सामने आने के बाद परिसर के भीतर दर्शन और दान से जुड़ी व्यवस्था में क्या कोई बदलाव हुआ है?
संवाददाता प्रेरणा ने कहा कि राम मंदिर में दान से जुड़ी पूरी प्रक्रिया पहले से ही पूरी तरह पारदर्शी नहीं मानी जाती थी.
अब जब यह विवाद सामने आया है, तो पारदर्शिता बढ़ाने की बात ज़रूर की जा रही है, लेकिन अभी भी बहुत सी जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ रही है.
उन्होंने कहा कि मंदिर प्रशासन या जांच एजेंसियों की ओर से भी बदलावों का विस्तृत ब्योरा साझा नहीं किया गया है.
हालांकि वह स्थानीय पत्रकारों के हवाले से बताती हैं कि परिसर के भीतर कुछ सुरक्षा उपाय सख्त किए गए हैं. पहले जहां कर्मचारियों की पहचान थंब इम्प्रेशन या फेस रिकग्निशन के आधार पर होती थी, अब उनके प्रवेश के दौरान बॉडी चेकिंग भी की जा रही है.
मंदिर परिसर में पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई है और मीडिया की पहुंच भी पहले की तुलना में सीमित कर दी गई है.
उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि दान की गिनती से जुड़े कर्मचारियों को जेब वाले कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी, लेकिन फिर भी ऐसा हो रहा था. मगर अब अधिक सख्ती से ध्यान दिया जा रहा है.
हालांकि वह कहती हैं कि ये जानकारियां मुख्य रूप से स्थानीय पत्रकारों और सूत्रों के हवाले से सामने आई हैं, इसलिए यह स्पष्ट तौर पर कहना मुश्किल है कि व्यवस्था में अंदरूनी स्तर पर और क्या बदलाव किए गए हैं.
वह यह भी बताती हैं कि मामला खुलने के बाद से जांच को लेकर स्थानीय पत्रकारों को कोई अपडेट नहीं मिल रहे हैं. उन्होंने बताया कि एक अफ़सर ने उनसे ऑफ़ द रिकॉर्ड मामले की जांच पर बात की.
प्रेरणा ने बताया कि पुलिस के अनुसार, न्यायिक हिरासत में भेजे गए आठ अभियुक्तों के घरों से करीब 80 लाख रुपये नक़द बरामद किए गए हैं, लेकिन किसके पास से कितनी रक़म मिली, इसकी कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई.
उनका कहना है कि मामले की पूरी तस्वीर तब ही स्पष्ट होगी जब दान गिनने के लिए नियुक्त कर्मचारियों की भर्ती, वेतन और सेवा अवधि जैसी जानकारियां सामने आएंगी. साथ ही, जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि नियुक्तियों में किसी प्रकार की रिश्वतखोरी या अनियमितता तो नहीं हुई थी.
यूपी चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अगले वर्ष होने हैं, तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा किस तरह आकार ले रहा है?
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी का मानना है कि इससे बीजेपी की साख़ को ज़्यादा बड़ा नुक़सान हुआ है क्योंकि लोगों का भरोसा टूटा है. मगर उतना बड़ा राजनीतिक नुक़सान होता हुआ कम दिखता है.
वह उदाहरण देते हुए कहते हैं, "जिस तरीके से राम मंदिर बनने से चुनाव ने बीजेपी की झोली नहीं भरी थी, उसी तरह अब इससे जुड़े चंदा विवाद से उसकी झोली ख़ाली भी नहीं होगी."
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही चुनाव होने वाले हैं इसलिए इस पूरे मामले की ज़िम्मेदारी सीएम योगी आदित्यनाथ को दे दी गई है. केंद्रीय नेतृत्व इस पर बात करता नहीं दिखना चाहता क्योंकि इससे फिर पूरे देश में बात होगी.
वह उदाहरण देते हैं, "शुरुआत में नृपेंद्र मिश्रा अचानक दिल्ली से अयोध्या पहुंचे और उन्होंने कहा कि इस मामले में नीयत तो ठीक है, निगरानी में गड़बड़ हुई है. लेकिन उसके बाद आगे इस पर कोई चर्चा नहीं हुई."

उधर, बीबीसी संवाददाता प्रेरणा कहती हैं कि अयोध्या क्षेत्र की विधानसभा सीटों पर अब भी बीजेपी का प्रभाव दिखाई देता है, भले लोकसभा में सपा जीती थी.
इसके बावजूद इस विवाद का कुछ राजनीतिक नुक़सान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है. लेकिन चुनाव तक इस मुद्दे को ज़िंदा रखना विपक्ष के लिए चुनौतीपूर्ण होगा.
वह कहती हैं कि "स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर सरकार के प्रति दो बातों पर मुख्य नाराज़गी दिखती है. पहली यह कि बुलडोज़र कार्रवाइयों से चर्चित योगी आदित्यनाथ के प्रशासन में इस मामले की जांच धीमी क्यों चल रही है?"
"दूसरा, इस पूरे घटनाक्रम में प्रभावशाली या बड़े लोगों की भूमिका की जांच और जवाबदेही तय हो."
चंदा विवाद को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तेज़ी न दिखाए जाने के दावे से विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार सहमत नहीं हैं.
वह कहते हैं कि "किसी के घर पर चोरी हो जाए तो वह तुरंत केस दर्ज करवाने नहीं चला जाता, पहले सीसीटीवी चेक करके या अपने ख़ज़ाने की पड़ताल करके समझता है कि क्या वाकई चोरी हुई है, यही ट्रस्टियों ने भी किया."
राम मंदिर का प्रबंधन प्रशासनिक हाथों में जा सकता है?
विश्व हिंदू परिषद हमेशा यह कहता रहा है कि मंदिरों को सरकारों के प्रभाव और नियंत्रण से मुक्त रहना चाहिए. ऐसे में चढ़ावे में गड़बड़ी की घटना के चलते क्या लोगों का भरोसा पहले जैसा बना रह पाएगा?
इसके जवाब में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, "मैं मानता हूं कि इस घटना के बाद लोगों के मन में संदेह ज़रूर पैदा हुआ होगा और स्वाभाविक रूप से ग़ुस्सा भी आया होगा."
"अगर मामले में जल्द से जल्द न्याय हो तो विश्वास फिर से बहाल हो सकता है. इसीलिए मुझे नहीं लगता कि इस घटना का मंदिर-मुक्ति अभियान पर कोई बहुत बड़ा या स्थायी प्रभाव पड़ेगा."
हालांकि आलोक कुमार नहीं मानते कि इस मामले का असर मंदिर आंदोलन में वैचारिक अभियान चलाने वाले विश्व हिन्दू परिषद की छवि पर पड़ेगा. मगर उन्होंने दोहराया कि प्रायश्चित होना चाहिए.
पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि इस गड़बड़ी के बाद केवल पारंपरिक व्यवस्था पर निर्भर रहना मुश्किल होगा. विश्व हिंदू परिषद लंबे समय से प्रशासनिक और पेशेवर हस्तक्षेप का विरोध करती रही, लेकिन अब किसी न किसी पेशेवर व्यवस्था की संभावना बढ़ गई है.
चर्चा है कि भविष्य में किसी अनुभवी प्रशासक, पूर्व आईएएस अधिकारी, सैन्य अधिकारी या पेशेवर सीईओ को ज़िम्मेदारी दी जा सकती है, ताकि वित्तीय प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था अधिक पारदर्शी बनाई जा सके.
चंपत राय की भूमिका पर क्या सवाल हैं?

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राम मंदिर चंदा विवाद में ट्रस्ट और चंपत राय की भूमिका को कैसे देखा जाना चाहिए. अयोध्या ज़िला बार एसोसिएशन ने इस मामले में चंपत राय पर केस दर्ज करने की मांग उठाई है, इस पर क्या प्रतिक्रिया है?
राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत से ही चंपत राय इससे जुड़े रहे हैं. 2020 में बने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का उन्हें महासचिव बनाया गया था.
ट्रस्ट और चंपत राय की भूमिका के सवाल पर वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि वह इस विवाद पर दो तरह की ज़िम्मेदारी देखते हैं- नैतिक और आपराधिक ज़िम्मेदारी.
उन्होंने कहा, "हम मंदिर प्रबंधन को इस मामले की गड़बड़ी की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं कर रहे हैं. उनकी ज़िम्मेदारी है, मगर उनकी आपराधिक ज़िम्मेदारी कितनी बड़ी है, यह पुलिस और एसआईटी की रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा."
ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफ़ा देने वाले चंपत राय की भूमिका को लेकर उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि इस विवाद में चंपत जी का किसी भी स्तर पर कोई हाथ था. मगर हाथ नहीं था तो भी सवाल है कि क्या पता नहीं रखना चाहिए था. क्या ये अनदेखी नहीं है. अनदेखी तो है.. मगर कितनी है और इसका परिणाम क्या होना चाहिए, ये चीज़ें जांच से पता लगेंगी."
अयोध्या बार एसोशिएशन ने इस मामले पर चंपत राय के ख़िलाफ़ एफ़आईआर कराने की मांग उठाई है. इस मांग को लेकर प्रतिक्रिया देते हुए आलोक कुमार ने कहा, "चंपत जी, इस एफ़आईआर के अंतर्गत आते हैं. उनके ख़िलाफ़ जांच होनी चाहिए."
दरअसल पुलिस की ओर से दर्ज एफ़आईआर में आठ नामजद और एक अज्ञात पर केस दर्ज हुआ है.

साथ ही, आलोक कुमार ने ज़िला बार एसोशिएशन के उस कदम को राजनीति से प्रेरित बताया, जिसमें इस विवाद के अभियुक्तों के मुकदमे न लड़ने का ऐलान किया गया है.
दूसरी ओर, चंदा चोरी के मामले में चंपत राय की भूमिका को लेकर संघ और वीएचपी की ओर से सीधी प्रतिक्रिया नहीं दिए जाने को लेकर सीनियर पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा, "चंपत राय की वीएचपी और आरएसएस दोनों में ही साख रही है. इसलिए दोनों पक्षों ने प्रतिक्रिया देने में सोच समझकर देरी की. हालांकि अंदर मंथन हुआ. आगे कर्नाटक के हुगली में होने वाली बैठक में भी इस पर चर्चा होगी, उनकी विदाई तय है."
वह यह भी कहते हैं, "ये पूरे एक परिवार (संघ) का मामला था, फिर ये भेद किसी विभीषण के चलते ही खुला इसलिए भी प्रतिक्रिया में देरी हुई."
इस मामले में कोषाध्यक्ष के नैतिक ज़िम्मेदारी न लेने के मुद्दे पर भी वरिष्ठ पत्रकार ने प्रतिक्रिया दी.
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि मामला केवल कुछ व्यक्तियों के इस्तीफे़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे ट्रस्ट की संरचना की समीक्षा हो सकती है. चंपत राय जी और अनिल मिश्रा जी के इस्तीफे की घोषणा कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी जी की ओर से जारी विज्ञप्ति में की गई, इसलिए वित्तीय गड़बड़ियों के संदर्भ में उनकी भूमिका और जवाबदेही पर भी स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं."
उन्होंने यह भी बताया कि संघ, विश्व हिंदू परिषद और ट्रस्ट के भीतर इस मुद्दे पर मंथन चल रहा है. कई अन्य लोगों की ज़िम्मेदारियों पर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं. ऐसे में ट्रस्ट के पुनर्गठन, पेशेवर प्रबंधन और अधिक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की संभावना दिखाई देती है.
संभावना है कि भविष्य में ट्रस्ट में व्यापक बदलाव किए जाएं और सरकार की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकती है. कुल मिलाकर, यह मामला केवल इस्तीफ़ों का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की समीक्षा और पुनर्गठन का बनता दिख रहा है.
'यह मामला सिर्फ़ एक चोरी का नहीं'
अब तक जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके हिसाब से इस चंदा चोरी का तरीक़ा क्या नज़र आता है?
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अपने सूत्रों से मिली जानकारियों के हवाले से दावा किया, "बताया जाता है कि नोट गिनने का काम एसबीआई की ओर से आउटसोर्स किया गया था और नियुक्त लोगों में कई ऐसे थे जिनके पास आवश्यक योग्यता या अनुभव नहीं था. इनमें से अधिकांश लोग संघ और वीएचपी के बताए जाते हैं."
उन्होंने कथित चोरी के तरीके को लेकर कहा, "मुझे जो जानकारी मिली है उसके हिसाब से ये लोग कैमरों के सामने समूह बनाकर खड़े हो जाते थे, जिससे निगरानी प्रभावित होती थी. इसी दौरान नक़दी में हेराफेरी की जाती थी और अतिरिक्त नक़दी की गड्डियां बैंक भेजी जाने वाली रकम में शामिल कर दी जाती थीं. बाद में बैंक स्तर पर उस रुपये को निकाल लिया जाता था. यही कथित मॉडस ओपरेंडी (कार्यप्रणाली) बताया जा रहा है."
हालांकि उनके इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने यह भी कहा कि "चोरी के तरीके को लेकर जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार इस संबंध में शिकायतें पहले भी की गई थीं."
उनके मुताबिक़, करीब छह महीने पहले एसबीआई और निजी ऑडिटरों ने एसओपी के पालन में गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाया था, लेकिन मामला चलता रहा.
वह कहते हैं कि यह सवाल केवल पकड़ी गई चोरी का नहीं, बल्कि कुल प्राप्त धनराशि का है. वह कुंभ के दौरान मंदिर को मिले चंदे का मुद्दा उठाते हैं.
उन्होंने कहा, "ट्रस्ट ने बताया कि 16 करोड़ श्रद्धालु आए और लगभग 84 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ. औसतन यह राशि प्रति श्रद्धालु लगभग 5 रुपये बैठती है, जिस पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं."
इन दावों के बीच यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मंदिर आने वाले सभी श्रद्धालु दान नहीं करते.
फ़िलहाल पत्रकार विजय त्रिवेदी का कहना है कि असली सवाल केवल पकड़ी गई कथित चोरी का नहीं, बल्कि कुल प्राप्त दान राशि का है. उनके अनुसार जांच का दायरा केवल बरामद राशि तक सीमित न रहकर यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि ट्रस्ट को कुल कितना चंदा मिला और उसका पूरा लेखा-जोखा क्या है.
आलोचकों का भी कहना है कि आय, चढ़ावे और वित्तीय रिकॉर्ड की व्यापक एवं पारदर्शी जांच ज़रूरी है, क्योंकि फ़िलहाल कई सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं.
हालांकि ट्रस्ट और वीएचपी का कहना है कि जांच प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही है.
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