चींटियों से सीखिए बेहतर फ़ैसला लेने का तरीक़ा

एक हरे पत्ते पर बैठी लाल चींटी

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इमेज कैप्शन, चींटियां ऐसी स्थिति में काफ़ी सोच-समझकर फ़ैसला लेती हैं, जब उनके सामेन कई विकल्प होते हैं
    • Author, सोफ़िया क्वागलिया
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

हम इंसान खुद को अपनी सोचने और तर्क करने की क्षमता के कारण विकास की सीढ़ी में सबसे ऊपर मानते है.

हालांकि, कई बार लंबा विचार-विमर्श करने के बावजूद इंसान ग़लत फ़ैसले ले बैठता है.

इससे उलट, बेहद छोटे और एक बीज जितने आकार के दिमाग़ वाले कीड़े, निर्णय लेने के मामले में चौंका सकते हैं.

कीड़ों की समस्या सुलझाने की क्षमता से प्रेरित होकर इंसानों ने वास्तविक जीवन में बेहतर और तेज़ फ़ैसले लेने के लिए कई तरीके (एल्गोरिदम) सीखे हैं.

कीड़ों के निर्णय लेने के तरीक़े से पांच अहम बातें सीखी जा सकती हैं, जो इंसानों को बेहतर और अधिक समझदारी भरे फ़ैसले लेने में मदद कर सकती हैं.

चींटियां सब रास्ते एक्सप्लोर करती हैं

किसी काम को पूरा करने के लिए सबसे बेहतर तरीक़ा चुनना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब किसी व्यक्ति के सामने एक साथ कई विकल्प मौजूद हों. इस स्थिति को 'चॉइस ओवरलोड' कहा जाता है.

चींटियों के सामने भी ऐसी ही परेशानी होती है, विशेषकर तब जब उन्हें भोजन की तलाश के लिए जगह चुनने का फ़ैसला मिलकर करना होता है.

लेकिन कई प्रजातियों की चींटियों ने इससे निपटने का एक आसान तरीक़ा विकसित किया है.

शुरुआत में, चींटियां अपने बिल से बाहर निकलती हैं और पास की ऐसी जगह खोजती हैं, जहां उन्हें अच्छा खाना मिल सके.

ये खोजी चींटियां अलग-अलग रास्तों पर बेतरतीब ढंग से निकलती हैं, ताकि उनके पास सभी विकल्प खुले रहें और कई रास्तों को देख सकें.

रास्ते में जाते और लौटते समय वे ज़मीन पर फेरोमोन की हल्की गंध छोड़ती हैं, ताकि दूसरी चींटियां बाद में उस रास्ते का पीछा कर सकें.

फेरोमोन एक तरह का रासायनिक पदार्थ है, जिसे कीट और कुछ जीव-जंतु अपने शरीर से बाहर निकालते हैं.

समय के साथ फेरोमोन की गंध कम हो जाती है. इसलिए चींटियां उस रास्ते को ज़्यादा पसंद करती हैं, जहां फेरोमोन की गंध सबसे तेज़ होती है.

चींटियां

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इमेज कैप्शन, भोजन की तलाश में निकली चीटियां अपने पीछे फेरोमोन छोड़ जाती हैं, इसको पहचानकर दूसरी चींटियां उन्हें फॉलो करती हैं
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जो चींटियां सबसे अच्छा और आसान रास्ता ढूंढ लेती हैं, वे खाना लेकर जल्दी वापस आ जाती हैं. वे फेरोमोन की गंध ख़त्म होने से पहले उसी रास्ते पर फिर से गंध छोड़ देती हैं.

इससे दूसरी चींटियां भी उस रास्ते पर जाने लगती हैं. धीरे-धीरे बहुत सारी चींटियां उसी रास्ते से आने-जाने लगती हैं और वहां ज़्यादा फेरोमोन जमा हो जाता है.

इसलिए उस रास्ते की गंध तेज़ हो जाती है और चींटियां उसे और आसानी से पहचान लेती हैं.

इस तरह समय के साथ अच्छे रास्ते पर ज़्यादा फेरोमोन जमा होता जाता है, जबकि दूसरे रास्तों पर इसकी गंध धीरे-धीरे ख़त्म हो जाती है.

आखिर में, चींटियों की पूरी टोली मिलकर सबसे आसान रास्ता खोज लेती है.

बेल्जियम की यूनिवर्सिटी लिब्रे डी ब्रुसेल्स की आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस लैब के को-डायरेक्टर मार्को डोरिगो कहते हैं, "इससे हमें यह सीख मिलती है कि बिना किसी सेंट्रलाइज़्ड कंट्रोल के भी, मिल-जुलकर सही फ़ैसले लिए जा सकते हैं."

वो कहते हैं, "चींटी बहुत साधारण जीव है. उनके पास सीमित क्षमताएं और अपने आसपास की जानकारी होती है. फिर भी वे मिलकर बहुत जटिल समस्याओं का समाधान कर लेती हैं."

इस तरीके को 'एंट कॉलोनी ऑप्टिमाइज़ेशन' कहा जाता है. इसे एक कंप्यूटर प्रोग्राम (एल्गोरिदम) के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है.

इसकी मदद से दुनिया भर में लोगों के काम का समय तय करने, टेलीकॉम, यातायात और सामान पहुंचाने की व्यवस्था को बेहतर बनाया जाता है.

उदाहरण के लिए, विशेषज्ञों ने इसका इस्तेमाल रेलवे की योजना बनाने में किया है.

मार्को डोरिगो ने 'एंटनेट' नाम का एक सिस्टम भी बनाया, जो कम्यूनिकेशन नेटवर्क में जानकारी को एक जगह से दूसरी जगह जल्दी और सही तरीके से पहुंचाने में मदद करता है.

मधुमक्खियां कैसे फ़ैसला लेती हैं?

नया छत्ता बनाने के लिए जगह खोजते समय मधुमक्खियां, चींटियों के तरीक़े से काफ़ी मिलता-जुलता रास्ता ही अपनाती हैं.

मधुमक्खियां भी चींटियों की तरह मिल-जुलकर अपने लिए नया घर बनाने की जगह खोजती हैं.

कुछ मधुमक्खियां बाहर जाकर चींटियों की तरह अलग-अलग जगहों पर उड़ती हैं.

लेकिन चींटियों की तरह वे फेरोमोन छोड़ने की बजाय, वापस छत्ते में आकर दूसरी मधुमक्खियों को बताती हैं कि कौन-सी जगह अच्छी है.

इसके लिए वे 'वैगल डांस' करती हैं. वे अपने शरीर को एक ख़ास तरीके से हिलाकर बताती हैं कि नई जगह कितनी सुरक्षित है, कितनी पास है, कितनी बड़ी है और कितनी अच्छी है.

जितनी अच्छी जगह होती है, उतनी देर तक मधुमक्खियां नाचती हैं.

मधुमक्खी की क्लोज-अप तस्वीर

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इमेज कैप्शन, मधुमक्खियां अहम फ़ैसलों के लिए अनोखा तरीक़ा अपनाती हैं

समय के साथ एक जगह सबसे ज़्यादा पसंद की जाने लगती है. क़रीब 20–25 मधुमक्खियां एक ही जगह के बारे में अच्छा संकेत देने के लिए डांस करते हुए लौटती हैं.

जब पर्याप्त मधुमक्खियां उस जगह को पसंद कर लेती हैं, तो सभी मिलकर उसी जगह जाने का फ़ैसला करती हैं.

यह कुछ-कुछ इंसानों के लोकतंत्र में बहुमत से फ़ैसला लेने जैसा है.

टिड्डियों में फ़ैसले बदलने का हुनर

जब किसी ग्रुप में दो अलग-अलग राय होती है, तो लोगों को अपनी राय बदलने के लिए मनाना बहुत मुश्किल होता है.

फिर बहस बढ़ते-बढ़ते ऐसी हो जाती है कि लोग कहते हैं, "बस यही सही है, दूसरा ग़लत है." इससे हर कोई अपनी बात पर और ज़्यादा अड़ जाता है.

बहुत छोटी उम्र की टिड्डियां उड़ना नहीं जानतीं, इसलिए वे एक जगह से दूसरी जगह चलकर जाती हैं.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ के मैथेमेटिकल बायोलॉजी के प्रोफ़ेसर क्रिश्चियन (किट) येट्स ने अपने प्रयोग में टिड्डियों के ग्रुप्स को एक सर्कुलर जगह में रखा.

उन्होंने देखा कि टिड्डियां मिलकर यह तय करती हैं कि किस दिशा में जाना है.

उन्होंने पाया कि टिड्डियां कुछ देर रुकने या असमंजस में पड़ने के बाद बार-बार अपनी दिशा बदल लेती हैं. यानी पहले एक दिशा में जाने का फ़ैसला करती हैं, फिर रुककर दूसरी दिशा में मुड़ जाती हैं.

जब टिड्डियों का झुंड किसी एक दिशा में आगे बढ़ रहा होता है, तो कुछ टिड्डियां थोड़ी देर के लिए चलना रोक देती हैं और न तो 'एक्स' को चुनती हैं, न 'वाई' को.

यह छोटा-सा रुकने का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है. इसी वजह से पूरा झुंड एक फ़ैसले से दूसरे फ़ैसले पर आसानी से शिफ़्ट हो पाता है.

येट्स ने 19 लोगों पर भी ऐसा ही एक प्रयोग किया. इसमें लोगों को 'एक्स' या 'वाई' में से कोई एक चुनना था, लेकिन उनके पास यह विकल्प भी था कि वे कुछ समय के लिए कोई फ़ैसला न लें.

नतीजा यह निकला कि जब लोगों को कुछ समय के लिए फ़ैसला न लेने का ऑप्शन दिया गया, तो पूरा ग्रुप जल्दी और आसानी से एक ही फ़ैसले पर पहुंच गया.

यानी, कभी-कभी तुरंत फ़ैसला लेने के बजाय थोड़ी देर रुकना पूरे ग्रुप को एक फ़ैसले पर पहुंचने में मदद करता है.

येट्स के मुताबिक, टिड्डियों की तरह इंसानों में भी जब किसी विकल्प को न चुनने की सुविधा दी गई, तो इससे ग्रुप को ज़्यादा जल्दी से किसी एक फ़ैसले पर पहुंचने में मदद मिली.

येट्स का कहना है कि जब बहुत सारे लोग एक साथ किसी फ़ैसले पर टिके होते हैं, तो किसी एक व्यक्ति की राय बदलने से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन अगर कई लोग कुछ समय के लिए कोई फ़ैसला लेना बंद कर दें, तो फ़ैसला लेने वाले लोगों का समूह छोटा हो जाता है.

येट्स कहते हैं, "जब फ़ैसला लेने वाले लोग कम हो जाते हैं तो उनकी राय आसानी से बदली जा सकती है."

येट्स का कहना है कि टिड्डियों से हमें यह सीख मिलती है कि कभी-कभी किसी फ़ैसले पर तुरंत पक्ष लेने के बजाय कुछ समय ले लेना ठीक है. इससे सभी लोग दोबारा सोच पाते हैं और आख़िर में एक राय पर पहुंच सकते हैं.

कॉकरोच क्या सीखाते हैं

जब किसी बहस में बहुत से प्रभावशाली लोग शामिल हों, तो ग्रुप का एक फ़ैसले पर पहुंचना मुश्किल होता है. बहुत से लोग ख़ुद को सबसे ख़ास समझते हुए बहस को अपनी दिशा में मोड़ सकते हैं और बाकियों की राय पर हावी हो सकते हैं.

लेकिन कॉकरोचों पर हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि किसी ग्रुप में अलग-अलग तरह के लोग होने से फ़ैसला लेने की प्रक्रिया वास्तव में तेज़ हो सकती है.

कॉकरोच

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इमेज कैप्शन, कॉकरोच से भले ही लोग नफ़रत करते हैं, लेकिन उनमें से कुछ का व्यक्तित्व काफ़ी मज़बूत होता है

कुछ कॉकरोच निडर होते हैं, जबकि कुछ डरपोक होते हैं. इसलिए जापान की टोक्यो मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर इसाक प्लानास सिट्जा ने कंप्यूटर मॉडल के ज़रिए यह देखा कि कॉकरोच मिलकर किसी जगह को कैसे चुनते हैं.

इसमें उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की, कॉकरोच कैसे किसी ख़ास अंधेरे कोने में छिपने की जगह चुनते हैं, जैसे फ़्रिज के पीछे का कोई अंधेरा कोना. इसके उन्होंने तीन तरह के मॉडल बनाए- पहला, जिसमें सभी कॉकरोच का व्यवहार एक जैसा हो. दूसरा, जिसमें कुछ कॉकरोच अलग स्वभाव के हों. तीसरा, जिसमें बहुत सारे कॉकरोच अलग-अलग स्वभाव के हों.

जब सभी कॉकरोच एक जैसा व्यवहार करते थे, तो वे सही फ़ैसला लेने में काफ़ी कमज़ोर थे. लेकिन जब उनके स्वभाव अलग-अलग थे, तो समूह ज़्यादा तेजी से फ़ैसला कर लेता था. इसकी वजह थी कि वे एक-दूसरे के साथ ज़्यादा बातचीत और संपर्क करते थे.

प्लानास सिट्जा कहते हैं, "मैं बहुत हैरान था. मुझे कुछ बदलाव देखने की उम्मीद थी, लेकिन इतना साफ़ नतीजा देखने की उम्मीद नहीं थी."

इसका मतलब यह है कि अगर ग्रुप में सिर्फ़ बहुत ज़्यादा एक्टिव और घूमने-फिरने वाले कॉकरोच हों, तो वे सही जगह चुनने में मुश्किल करेंगे, क्योंकि वे लगातार इधर-उधर घूमते रहेंगे.

वहीं अगर ग्रुप में बहुत ज़्यादा शर्मीले कॉकरोच हों, तो वे जल्दी किसी जगह को चुन लेंगे, लेकिन वह जगह अच्छी हो, यह ज़रूरी नहीं.

प्लानास सिट्जा कहते हैं, "ग्रुप में एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने और अलग-अलग तरह का व्यवहार करने के बीच सही बैलेंस ही ग्रुप की सामूहिक समझ को बेहतर बनाता है. अगर इन छोटे जीवों में भी पर्सनैलिटी इतनी मायने रखती है, तो उन जीवों पर इसका असर और भी ज़्यादा हो सकता है, जो ज़्यादा कॉम्प्लिकेटेड सोशल ग्रुप में रहते हैं."

फैसला लेने से पहले जानकारी जुटाती हैं मक्खियां

कभी-कभी हम अपने मन की आवाज़ को दबा देते हैं ताकि ऐसे फ़ैसले ले सकें, जो हमें तर्कसंगत लगते हैं, भले ही अंदर से वे ग़लत महसूस हों. वहीं, कभी हम पक्के इरादों के आधार पर फ़ैसला लेते हैं और अपनी पिछली ग़लतियों से कुछ नहीं सीखते.

बता दें कि मक्खियां (फ्रूट फ़्लाइज) हमें अपने फ़ैसलों के बारे में ज़्यादा जागरूक रहने के तरीक़े के बारे में बहुत कुछ सिखा सकती हैं.

 फ्रूट फ़्लाइज़

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इमेज कैप्शन, अध्ययनों से पता चलता है कि फ्रूट फ़्लाइज़ फ़ैसला लेने से पहले कई तरह की जानकारी इकट्ठा करती हैं

शोध से पता चलता है कि मक्खियां (फ्रूट फ़्लाइज़) अपने हर क़दम का फ़ैसला लेने के लिए बाहर से मिलने वाली जानकारी और अपने अंदर की जानकारी को बहुत अच्छी तरह समझती और मिलाती हैं. उदाहरण के लिए, जब उन्हें किन्हीं दो तरह की गंध में से एक चुननी होती है, और अगर दोनों गंध एक जैसी हैं, तो ये मक्खियां फ़ैसला लेने में ज़्यादा समय लगाती हैं. ऐसा लगता है जैसे वे दोनों ऑप्शंस के फ़ायदे और नुक़सान को तौल रही हों.

जब उन्हें ऐसा खाना मिलता है जिसका स्वाद अच्छा है लेकिन उसमें पोषण नहीं है, या ऐसा मीठा पदार्थ मिलता है जिसका स्वाद कड़वा है लेकिन वह पौष्टिक है, तो मक्खियां उसके सारे फ़ायदे-नुक़सान का हिसाब लगा सकती हैं. पोषण पाने के लिए वे ख़राब स्वाद वाले खाने को भी खा लेती हैं.

ये मक्खियां आमतौर पर छोटा लेकिन सेफ़ रिवार्ड चुनना पसंद करती हैं, बजाय इसके कि बड़े रिवार्ड के लिए रिस्क लें.

हालांकि, अगर वे बहुत भूखी हों या तनाव में हों, तो उनका फ़ैसला बदल भी सकता है. जब मक्खियों को किसी गंध के साथ अच्छा या बुरा अनुभव कराया जाता है, तो स्वस्थ मक्खियां ऐसी गंध को भी आज़माने की हिम्मत करती हैं, जिसके बारे में उन्हें ज़्यादा जानकारी नहीं होती. लेकिन तनाव में रहने वाली मक्खियां जोखिम लेने से बचती हैं.

मक्खियों की तरह, कई बार हमारी मनःस्थिति भी हमारे फ़ैसलों पर असर डालती है. लेकिन हमारी अंदरूनी भावनाएं और पुराने अनुभव भी हमें सही फ़ैसला लेने में मदद कर सकते हैं. ये भावनाएं ख़ुद और दूसरों के बारे में हमारे छोटे-छोटे अनुभवों और धारणाओं से बनती हैं.

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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