रघु राय ने जब बताया था कि 'फ़ोटोग्राफ़र नहीं होता तो माली होता'

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

जाने-माने फोटोग्राफ़र रघु राय नहीं रहे. शनिवार को 83 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में रघु राय ने अपना काम इस खूबी से किया है कि वे इस दुनिया के कल्ट फ़िगर माने जाते हैं.

फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में उनका जलवा ऐसा रहा कि बढ़ती उम्र के बावजूद भी वे किसी युवा पेशेवर से ज़्यादा व्यस्त रहे.

दुनिया भर की समाचार-पत्रिकाओं से फ़ोटो खींचे जाने के अनुरोध के बीच अपने आख़िरी दिनों में भी वे फ़ोटोग्राफ़ी के इतिहास को संजोने में जुटे थे.

कुछ साल पहले एक बातचीत में रघु राय ने अपनी ज़िंदगी की तस्वीर खोल कर दिखाई थी.

बातचीत के दौरान वो मानों अपनी जिंदगी के कैमरे की रील को पीछे ले गए.

उन्होंने बताया, ''हमारे समय में लोग बचपन में कहां कुछ तय कर पाते थे. घर का माहौल कुछ ऐसा था कि पढ़ता था और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेल धूप लेता था. शाम के बाद घर से बाहर रहने की इजाज़त नहीं होती.''

पिता को याद करते हुए एक क्षण के लिए वो ठिठके और फिर बोले, ''पिताजी का अनुशासन ऐसा था कि वे जो चाहते, वही मैं करता. तब ऐसा ही चलन था. वे चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, तो मैं 22 साल की उम्र में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था. इसके बाद फिरोजपुर के जाट रेजिमेंट में ड्राइंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर एक साल तक काम भी किया लेकिन काम में मन नहीं रम रहा था. लेकिन किसी दूसरे काम में भी दिलचस्पी नहीं पैदा हो रही थी.''

पहली ही तस्वीर 'लंदन टाइम्स' में आधे पन्ने में छपी

हालांकि तब तक रघु राय के बड़े भाई एस पॉल फोटोग्राफ़ी की दुनिया में स्थापित हो चुके थे. संयोग से 1966 में रघु उनके पास दिल्ली आए.

वे तब 'इंडियन एक्सप्रेस' में चीफ़ फोटोग्राफ़र हुआ करते थे. कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उनके एक साथी अपने गांव जा रहे थे. रघु राय ने भाई से जिद ठान ली कि उन्हें उनके साथ जाने दिया जाए. रघु राय ने भाई की इजाज़त तो ली है, उनका कैमरा भी ले लिया. सोचा गांव में कुछ तस्वीरें खींच लेंगें.

रघु राय ने उन दिनों को याद करते हुए बताया था, ''बात ये हुई कि रास्ते में एक गधा दिखा, मैंने उसकी तस्वीर लेनी चाहिए. पर वह भागने लगा. मैं उसके पीछे भागने लगा. यह खेल तब तक चला जब तक गधा थक कर रुक नहीं गया. तब जाकर मैंने उसकी तस्वीर खींच ली. बाद में बड़े भाई साहब ने उसे देखा, और उसका प्रिंट तैयार करके उसे विदेश के कुछ अखबारों के लिए भेज दिया.''

इस तस्वीर ने उनकी ज़िंदगी में चमत्कार किया. पहली ही तस्वीर 'लंदन टाइम्स' में आधे पन्ने पर छप गई.

तब उन्हें इसके इतने पैसे मिले कि महीने भर का वेतन बराबर हो गया. रघु को लगा कि वो भी ये कर सकते हैं. बस इसी भरोसे ने उन्हें कैमरे के पीछे ला खड़ा किया.

उस दौर को याद करते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा था, ''आप इसे संयोग, किस्मत या फिर जो चाहें कह लें, भाई साहब फ़ोटोग़्राफर नहीं होते, मेरी पहली तस्वीर 'लंदन टाइम्स' में नहीं छपती, तो शायद मैं कभी फ़ोटोग्राफ़र नहीं बनता."

'द स्टेट्समैन' का ज़िंदगी पर असर

रघु राय ने माना था कि उन्हें नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी. भाई साहब थे ही, फिर पहली तस्वीर लंदन टाइम्स में छपने के बाद से ही उनमें भी फ़ोटोग्राफी के प्रति पैशन आ गया.

उन्होंने बताया था, "भाई साब का रुतबा था, उनकी पहचान की बदौलत ही मुझे हिंदुस्तान टाइम्स में नौकरी भी मिली. उन्होंने मुझे पहला कैमरा ख़रीद कर दिया. शुरुआती सालों में उनके साथ ही रहा. जिस रघु राय को दुनिया जानती है, वो रघु राय नहीं बन पाता अगर भाई साब नहीं होते."

रघु राय अपने बड़े भाई की स्कूटर लेकर दिल्ली की सडक़ों पर निकल पड़ते. घंटों इधर-उधर के चक्कर काटते, फ़ोटो के मौके तलाशते.

रघु राय को 1966 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' में नौकरी मिल गई. लेकिन वहां वो ज़्यादा दिन तक नहीं टिके. क्योंकि तब 'द स्टेट्समैन' की काफ़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, 1967 में वो वहां पहुंच गए.

अपने करियर के शुरुआती दिनों के बारे में उन्होंने बताया था, "फ़ोटोग्राफ़ी के मेरे शुरुआती दिनों में एक तरफ़ तो पॉल साब थे, तो दूसरी तरफ़ किशोर पारीख जैसे जीनियस भी थे, जिनके साथ मैंने हिंदुस्तान टाइम्स में अपने करियर की शुरुआत की थी. दो जीनियस के बीच दबने का ख़तरा था, सैंडविच बन जाने का डर भी था. लेकिन मेरी दोनों ओर इतने जालिम लोग थे कि उनके सामने हमेशा बेहतरीन करते रहने की प्रेरणा मिलती थी."

रघु राय अपनी जिंदगी में स्टेट्समैन की भूमिका को अहमियत देते रहे.

उनके मुताबिक़, ''सच पूछिए तो इसी अख़बार ने मुझे नामचीन फ़ोटोग्राफ़र बनाया. वहां एक समाचार संपादक थे-आर.एन. शर्मा. परंपरागत पत्रकार थे, लेकिन आदमी बहुत भले थे. वे मेरी तस्वीरों को ध्यान से पढ़ते थे. तस्वीरों को देख तो सब लेते हैं लेकिन उसे पढ़ना सबके बस की बात नहीं होती.''

''संयोग ऐसा था कि वे मेरी तस्वीरों को पढ़कर उम्मीद से ज़्यादा जगह देने लगे थे. इससे मेरा भरोसा पक्का होता गया. मेहनत भी बढ़ गई. लेकिन मैं तस्वीरों को ज़्यादा से ज़्यादा से बेहतर बनाने की कोशिश जरूर करता. वे कहते दो कॉलम की फ़ोटो बनाना, लेकिन मैं फ़ोटो बनाता चार कॉलम की. तस्वीर को देखने के बाद वे उसकी जगह निकाल ही लेते. तो मेरे बनने में उनका बड़ा योगदान रहा.''

इस अख़बार में उनके काम की ऐसी धमक हुई कि वो चार साल के अंदर ही वर्ल्ड फोटोग्राफ़ी के लीजेंड हेनरी कार्टियर ब्रेस्सन की नज़र उन पर पड़ी. पेरिस में एक प्रदर्शनी में उनकी तस्वीर को देख कर हेनरी ने उन्हें मैग्नम फोटोज से जोड़ लिया. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारों के कॉपरेटिव समूह से जुड़ने वाले भारत के पहले फोटोग्राफ़र बने और आख़िरी समय तक सबसे सेलिब्रेटेड फोटोग्राफ़र भी रहे.

लेकिन 'द स्टेट्समैन' में काम करने के समय की एक घटना का जिक्र वे नहीं भूले, "बात जेपी आंदोलन के समय की है. बिहार में आंदोलन चरम पर था. मैं जेपी के साथ बिहार घूम रहा था. आंदोलन के दौरान उनपर लाठी चार्ज हुआ था लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री ने इसका खंडन कर दिया. अगले ही दिन 'स्टे्टसमैन' के पहले पन्ने पर लाठीचार्ज की तस्वीर देखकर गृहमंत्री को संसद में माफी मांगनी पड़ी.''

मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी से नज़दीकी

रघु राय की तस्वीरों के विषय हमेशा आम आदमी और उसके हाव भाव और शहरों की रौनक और गलियों की हलचल आदि रहे जबकि फोटोग्राफ़र नदी, तालाब, पर्वत जैसी चीजों को कैमरे में कैद करना पसंद करते हैं, इस पसंद की कोई वजह?

इस सवाल को सुनते ही उनकी आंखों में एक चमक आई. तुरंत बोले, ''देखिए मेरी परवरिश उस समाज में हुई जहां, आम इंसानों की कद्र करना सिखाया गया. आम इंसानों के भावों से हमारा रोज का वास्ता पड़ता है. आप यकीन करें या न करें, ये आम लोग ही हैं जिनके हालात आजादी के इतने सालों के बाद भी जस के तस है, ऐसे लोग मुझे आकर्षित करते रहे हैं.''

उन्होंने कहा, ''भारत के आम लोग, उनके रहन-सहन और जीवनशैली की दुनिया भर में चर्चा होती है, मैं भी उन्हें सम्मान से देखता हूं. कई बार कोशिश करता हूं कि मेरे चित्रों से सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान आम लोगों की समस्याओं पर जाए. वैसे सच यही है कि मैं आम लोगों की तस्वीरें उतारकर कहीं ज़्यादा सुकून पाता हूं.''

कई बार उनकी तस्वीरों की सिरीज़ को देखते हुए लगता है कि वे महज फोटोग्राफ़र नहीं थे, बल्कि बीते साठ सालों के इतिहास को विजुअली मेमोरी के तौर पर डॉक्यूमेंट करने वाले कस्टोडियन भी रहे.

इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा से अपनी नज़दीकियों के बारे में बात करते हुए उन्होंंने बताया था, ''इन हस्तियों से नजदीकियां काम के सिलसिले में बनीं. जब मैं स्टेट्समैन में काम कर रहा था तब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं. सच पूछिए तो मैंने उन जैसी राजनीतिक हस्ती दूसरी नहीं देखी. उनके आलोचक चाहे जो कहें लेकिन वो एक कमिटेड नेता थीं.''

रघु राय के मुताबिक़, 'इंदिरा गांधी के साथ ख़ास बात यह भी थी कि वे कला और संस्कृति को बहुत ज़्यादा महत्व देती थीं. उन्हें यह पता होता था कि फ़ोटोग्राफ़र किस कोण से उनकी तस्वीर खींच रहा है. एक प्रधानमंत्री के तौर पर भी देश को उनके जैसा दूसरा प्रशासनिक नेता नहीं मिल सका.'

इंदिरा गांधी को लेकर उन्होंने कहा था, ''आपातकाल की जब उन्होंने घोषणा की तो हमलोगों ने उनका विरोध किया था. वे चुनाव हार गईं, जेल गईं लेकिन उनकी हिम्मत देखिए कि कैसे उन्होंने अपनी शानदार वापसी की. जब उनकी हत्या की गई, तो मुझे कई दिनों तक यकीन ही नहीं हुआ कि उनकी हत्या की जा सकती है, लेकिन यह हक़ीक़त थी. तब हमने उन पर इंडिया टुडे का संग्रहणीय अंक निकाला था.''

वहीं मदर टेरेसा के बारे में उन्होंने कहा था, ''जहां तक मदर टेरेसा की बात है, वो एकदम मां जैसी थीं. वे अपने प्यार से किसी का भी दिल जीत सकती थीं, अपने देश से दूर आकर उन्होंने यहां के गरीब बेसहारा लोगों के लिए जितना कुछ किया उसका दूसरा उदाहरण फिर कभी नहीं मिलेगा. वे सबसे बड़े प्यार से मिलती थीं और उनसे मिलकर हर कोई नई ऊर्जा से भर जाता था.''

इसके अलावा दलाई लामा हों या फिर बिस्मिल्लाह ख़ान हों या हरि प्रसाद चौरसिया, इन सबके काम को रघु राय ने जिस अंदाज़ में पकड़ा, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती.

दस साल तक स्टेट्समैन में काम करने के बाद वे इंडिया टूडे पत्रिका के फोटो एडिटर बने. इस पत्रिका के कई अंकों को उनकी फोटोग्राफ़ी की वजह से भी याद किया जाता है.

कोलकाता की सड़कों पर बरसात में रिक्शा खींचने वाले नामालूम शख़्स की तस्वीर हो या फिर बनारस के घाट पर विधवा महिलाओं की तस्वीर. इन सबके बीच में 1984 के भोपाल गैस कांड दौरान ली गई उनकी एक तस्वीर ने पूरी त्रासदी को दुनिया के सामने ला दिया था.

एक पिता के अपने बच्चे को दफ़नाने की उस तस्वीर की मिसाल आज भी न्यूज़ फोटोग्राफ़ी की दुनिया में दी जाती है. इस एक तस्वीर ने दुनिया भर में इंडस्ट्रियल ख़तरों पर बहस छेड़ दी थी. रघु राय बाद के सालों में भी भोपाल जाते रहे और इस त्रासदी के शिकार परिवारों को डॉक्यूमेंट करते रहे.

फ़िल्मों और क्रिकेट से दूरी

एक दौर ऐसा भी था कि रघु राय भारतीय मीडिया के सेलिब्रेटी फोटोग्राफ़र संपादक थे, लेकिन वे हमेशा फ़िल्मों और क्रिकेट से एक दूरी पर दिखाई दिए. जबकि मीडिया का काम इन दोनों टॉपिक के बिना नहीं पूरा नहीं हो सकता.

इस दोनों के असर पर उन्होंने कहा था, ''देखिए ऐसा नहीं है कि मुझे फ़िल्में पसंद नहीं आतीं लेकिन अपनी तबीयत उस माध्यम में काम करने की कभी नहीं हुई. दरअसल मायानगरी का तामझाम, चमक-दमक मुझे प्रभावित नहीं कर पाया या कहें कि मैं उस चमक-दमक से दूर ही रहना चाहता था.''

''जहां तक क्रिकेट की बात है तो मैं आपको बता दूं कि बतौर खेल यह भी मुझे पसंद है और मंसूर अली खां पटौदी और कपिल देव बतौर क्रिकेटर मुझे काफी पसंद रहे. लेकिन असली मुश्किल यह है कि यह महज खेल भर नहीं रह गया. इसमें इतना पैसा आ गया है कि खेल का रोमांच कहीं पीछे छूट गया है.''

क्रिकेट के कॉर्पोरेटीकरण पर उन्हें दुख था. वो बोले,'' यह अब कार्पोरेट कारोबार में तब्दील हो चुका है. अपने खिलाड़ियों का भी ध्यान खेल से ज़्यादा पैसे बनाने पर होता गया. इस एक खेल के फेर में दूसरे खेलों की क्या गत हो गई यह किसी से छुपी नहीं है. कई बार तो लगता है कि क्रिकेट खेल कम राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार ज़्यादा होता जा रहा है.''

रघु राय की ख़्याति पूरी दुनिया में फैली थी. उनसे जब ये पूछा कि वो जिस ऊंचाई पर हैं, वहां दुनिया भर से काम करने के ऑफ़र आए होंगे. फिर भी अपना ठिकाना भारत ही क्यों बनाए रखा?

रघु राय के जवाब में एक संतोष और अनुभव दिख रहा था. वो बोले, '' देखिए भारत से बेहतर कोई मुल्क नहीं है, न ही हो सकता है. देश की मिट्टी की सुगंध में काम करने का मजा दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता."

''भारत में इतनी विविधताएं हैं कि कई ज़िंदगी यहां काम करते हुए बिताई जा सकती हैं. पूरा भारत तो रहने दीजिए, अकेले दिल्ली में इतना काम बाकी है करने को कि मुझे कई जन्म लेने पड़ जाएंगे. हाल ही में दिल्ली पर अपनी एक किताब पूरी कर रहा था तब यह भरोसा और ज़्यादा मजबूत होता गया.''

लेकिन क़रीब 30 साल पहले उन्होंने भारत में न्यूज़ फोटोग्राफ़ी की दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन उनका काम लगातार टाइम, लाइफ़, जीइओ, न्यूज़वीक और द न्यूयार्क टाइम्स जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में नज़र आता रहा.

उन्होंने एक दो नहीं बल्कि फोटोग्राफ़ी पर 50 से ज़्यादा किताबें भी तैयार की, जो एक तरह से बदलते भारत की कहानी की तस्वीरें हैं.

रघु राय फोटोग्राफ़र नहीं होते तो क्या होते?

इस सवाल का जवाब तो उनके पास तैयार था, ''इसके लिए मुझे इतनी ज़्यादा सोच विचार नहीं करनी होती. देखिए मुझे फ़ोटोग्राफ़ी से जितनी मोहब्बत है, उतना ही लगाव मुझे बागवानी से है. अगर मैं फ़ोटोग्राफ़र नहीं होता तो पक्का माली होता.''

वो बोले, ''मैं फोटोग्राफ़र होने के बाद भी शनिवार-रविवार को कोई काम नहीं करता हूं . अपने फार्म हाउस पर दिन बिताता हूं. मैंने अपने फार्म हाउस पर हर तरह के फूल पौधे लगा रखे हैं. दुनिया भर से उसे इकट्ठा करता रहा हूं. उसमें भी काफी मजा आता है और लगता है कि प्रकृति की छांव में हूं.''

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