क्या संसद में सचिन फ़्लॉप हैं?

सचिन
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

पिछली कांग्रेस सरकार ने क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को राज्यसभा के लिए नामित किया था. सचिन ने तब खेलों के मुद्दे उठाने का वादा किया था मगर ऐसा नहीं हो पाया.

संसद में ख़ुद सचिन की मौजूदगी पर सवाल उठते रहे हैं. साथ ही खेलप्रेमियों को भी इसका इंतज़ार है कि वो खेलों के मुद्दे उठाएं.

क्या सचिन तेंदुलकर को नामित करना कांग्रेस की किसी रणनीति का हिस्सा था.

पढ़ें सौतिक बिस्वास का विश्लेषण

दो साल पहले जब क्रिकेट दिग्गज <link type="page"><caption> सचिन तेंदुलकर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/11/131114_sachin_last_test_live_psa.shtml" platform="highweb"/></link> को राज्यसभा के लिए नामित किया गया, तो एक समाचारपत्र ने जैसे उनकी खुशामद करते हुए लिखा था, ‘भगवान को नया घर मिल गया है.’

लेकिन इस अख़बार ने एक चेतावनी भी दी. इसके मुताबिक़ इस ''लोकप्रियतावादी क़दम के ज़्यादा मायने नहीं'' थे क्योंकि खिलाड़ी होने के नाते सचिन साल के 200 से ज़्यादा दिन खेलों में व्यस्त रहते हैं.

मैंने भी अपने एक <link type="page"><caption> पूर्व ब्लॉग</caption><url href="http://www.bbc.com/news/17890803" platform="highweb"/></link> में इसका ज़िक्र किया था और उम्मीद जताई थी कि सचिन संसद में खेलों से जुड़े विषय उठाएंगे.

दो साल बाद वो डर सच साबित होते नज़र आ रहे हैं.

ग़ायब

संसदीय कार्यवाही पर नज़र रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के एक शोध के मुताबिक़ इस साल संसद के किसी भी सत्र में <link type="page"><caption> सचिन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/11/131114_bcci_sachin_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> तेंदुलकर ने एक दिन भी हिस्सा नहीं लिया.

पिछले साल उन्होंने सिर्फ़ तीन सत्रों में हिस्सा लिया था लेकिन किसी बहस में भाग नहीं लिया.

बाक़ी सांसदों के मुक़ाबले उनकी उपस्थिति मात्र तीन प्रतिशत रही जबकि औसतन भागीदारी 77 प्रतिशत थी.

सचिन

साफ़ है, या तो उनके पास वक़्त नहीं है, या फिर 24 साल के करियर में <link type="page"><caption> संन्यास</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/11/131115_sachin_wankhede_out_ia.shtml" platform="highweb"/></link> लेने के बावजूद उन्हें संसद आने की इच्छा नहीं है.

असल में, हर बार संसद में क़रीब एक दर्जन सासंदों को साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा में विशेष योगदान के लिए नामांकित किया जाता है, लेकिन ऐसे सांसदों का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है.

पिछले उदाहरण

साल 1952 से अब तक क़रीब 200 ऐसे लोग नामांकित किए जा चुके हैं. इनमें नामी डॉक्टर, लेखक, पत्रकार, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं.

लेकिन कुछ अपवाद भी रहे हैं.

1953 में नर्तक रुक्मिणी देवी अरुंदाले की मदद से जानवरों के विरुद्ध क्रूरता रोकने के लिए एक विधेयक पेश किया गया. 1952 में अपने भाषण में मशहूर कलाकार पृथ्वीराज कपूर ने ‘राष्ट्रीय थियेटर’ शुरू करने की बात कही थी.

1973 में कार्टूनिस्ट अबू अब्राहम ने सूखापीड़ित इलाक़ों की अपनी यात्रा के बारे में बेहद खूबसूरती से वर्णन किया था.

भारत के जाने माने लेखकों में एक आरके नारायण ने संसद में अपने पहले भाषण में भारी-भरकम स्कूल बैग को हटाने की मांग की थी. आरके नारायणन ने कहा था, “बच्चे झुककर चलते हैं. चलते वक़्त चिंपांज़ी की तरह उनके हाथ आगे की ओर लटके रहते हैं. मुझे ऐसे कुछ केस पता हैं, जब बच्चों को गंभीर रीढ़ संबंधी चोटें आईं हैं.”

नाराज़गी

सचिन तेंदुलकर अभी तक कुछ नहीं बोले हैं. संसद में उनके न आने से कुछ लोग नाराज़ भी हैं.

एक स्तंभकार ने मज़ाक किया कि अगर तेंदुलकर संसद नहीं आ रहे, तो वह उनकी जगह लेना चाहेंगे.

सचिन

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट पर काफ़ी लिखा है. वह कहते हैं कि सचिन तेंदुलकर का संसद न जाना ‘कष्टदायक’ है और ‘उनकी छवि खराब करती है’.

रामचंद्र गुहा ने मुझे बताया, “मुझे लगता है कि चुनाव से पहले सचिन तेंदुलकर को नामांकित करने का कांग्रेस सरकार का फ़ैसला स्वार्थपूर्ण था. पार्टी को लगा था कि इससे उसे क्रिकेटप्रेमियों का समर्थन मिलेगा.”

रामचंद्र गुहा के अनुसार “सचिन को यह प्रस्ताव नहीं मानना चाहिए था. वो संसद के लिए नहीं बने हैं और फ़्लॉप हैं.”

एक तरीक़े से वह सही हैं. राहुल द्रविड़ जैसे अपने साथियों के उलट सचिन बहुत ज़्यादा नहीं बोलते और खेल के बारे में उन्होंने बहुत कम बात की है.

अभी तक उन्होंने इसका भी जवाब नहीं दिया है कि आख़िर क्यों उन्हें संसद जाने का वक़्त नहीं मिला. मैंने जब उनके मैनेजर को फ़ोन किया तो कोई जवाब नहीं मिला.

जून 2012 में जब <link type="page"><caption> तेंदुलकर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/11/131115_sachin_bbc_hindi_google_hangout_padigital_indians_hangout_ms.shtml" platform="highweb"/></link> ने सांसद की शपथ ली थी तो उन्होंने कहा था, “मैं संसद में खेल से जुड़े मुद्दे उठाना चाहता हूं.”

भारत को अभी भी इसका इंतज़ार है.

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